Saturday, 30 March 2019

इंदरमन साहू विरूद्ध होमलाल वगैरह

व्य.प्र.सं. के आदेश 7 नियम 3 के अनुसार, वाद की विषय वस्तु अर्थात वादग्रस्त भूमि के स्थावर संपत्ति होने के बावजूद वादपत्र के साथ वादग्रस्त भूमि का सामान्य नक्शा व चर्तुसीमा संलग्न नहीं होने की स्थिति में एवं कथित आधिपत्य की भूमि से वादग्रस्त भूमि से दूरी और स्थिति की जानकारी स्पष्ट नहीं होने, कितने क्षेत्रफल पर निर्माण है यह स्‍पष्‍ट नहीं होने, कितने क्षेत्रफल की भूमि का किस रूप में उपयोग किया जा रहा है उसकी जानकारी नहीं होने, ना ही वादी द्वारा उत्तम साक्ष्य प्रस्तुत किये जाने के कारण स्थितियां अभिलेख पर स्पष्ट नहीं हो पाती है।
वादग्रस्त भूमि के किस व कितने भाग में प्रतिवादीगण के द्वारा हस्‍तक्षेप किया जा रहा है इस संबंध में भी दस्तावेजी साक्ष्य अनुपलब्ध होने, हस्‍तक्षेप का प्रयास कब व कैसे किया गया इसकी जानकारी भी नहीं होने, कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने से प्रतिवादी का हस्‍तक्षेप स्‍वमेव प्रमाणित नहीं होता। पूरा निर्णय पढ़ें ...




न्यायालय:-सप्तम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग -2 दुर्ग,
जिला-दुर्ग (छ.ग.)
(पीठासीन अधिकारी-कु.स्मिता रत्नावत)
व्यवहार वाद क्रः-02-ए/12
संस्थित दिनाँकः-04.04.12
इंदरमन साहू, पिता श्री जगदीश साहू,
उम्र 55 वर्ष, साकिन- बोरीगारका,
थाना-उतई, तहसील व जिला दुर्ग,(छ.ग.)                      .................वादी
//विरूद्ध//
1(क)-होमलाल, पिता श्री धर्मदास, उम्र 35 वर्ष,
1(ख)-श्रीमती जानकी, पति स्व.धर्मदास, उम्र 60 वर्ष,
दोनों निवासी- बोरीगारका, बोरीगारका,
थाना उतई, तहसील व जिला दुर्ग (छ.ग.)
2- बंशीधर, पिता श्री धर्मदास सतनामी, उम्र 45 वर्ष,
3- नंदकिशोर उर्फ जुगुन, पिता श्री शंकरलाल सतनामी, उम्र 25 वर्ष
4- शिवकुमार, पिता श्री धर्मदास सतनामी, उम्र 42 वर्ष,
5- कुलेश्वर, पिता श्री हृदयराम सतनामी, उम्र 39 वर्ष,
सभी निवासी-ग्राम बोरीडीह, वार्ड बोरीगारका,
थाना उतई, तहसील व जिला दुर्ग (छ.ग.)
6- छ.ग.शासन,
द्वारा कलेक्टर, दुर्ग,(छ.ग.)                                 ...............प्रतिवादीगण
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वादी द्वारा श्रीमती रेवा खरे अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 1 से 5 द्वारा श्री दिलीप सुखदेव अधिवक्ता।
प्रतिवादी क्रमांक 6 एक पक्षीय (दिनांक 18.05.12)
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//निर्णय//
(आज दिनांक 04.08.2014 को घोषित)
1/ वादी द्वारा यह वाद, वादग्रस्त संपत्ति- खसरा नंबर 616/3 रकबा 0.12 हेक्टेयर, खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर, वार्ड-बोरीडीह,ग्राम पुरई बोरीगारका, तहसील व जिला दुर्ग के संबंध में स्वामित्व घोषणा, स्थायी निषेधाज्ञा व नुकसानी स्वरूप 1,00,000/- (एक लाख रू.) प्राप्ति हेतु प्रतिवादीगण के विरूद्ध संस्थित किया गया है।
2/ वाद में उभयपक्ष के मध्य यह स्वीकृत तथ्य है कि-
3/ वादी का वाद संक्षेप में इस प्रकार है, कि-
वादी के हक एवं आधिपत्य की खसरा नंबर 616/3 रकबा 0.12 पर मकान व खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर पर दुकान निर्मित कर, शेष भूमि का उपयोग वादी द्वारा बाड़ी के रूप में किया जा रहा है। वादी की भूमि खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर से लगी हुई खसरा नंबर 16/2 की शासकीय घास भूमि स्थित है। प्रतिवादीगण द्वारा उक्त शासकीय घास भूमि पर अवैधानिक आधिपत्य कर मकान निर्मित किया गया है। प्रतिवादीगण द्वारा अपने मकान में आने जाने के लिए वादी के स्वामित्व के खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर का उपयोग किया जा रहा है। प्रतिवादीगण द्वारा खसरा नंबर 16/2 की घासभूमि पर अवैधानिक रूप से आधिपत्य कर मकान निर्मित कर, अपने व रहवासियों के आने जाने के रास्ते पर घेरा लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया है। प्रतिवादीगण द्वारा अपने मकान में आने जाने के लिए वादी के स्वामित्व खसरा नंबर 616/5 को अवैधानिक तरीके से उपयोग मे लाने हेतु पत्थर आदि रखकर दखल उत्पन्न कर हस्तक्षेप किया जा रहा है।




4/ पूर्व में शासकीय घास भूमि खसरा नंबर 16/2 पर रमाकांत गुप्ता नामक व्यक्ति द्वारा अवैध कब्जा किये जाने पर ग्राम पंचायत बोरीगारका द्वारा कब्जा हटाने की कार्यवाही करते हुए, सीमेंटर्, इंट व छड़ को जप्त किया गया था। रमाकांत गुप्ता द्वारा वादी एवं ग्राम बोरीडीह के रहवासियों के घर के पानी निकासी हेतु निर्मित नाली को बंद करने पर, रमाकांत गुप्ता के विरूद्ध द.प्र.सं. की धारा 133 के तहत् कार्यवाही करते हुए अनुविभागीय दण्डाधिकारी दुर्ग द्वारा दिनांक 31.01.11 को तत्काल अवरोध हटाये जाने का आदेश पारित किया था। इसके बावजूद भी प्रतिवादीगण शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा कर अवैधानिक तरीके से मकान निर्मित कर वादी की भूमि पर हस्तक्षेप करते हुए वादी को परेशान करते आ रहे है। प्रतिवादीगण, वादी के स्वामित्व की भूमि खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर को हड़पने की नियत से खसरा नंबर 16/2 पर निर्माण कार्य कर, वादी के स्वामित्व की खसरा नंबर 616/5 की भूमि पर आने जाने के लिए रास्ता निर्मित कर उपयोग करना चाहते है। इसके विपरीत वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि को स्व-अर्जित आय से वर्ष 1991 में क्रय
कर स्वामित्व व आधिपत्य प्राप्त किया गया है। प्रतिवादीगण द्वारा वादी की बाड़ी में अवैधानिक तरीके से हस्तक्षेप किये जाने के कारण वादी वादग्रस्त भूमि के उपयोग से वंचित हो गया है। फलस्वरूप वादी को प्रतिवर्ष 10 हजार रू. का नुकसान हो रहा है। प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त भूमि को हड़पने की नियत से वादी के आधिपत्य में हस्तक्षेप से वादकारण निरंतर जारी है। प्रतिवादी क्रमांक 4 को प्रकरण में औपचारिक पक्षकार बनाया गया है। वादग्रस्त भूमि सीलिंग से प्रभावित भूमि में नही है। वादी द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में स्वत्व घोषणा,स्थायी निषेधाज्ञा व नुकसानी हेतु क्रमशः 1000/-रू., 1000/-रू. व 1,00,000/-रू. नुकसानी हेतु 10,000/-रू., कुल 12,000/-रू. वाद मूल्यांकन कर, कुल 1240/-रू. का न्याय शुल्क चस्पा किया है।




5/ प्रतिवादी क्रमांक 1 से 5 द्वारा वादी के उपरोक्त सभी अभिवचनों को अस्वीकार करते हुए अभिकथन किया है कि-
प्रतिवादीगण द्वारा खसरा नंबर 16/2 रकबा 2), 5 डिसमिल एवं खसरा नंबर 277 रकबा 5 डिसमिल, प.ह.नं. 31, रा.नि.मं. अण्डा, ग्राम बोरीगारका, तहसील व जिला दुर्ग (छ.ग.) स्थित भूमि की दिनांक 01.11.10 को क्रय किया गया था। ग्राम पंचायत बोरीगारका द्वारा उक्त भूमि का पट्टा सुदामा राम व गोकुल कुमार पिता श्री लूमचंद गजपाल, सोहागा बाई पति श्री लूमचंद गजपाल को दिनांक 30.06.99 को प्रदान किया गया था। वादी एवं प्रतिवादीगण अपनी-अपनी भूमि के आधिपत्य में है। प्रतिवादीगण वादी के स्वामित्व की भूमि पर अवैध रूप से आधिपत्य कर, हड़पने की नियत नहीं रखते है। प्रतिवादीगण के मकान के सामने स्थित भूमि शासकीय घास भूमि होकर तालाब जाने के रास्ते की भूमि है। उक्त भूमि से बरसात का पानी तालाब व अन्य खार की तरफ जाता हैं। उक्त भूमि ग्रामवासियों के आने-जाने व वादी के घर से मुख्य सड़क (दुर्ग से पाऊवारा जाने वाला मार्ग) में आने-जाने का रास्ता है। वादी द्वारा उक्त भूमि को खंभा गाड़कर कटीले तार से रोका गया है। वादी द्वारा उक्त भूमि को अपनी बताकर प्रतिवादीगण से वाद-विवाद किया जाता है। वादी द्वारा जिस भूमि को वादग्रस्त अपने आधिपत्य की भूमि को बताया जा रहा है, उस भूमि के संबंध में राजस्व निरीक्षक व पटवारी का सीमांकन प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया है।
6/ उभयपक्ष के अभिवचनों के आधार पर पूर्व पीठासीन अधिकारी द्वारा निम्नलिखित वादप्रश्‍न दिनांक 12.10.12 को विरचित किये जाने पर समक्ष निष्कर्ष लेखबद्ध किये गये :-




वादप्रश्‍न निष्कर्ष
1. क्या वादी प्रतिवादी के विरूद्ध ग्राम पुरई,प.ह.नं. तहसील व जिला दुर्ग भूमि खसरा नंबर 616/3, 616/5 रकबा 0.12 व 0.03 हेक्टे. का भूमि स्वामी होने एवं उस पर किसी का दखल व अधिकार न होने संबंधी घोषण प्राप्त करने का अधिकारी है ? .... स्वामी होना प्रमाणित।
2. क्या वादी प्रतिवादीगण से वादग्रस्त भूमि पर 10,000/-रू0 प्रतिवर्ष की दर से 1 वर्ष की नुकसानी प्राप्त करने का अधिकारी है ? ... नहीं।
3. क्या वादी प्रतिवादीगण के विरूद्ध वादग्रस्त भूमि पर प्रतिवादीगण द्वारा या अन्य के माध्यम से हस्तक्षेप किये जाने हेतु स्‍थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का अधिकारी है ? ... नहीं।
4. सहायता एवं व्यय?   ... निर्णय कंडिका 16 अनुसार।
//निष्कर्ष के आधार//
वाद प्रश्‍न क्रमांक:-1:-
7/ इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने अपने मुख्य परीक्षण में अभिसाक्ष्य दिया है कि, वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि को वर्ष 1991 में क्रय कर मकान व दुकान निर्मित कर निवास कर, शेष भूमि को बाड़ी के रूप में उपयोग किया जा रहा है। इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, वादग्रस्त भूमि को क्रय करने के पश्चात् वादग्रस्त भूमि के राजस्व अभिलेख में स्वयं का नाम भूमि स्वामी के रूप में दर्ज होना व्यक्त किया हैं। अग्राहिज (वा.सा.1), पतिराम (वा.सा.3) व चंपेश्वर गजपाल (वा.सा.5) ने अपने मुख्य परीक्षण में, वादी की उक्त साक्ष्य का समर्थन किया हैं। नंदकिशोर मांडले (प्र.सा.1) ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 1 में, वादग्रस्त भूमि को वादी के स्वामित्व एवं आधिपत्य की भूमि होना व्यक्त करते हुए, वादग्रस्त भूमि से लगी हुई खसरा नंबर 16/2 रकबा 5 डिसमिल एवं खसरा नंबर 277 रकबा 5 डिसमिल की भूमि प.ह.नं. 31, तहसील व जिला दुर्ग में स्थित होना व्यक्त किया है। नंदकिशोर मांडले (प्र.सा.1) ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, खसरा नंबर 16/2 रकबा 5 डिसमिल एवं खसरा नंबर 277 रकबा 5 डिसमिल की भूमि प.ह.नं. 31, तहसील व जिला दुर्ग को रमाकांत गुप्ता नामक व्यक्ति से दिनांक 01.11.10 को क्रय करना व्यक्त किया है। नंदकिशोर मांडले (प्र.सा.1) ने अपने मुख्य परीक्षण में, खसरा नंबर 16/2 व खसरा नंबर 277 की भूमि को रमाकांत गुप्ता द्वारा सुदामा राम, गोकुल कुमार व सोहागा बाई को दिनांक 03.06.99 को उक्त भूमि ग्राम पंचायत बोरीगारका द्वारा पट्टे पर प्रदान किये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। इंदरमन साहू (वा.सा.2) द्वारा अपने मुख्य परीक्षण में, खसरा नंबर 16/2 की भूमि को शासकीय घास भूमि होना व्यक्त करते हुए, वादग्रस्त भूमि के खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर से लगी हुई होना व्यक्त किया है। वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि, बोधनसिंह राजपूत से क्रय किये जाने के संबंध में, पंजीकृत विक्रय विलेख दिनांकित 27.09.91 (प्र.पी.1) प्रस्तुत किया गया है। विक्रय विलेख दिनांकित 27.09.91 (प्र.पी.1) में विक्रय विलेख के गवाह अग्राहिज(वा.सा.1) व सुखराम साहू (प्र.सा.3) है। यद्यपि अग्राहिज(वा.सा.1) ने अपने मुख्य परीक्षण में, वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि क्रय किये जाने के संबंध में कोई साक्ष्य प्रकट नही की है। इसके विपरीत सुखराम साहू (प्र.सा.3) ने अपने प्रतिपरीक्षण में, विक्रय विलेख दिनांकित 27.09.91 (प्र.पी.1) पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार कर, वादी द्वारा क्रय की गयी भूमि की पहचान ज्ञात नहीं होना व्यक्त किया हैं।




8/ इसके विपरीत प्रतिवादीगण द्वारा, वादी द्वारा क्रय की गयी वादग्रस्त भूमि के अभिवचन को विवादित भी नहीं किया गया हैं। वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि के संबंध में विक्रेता बोधनसिंह का नाम खसरा नंबर 616 की भूमि पर दर्ज होने के संबंध में खसरा पांचसाला वर्ष 1988-89 (प्र.पी.6) प्रस्तुत किया है। खसरा पांचसाला वर्ष 1988-89 (प्र.पी.6) के कॉलम नंबर 18 में, वादग्रस्त भूमि के खसरा नंबर 616/3 व 616/5 की भूमि पर वादी का नाम दर्ज होने की टीप अंकित है। इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने वर्ष 2012-13 का खसरा पांचसाला की प्रति (प्र.पी.8-सी) प्रस्तुत की है। वादग्रस्त भूमि के खसरा पांचसाला वर्ष 2012-13 (प्र.पी.8-सी) में वादग्रस्त भूमि पर, वादी इंदरमन साहू का नाम दर्ज है। प्रतिवादी द्वारा वादग्रस्त भूमि वादी की स्वामित्व की न होने के संबंध में कोई अभिवचन व साक्ष्य प्रकट नहीं की है। अतः वादी इंदरमन साहू (वा.सा.2) वादग्रस्त भूमि के स्वामी होना प्रमाणित पाये जाता है।
वादप्रश्‍न क्रमांक 3:-
9/ वादी के समग्र अभिवचनों के परिशीलन पश्चात् यह दर्शित होता है कि, वादी द्वारा अपने वादपत्र में कुल 3 बिंदूओं के आधार पर वादग्रस्त भूमि में प्रतिवादीगण द्वारा हस्तक्षेप किया जाना प्रकट किया है। अभिवचनित 3 बिंदूओं में-
(1) प्रतिवादीगण खसरा नंबर 16/2 की भूमि पर मकान निर्मित कर, अपने मकान में आने-जाने के लिए वादग्रस्त भूमि खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर का उपयोग प्रारंभ कर,
(2) स्वयं प्रतिवादी व अन्य रहवासियों के आवागमन के रास्ते पर घेरा लगाकर, रहवासियों का रास्ता बंद कर,
(3) वादग्रस्त भूमि के खसरा नंबर 616/5 को अवैधानिक तरीके से उपयोग में लाने हेतु पत्थर आदि रखकर, वादग्रस्त भूमि पर वादी के आवागमन में अवरोध उत्पन्न कर वादग्रस्त भूमि पर रास्ता निर्मित करना चाहते है।
इंदरमन साहू (वा.सा.2), अग्राहिज (वा.सा.1), पतिराम (वा.सा.3) व चंपेश्वर गजपाल (वा.सा.5) ने अपने मुख्य परीक्षण में, वादी के उक्त अभिवचनों (3बिंदू) का समर्थन किया है। समस्त वादी साक्षीगणों द्वारा अपने प्रतिपरीक्षण में, प्रतिरक्षा पक्ष द्वारा सुझाव दिये जाने पर, साक्ष्य स्वरूप/स्वतः कथन कर, यह तथ्य प्रकट किया है कि, वादग्रस्त भूमि व मुख्य मार्ग के मध्य लकड़ी के खंभे गाड़कर तार का घेरा डला हुआ है। अग्राहिज (वा.सा.1) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 13 व 14 में यह तथ्य स्वीकार किया है कि, प्रतिवादीगण के विक्रेता रमाकांत गुप्ता द्वारा प्रतिवादीगण के मकान में निवास करने के समय वादग्रस्त भूमि पर कोई घेरा डला हुआ नही था व प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त भूमि से लगी हुई भूमि पर स्थित मकान क्रय करने के पश्चात्, वादी द्वारा सड़क व मकान के मध्य की वादग्रस्त भूमि पर लकड़ी गाड़कर तार घेरा डाला है। वादी द्वारा प्रतिवादी साक्षियों को प्रतिपरीक्षण करते समय यह सुझाव दिया है कि, वादी द्वारा अपने घर के सामने की स्वयं के स्वामित्व की भूमि पर तार घेरा लगाया हुआ है। नंदकिशोर मांडले (प्र.सा.1) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 11 में, वादी के उक्त सुझाव से इंकार करते हुए, स्वतः कथन कर, तार घेरा लगी हुई भूमि, वादी के स्वामित्व की होने से अनभिज्ञता व्यक्त की है। शिवकुमार जांगडे (प्र.सा.2) व सुखराम साहू (प्र.सा.3) द्वारा अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 8 व 15 में, वादी के उक्त सुझाव से स्पष्टतः इंकार करते हुए, स्वतः कथन कर, वादी द्वारा लगाये जा रहे तार घेरे को लगाने से रोकने व न लगाने देने की साक्ष्य प्रकट की है। वादी व प्रतिवादी साक्षीगणों के प्रतिपरीक्षण में प्रकट उक्त साक्ष्य से स्पष्ट है कि, वादी यह कहना चाहते है कि, वादी द्वारा स्वयं वादग्रस्त भूमि को तार लगाकर घेरा गया था। इसके विपरीत वादी द्वारा अपने अभिवचनों में यह कहीं भी उल्लेखित नहीं किया है कि, स्‍वयं वादी द्वारा वादग्रस्त भूमि पर किसी प्रकार के लकड़ी के खंभे गाड़कर तार घेरा डाला गया है।




10/ पटवारी कमलेश साहू (वा.सा.4) ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 6 में, पटवारी नक्शा (प्र.पी.3) में, वादग्रस्त भूमि खसरा नंबर 616/5 के ऊपर रोड दर्शित होना व्यक्त कर, रोड से लगी हुई खसरा नंबर 616/5 की भूमि के तरफ कोई घास जमीन नही होने का तथ्य स्वीकार किया है। पटवारी कमलेश साहू (वा.सा.4) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 10 में, साक्ष्य हेतु न्यायालय में उपस्थित होने के पूर्व वादग्रस्त भूमि को देखने का तथ्य स्वीकार किया है। पटवारी कमलेश साहू (वा.सा.4) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 16 व 19 में, वादग्रस्त भूमि खसरा नंबर 616/5 पर कोई घेरा डला हुआ नही होना व वादग्रस्त भूमि खुली होने के कारण आमजन द्वारा वादग्रस्त भूमि से आना-जाना करने का तथ्य स्वीकार किया है। अभिलेख पर वादी के वादग्रस्त भूमि पर तार घेरा लगा होने का कोई अभिवचन नही है। इसके विपरीत वादी इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 36 व 39 में, प्रतिवादी द्वारा, वादग्रस्त भूमि पर वादी द्वारा बनवाये गये घेरे को हटाये जाने की साक्ष्य प्रकट की है। जब पटवारी कमलेश साहू (वा.सा.4) की प्रतिपरीक्षण में, वादग्रस्त भूमि के स्थान पर तार घेरा नही होने की साक्ष्य अभिलेख पर है, ऐसी दशा में वादी व वादी साक्षीगणों की वादग्रस्त भूमि पर लकड़ी का खंभा गाड़कर तार घेरा लगाये जाने की साक्ष्य संदेहास्पद हो जाती है। यदि वादी द्वारा, वादग्रस्त भूमि पर लकड़ी का खंभा गाड़कर तार घेरा लगाया गया था, तो-
क्यों वादी ने उक्त कृत्य को अपने अभिवचनों में स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं किया ?
अतः यह स्पष्ट है कि वादी स्वच्छ हाथों से न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुए है।
11/ इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 27 व 29 में, स्‍वयं के मकान के सामने व रोड के पहले कुल दूरी 20 मीटर होना व्यक्त करते हुए, 20 मीटर की भूमि स्‍वयं के स्वामित्व की होना व शासन द्वारा उक्त 20 मीटर की भूमि पर नर्सरी बनाये जाने का तथ्य स्वीकार किया है। शिवकुमार जांगडे (प्र.सा.2) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 10 व 11 में, वादी के मकान के सामने की जिस जमीन पर, वादी को तार घेरा लगाने से रोका गया, उस जमीन से स्‍वयं द्वारा आना-जाना स्वीकार कर, मकान के पश्चात् वादी की बाड़ी व नर्सरी, नर्सरी से रोड लगा हुआ होना व्यक्त किया है। उभयपक्ष की उक्त साक्ष्य से यह दर्शित है कि, वादग्रस्त भूमि पर स्थित वादी के मकान के सामने रोड की तरफ रिक्त भूमि है, जिस पर नर्सरी बनी हुई हैं। वादी द्वारा अपने स्वामित्व की भूमि पर शासन को नर्सरी बनाने देने की अनुज्ञा क्यों व किस कारण से दी? इस संबंध में स्‍वयं वादी द्वारा कोई स्पष्टीकरण प्रकट नहीं किया गया है। शिवकुमार जांगडे (प्र.सा.2) भी, अपने प्रतिपरीक्षण में उक्त भूमि से आना-जाना स्वीकार करते है। इसके विपरीत स्‍वयं वादी साक्षी पटवारी कमलेश साहू (वा.सा.4) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 19 में, वादग्रस्त भूमि से आमजन का आना-जाना स्वीकार किया है। जब रोड व वादग्रस्त भूमि पर स्थित मकान के मध्य स्थित रिक्त भूमि पर प्रतिवादीगण व आमजन आवागमन कर रहे है तो, क्यों वादी द्वारा मात्र प्रतिवादीगण के विरूद्ध यह वाद संस्थित किया गया है? संस्थित वाद में आमजन पक्षकार नही हैं?




12/ नंदकिशोर मांडले (प्र.सा.1) ने अपने अभिवचनों का समर्थन करते हुए, प्रतिपरीक्षण की कंडिका 4 में, यह व्यक्त किया है कि, वादग्रस्त भूमि पर से बारिश का पानी तालाब में जाता है व स्‍वयं अनुविभागीय अधिकारी दुर्ग द्वारा थाना प्रभारी उतई के प्रतिवेदन के अनुसार वादग्रस्त भूमि पर तालाब जाने व पानी के बहाव वाली नाली में पोंगा डालकर मिट्टी डालने का निर्देश दिया है। इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 31 में, यह तथ्य स्वीकार किया है कि, वादी के घर व जमीन से होते हुए बारिश का पानी प्रतिवादीगण के मकान के पश्चिम दिशा में स्थित तालाब में जाता है। अग्राहिज (वा.सा.1) ने अपने प्रतिपरीक्षण की कंडिका 15 में, उक्त तथ्य स्वीकार किया है। उक्त साक्ष्य के परिप्रेक्ष्य में अनुविभागीय अधिकारी दुर्ग द्वारा दिनांक 31.03.11 को दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 719/10, इंदरमन विरूद्ध रमाकांत गुप्ता में पारित आदेश की प्रमाणित प्रस्तुत की है। रमाकांत गुप्ता प्रतिवादीगण की भूमि के पूर्व आधिपत्यधारी थे। आदेश दिनांकित 31.03.11 की प्रमाणित प्रति (प्र.पी.7) की अंतिम कंडिका में, अनावेदक रमाकांत द्वारा जानबूझकर, आम रास्ते पर से सार्वजनिक जल निकासी को अवरोध किये जाने का तथ्य उल्लेखित करते हुए, अनावेदक अर्थात रमाकांत गुप्ता को अवरोध हटाये जाने हेतु आदेश दिया है। यद्यपि प्रतिवादीगण की भूमि के पूर्व आधिपत्यधारी के विरूद्ध उक्त आदेश है, इसके विपरीत आदेश की अंतिम कंडिका में-‘‘आम रास्ते पर अवरोध’’ का तथ्य उल्लेखित है। अतः यह संदेहास्पद है कि, जिस जमीन से जल की निकासी हो रही है, वह वादी की जमीन है या आम रास्ता?
13/ इंदरमन साहू (वा.सा.2) ने अपने मुख्य परीक्षण की कंडिका 2 में, प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त भूमि के खसरा नंबर 616/5 को अवैधानिक तरीके से उपयोग में लाने हेतु पत्थर आदि रखकर, वादग्रस्त भूमि पर वादी के आवागमन में अवरोध उत्पन्न करने की साक्ष्य प्रकट की है। अग्राहिज (वा.सा.1), पतिराम (वा.सा.3) व चंपेश्वर गजपाल (वा.सा.5) ने वादी की उक्त साक्ष्य का समर्थन किया है। इसके विपरीत अभिलेख पर प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त भूमि पर पत्थर रखकर आवागमन करने के संबंध में कोई प्राथमिक साक्ष्य उपलब्ध नही है। वादग्रस्त भूमि के कितने क्षेत्रफल पर प्रतिवादीगण द्वारा कथित पत्थर रखकर, वादी के आवागमन को अवरूद्ध किया है, यह अभिलेखीय साक्ष्य से दर्शित नही है। वादग्रस्त भूमि पर प्रतिवादीगण द्वारा पत्थर रखने की मुख्य परीक्षण की साक्ष्य किसी अन्य साक्ष्य से समर्थित नही है।




14/ वादी द्वारा व्य.प्र.सं. के आदेश 7 नियम 3 के अनुसार, वाद की विषय वस्तु अर्थात वादग्रस्त भूमि स्थावर संपत्ति होने के बावजूद वादपत्र के साथ वादग्रस्त भूमि का सामान्य नक्शा व चर्तुसीमा तक संलग्न नहीं की है। यद्यपि वादग्रस्त भूमि का खसरा नंबर स्पष्ट रूप से वादपत्र में अभिवचनित किया गया है। इसके विपरीत मौके पर प्रतिवादीगण के कथित आधिपत्य की भूमि खसरा नंबर 16/2 व 277 की भूमि, वादग्रस्त भूमि से कितनी दूर किस दिशा में स्थित है?, यह भी अभिलेख पर स्पष्ट नहीं है। वादग्रस्त भूमि खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर के कितने क्षेत्रफल पर मकान/दुकान बनी है? कितने क्षेत्रफल की भूमि वादी द्वारा कथित बाड़ी के रूप में उपयोग में की जा रही है? वादग्रस्त भूमि के कितने क्षेत्रफल पर कथित नर्सरी संरचित है? यह वादी द्वारा उत्तम साक्ष्य प्रस्तुत न किये जाने के कारण अभिलेख पर स्पष्ट नहीं हो सका है। वादग्रस्त भूमि के किस व कितने भाग से प्रतिवादीगण आवागमन कर रहे है? इस संबंध में दस्तावेजी साक्ष्य अनुपलब्ध है। वादी द्वारा निर्मित करवाया गया कथित तार घेरा को कितना व कब तोड़ा गया, इस संबंध मे भी कोई साक्ष्य उपलब्ध नही है।
अतः प्रतिवादीगण द्वारा वादी के स्वामित्व की वादग्रस्त भूमि में हस्तक्षेप किया जाना अप्रमाणित पाया जाता है।
वाद प्रश्‍न क्रमांक 2:-
15/ वादप्रश्न क्रमांक 1 की साक्ष्य विवेचना से, वादी का वादग्रस्त भूमि का स्वामी होना प्रमाणित पाया गया है। वादप्रश्न क्रमांक 3 की साक्ष्य विवेचना से, प्रतिवादीगण द्वारा वादी के स्वामित्व की वादग्रस्त भूमि में हस्तक्षेप किया जाना अप्रमाणित पाया गया है। अतः वादी को वादग्रस्त भूमि के संबंध में 10 हजार रू. प्रतिवर्ष की दर से क्षति होना दर्शित नहीं होता है।
अतः वादी, प्रतिवादीगण 10 हजार रू. प्रतिवर्ष की दर से 1 वर्ष की नुकसानी प्राप्त करने के अधिकारी नही है।
वाद प्रश्‍न क्रमांक 4 :-
16/ अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के आलोक में वादप्रश्न क्रमांक 1,2 व 3 के संबंध में साक्ष्य विवेचना के आधार पर संस्थित व्यवहार वाद आंशिक रूप से स्वीकार कर वाद में निम्नलिखित आशय की डिक्री पारित की जाती है -
1- वादी, वादग्रस्त संपत्ति-‘‘खसरा नंबर 616/3 रकबा 0.12 हेक्टेयर, खसरा नंबर 616/5 रकबा 0.03 हेक्टेयर, वार्ड- बोरीडीह, ग्राम पुरई बोरीगारका, तहसील व जिला दुर्ग’’ के स्वामी है।
उभयपक्ष अपना-अपना वाद व्यय स्‍वयं वहन करेंगे।
अधिवक्ता शुल्क नियमानुसार देय हो।
निर्णय आज दिनांकित, हस्ताक्षरित कर घोषित किया गया।
(कु.स्मिता रत्नावत)
सप्तम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2,
दुर्ग(छ.ग.)
मेरे निर्देशन पर टंकित।
(कु.स्मिता रत्नावत)
सप्तम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2, दुर्ग(छ.ग.)




Saturday, 23 June 2018

राजीव तिवारी विरुद्ध छ.ग. राज्य

न्यायालय-प्रफुल्ल सोनवानी, विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम)
बलौदाबाजार, जिला-बलौदाबाजार भाटापारा (छ.ग.)
सेंट्रल फाईलिंग नं.01/2016
विशेष दाण्डिक प्रकरण (भ्रष्टाचार
नि.अधिनियम) क्र.01/2016
संस्थित दिनांक 23.12.2016
छ.ग.राज्य, द्वारा - आरक्षी केन्द्र-एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर
रायपुर (छ.ग.)                                                                                  ..... अभियोजन
।। विरुद्ध ।।
राजीव तिवारी पिता ऋषि कुमार तिवारी, उम्र 37 साल,
पटवारी हल्का नंबर 12, ग्राम टिकुलिया, भाटापारा
जिला-बलौदाबाजार, छ.ग.
स्‍थायी पता मकान नं. 150, कर्मचारी आवास कॉलोनी
5 नं.06 सिमगा, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा (छ.ग.)                          ...... अभियुक्त
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छ.ग. राज्य द्वारा श्री अमिय अग्रवाल अतिरिक्त लोक अभियोजक।
आरोपी द्वारा श्री देवा देवांगन अधिवक्ता
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                                                                         ।। निणर्य ।।
(आज दिनांक 30 /अक्टूबर/2017 को घोषित)
1. आरोपी राजीव तिवारी पर धारा 07, 13(1)(डी) व 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अन्तर्गत आरोप है कि, उसने लोक सेवक के रूप में पटवारी हल्का नंबर 12 तहसील भाटापारा, जिला बलौदाबाजार (छ.ग.) में पटवारी के पद पर पदस्थ रहते हुए प्रार्थी गंगाप्रसाद वर्मा जो कि पिलेश्वर निषाद से एक खेत क्रय किया था का नामांतरण प्रमाणीकरण कराने के एवज में प्रार्थी से 15,000/-रूपये वैध पारिश्रमिक से भिन्न पारितोषण के रूप में मांग किया और दिनांक 01.06.2016 को 10,000/- रिश्वत प्राप्त कर आपराधिक अवचार कारित किया।
2. प्रकरण में स्वीकृत तथ्य कुछ भी नहीं है।
3. अभियोजन का प्रकरण संक्षेप में इस प्रकार है कि, प्रार्थी गंगाप्रसाद वर्मा (अ.सा.04) ने दिनांक 28.05.2016 को पुलिस अधीक्षक एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर के समक्ष उपस्थित होकर एक लिखित शिकायत पत्र प्र.पी. 19 प्रस्तुत कर निवेदन किया कि वह ग्राम दावनबोड थाना भाटापारा जिला बलौदाबाजार भाटापारा का रहने वाला है। उसने माह अप्रेल 2016 में ग्राम टिकुलिया थाना भाटापारा में पिलेश्वर निषाद के खेत 01 एकड 15 डिसमिल को 05,10,000/- (पाँच लाख दस हजार रूपये) में पावर ऑफ अटार्निं के आधार पर कमल किशोर साहू से पंजीयन ऑफिस में चेक के माध्यम से पूरा पैसा भुगतान कर रजिस्ट्री कराया था रजिस्ट्री होने के बाद स्टाम्प पेपर लाकर उसके नाम से ऋण पुस्तिका बनवाने एवं नामांतरण कराने के लिए ग्राम टिकुलिया के पटवारी राजीव तिवारी से स्टाम्प पेपर रजिस्ट्री पेपर के साथ सम्पर्क किया । पटवारी रजिस्ट्री पेपर देखकर कहा कि इस रजिस्ट्री में आपत्ति लगा है ऋण पुस्तिका बनवाने एवं नामांतरण के लिए 15000/- (पन्द्रह हजार रूपये) लगेगा तब वह कहा कि किसान आदमी हूँ, 15000/- (पन्द्रह हजार रूपये) कहां से दूंगा ? तब उसने तहसीलदार से चर्चा कर एक-दो दिन में बताउंगा कहा तब उसने पटवारी से फोन से सम्पर्क किया तो उसने 10,000/-(दस हजार रूपये) से कम में काम नहीं होगा कहा तथा यह भी कहा कि यदि आपत्ति नहीं लगता तो इस काम को तीन हजार रूपये में कर देते वह अपने स्तर पर किया किसी ने भी प्रमाणीकरण नामांतरण में आपत्ति नहीं किया है। पटवारी राजीव तिवारी ऋण पुस्तिका बनाने,प्रमाणीकरण नामांतरण के एवेज में उससे 10,000/-(दस हजार
रूपये) की मांग कर रहा है। वह उसे रिश्वत नहीं देना चाहत है बल्कि रिश्वत लेते पकड्वाना चाहता है।
4. प्रार्थी के उक्त लिखित शिकायत आवेदन के सत्यापन हेतु दिनांक 28.05.2016 को प्रार्थी गंगाप्रसाद को एक डिजीटल वाईस रिकार्डर देकर पुन: आरोपी के पास उसके द्वारा रिश्वत की मांग की जाने वाली वार्तालाप को रिकार्ड कर लाने बोला गया। तब प्रार्थी गंगाप्रसाद द्वारा दिनांक 31.05.2016 मोबाईल के माध्यम से निरीक्षक एस.के.सेन को जानकारी दिया कि, वह दिनांक 29.05.2016 को पटवारी कार्यालय जाकर उससे सम्पर्क कर रिश्वत की मांग की बातचीत को रिकार्ड कर लिया तथा रिकार्ड वार्तालाप में पटवारी राजीव तिवारी द्वारा दस हजार रूपये लेने को सहमत हो जाना बताया तब प्रार्थी गंगाप्रसाद वर्मा को डिजीटल वाईस रिकार्डर के साथ एवं आरोपी को रिश्वत में दिये जाने वाली रकम लेकर महेन्द्र टैक्टर शो रूम के सामने ग्राम तरेंगा लिमतरा भाटापारा रोड में दिनांक 01.06.2016 को उपस्थित होने हेतु निर्देशित किया गया । प्रार्थी के उक्त सूचना की पुलिस अधीक्षक को अवगत कराया गया एवं उसके निर्देशानुसार ट्रेप दल का गठन किया गया एवं ट्रेप कार्यवाही हेतु मौके पर उपस्थित रहने के लिए दो स्वतंत्र राजपत्रित अधिकारियों को ए.सी.बी.कार्यालय रायपुर भेजने हेतु कलेक्टर रायपुर को प्र.पी. 27 का ज्ञापन प्रेषित किया गया। जिस पर दो पंच साक्षी डॉक्टर ए.के.प्रसाद (अ०सा० 01) एवं शादाब मेमन(अ०सा०० 6) एंटी करप्शन ब्यूरो कार्यालय रायपुर में उपस्थित हुए जिन्हें ट्रेप दल में शामिल किया गया ट्रेप दल के सदस्य डी.एस.पी. श्री डी.एस.परिहार,निरीक्षक श्री एस.के.सैन,उपनिरीक्षक रविशंकर तिवारी,उप निरीक्षक श्री झनक लाल साहू, आरक्षक शिवप्रसाद साहू,सैनिक दशरथ धृतलहरे,एवं वाहन चालक चंद्रप्रकाश साहू ए.सी.बी.कार्यालय में दिनांक 01.06.2016 को प्रात: 09.30 बजे उपस्थित होने पर पूर्व निर्धारित स्थान महेन्द्र ट्रेक्टर शो रूम के सामने ग्राम तरेंगा लिमतरा भाटापारा रोड पहुंचे जहां प्रार्थी गंगाप्रसाद उपस्थित मिला जहां प्रार्थी का परिचय ट्रेप दल के सदस्यों से कराया गया । उसी समय प्रार्थी द्वारा द्वितीय शिकायत पत्र प्र.पी.02 दिया गया एवं रिकार्डेड डिजीटल वायस प्रस्तुत किया गया । प्रार्थी द्वारा प्रस्तुत द्वितीय
शिकायत पत्र का अवलोकन करने एवं रिकार्डेड डिजीटल वांयस को सुनने के पश्चात द्वितीय आवेदन पत्र पर टीप अंकित करने के पश्चात आरोपी के विरूद्घ प्रथम दृष्टया अपराध धारा 7 पी.सी. एक्ट 1988 का पाये जाने से अपराध पंजीबद्ध किया गया। वायस रिकार्ड में रिकार्डेड वार्तालाप का प्रार्थी के सहयोग से आवाज सुनकर प्र.पी.03 का लिप्यांतरण तैयार किया गया पश्चात लेपटाप की मदद से रिकार्डेड वार्तालाप का सी.डी.तैयार किया जाकर मूल सी.डी. को लिफाफा में रखकर प्र.पी.04 के अनुसार जप्त किया गया ।
5. प्रार्थी द्वारा पटवारी को रिश्वत के रूप में दिये जाने वाले रिश्वती रकम 1000-1000/-रूपये के 10 नोट, कुल 10,000/-नोट दिये जाने पर पंचसाक्षी ए.के.प्रसाद द्वारा उक्त नोट को अपने हाथ में लेकर गिनती किया गया तथा नोटों के नंबरों को पढ एवं बोलकर निरीक्षक एस.के.से द्वारा तैयार किये गये प्रारंभिक पंचनामा में नोट कराया गया एवं उक्त नोटों पर फिनाफथलीन पावडर लगाने के लिए सैनिक दशरथ धृतलहरे (अ०सा० 07) को दिये जाने पर उसके द्वारा नोटों के दोनों तरफ फिनाफथलीन की हल्की परत लगा कर प्रार्थी के पहने हुए पेंट के पीछे जेब में सावधानी पूर्वक रखवाया गया एवं प्रार्थी को समझाया गया कि उक्त नोट आरोपी के मांगने पर ही
उसके हाथ में देवे तथा रिश्वत देने के पहले और बाद में हाथ न मिलाने को कहा गया एवं यह भी समझाया गया था कि सिर से गमछा उतार कर ट्रेप दल के सदस्यों को ईशारा करना तथा यह भी ध्यान रखना कि उक्त रकम लेने के पश्चात कहां रखता है उसके पश्चात उसके निर्देश पर आरक्षक शिवप्रसाद साहू (अ०सा० 09) के द्वारा एक साफ कांच के गिलास में साफ पानी लेकर सोडियम कार्बोनेट का जलीय घोल तैयार किया गया जो रंगहीन था उस घोल में फिनाफथलीन पावडर लगाने वाले आरक्षक दशरथ धृतलहरे को छोडकर ट्रेप दल के सभी सदस्यों के हाथों की उंगलियों को डुबाया गया तो घोल के रंग में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ उस घोल को सभी को दिखाकर उसकी आवश्यकता नहीं होने पर फेक दिया गया। आरक्षक शिव प्रसाद साहू द्वारा पुन: सोडियम कार्बोनेट का जलीय घोल तैयार करवाकर फिनाफथलीन पावडर लगाने वाले आरक्षक के हाथों की उंगलियों को धुलवाये जाने पर घोल का रंग परिवर्तित होकर गुलाबी हो गया। उक्त घोल को सभी को दिखाकर समझाया गया कि, यदि आरोपी फिनाफथलीन पावडर लगे नोटों को अपने हाथों में लेगा तो उसके हाथों की उंगलियों में से फिनाफथलीन पावडर चिपक जायेगा और सोडियम कार्बोनेट का जंलीय घोल उसके हाथ धुलाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी हो जायेगा। उसके बाद आरक्षक दशरथ धृतलहरे से कोरे कागज पर फिनाफथलीन पावडर का नमूना पुडिया एवं साफ कागज पर उपयोग लागे गये पीतल सील नमूना तैयार कर पृथक-पृथक लिफाफो में सीलबंद कर प्र.पी.06 के अनुसार जप्त किया गया ।




6. पश्चात ट्रेप दल का गठन कर नोटों पर फिनाफथलीन पावडर लगाने वाले आरक्षक दशरथ धृतलहरे को ट्रेप दल में शामिल न कर उससे जप्त समान एवं फिनाफथलीन पावडर के डिब्बे के साथ ए.सी.बी.कार्यालय में रहने बोला गया तथा प्रार्थी को छाया साक्षी आरक्षक शिव प्रसाद साहू के साथ मोटर सायकल से आगे रवाना किया गया तथा ट्रेप दल के शेष सदस्यों एवं पंच साक्षी पीछे-पीछे शासकीय वाहन से पटवारी कार्यालय मोहता बिल्डिंग पहुंच कर प्रार्थी को आगे रवाना किया तथा ट्रेपदल के सभी सदस्य वाहन से उतर कर आपस में नजरी लगाव रखते हुए पटवारी कार्यालय के पास खडे हो गये तथा प्रार्थी एवं छाया साक्षी शिवप्रसाद साहू के साथ पटवारी के पास रिश्वत देने भेजा गया । प्रार्थी द्वारा आरोपी को रिश्वती रकम देकर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ईशारा किया गया तत्पचात् प्रार्थी के ईशारा पाकर ट्रेप दल के सभी सदस्य आरोपी राजीव तिवारी के कार्यालय में प्रवेश किये और आरेपी पटवारी राजीव तिवारी के दाहिने हाथ को निरीक्षक सेन एवं बांया हाथ को आरक्षक शिवप्रसाद साहू ने पकड लिये निरीक्षक सेन ने आरोपी को अपना परिचय दिया तथा आरोपी का नाम पता पूछने पर अपना नाम राजीव तिवारी पटवारी हल्का नं. 12 होना बताया गया ट्रेप दल प्रभारी श्री डी.एस.परिहार उप पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपी पटवारी से प्रार्थी गंगा प्रसाद वर्मा से दस हजार रूपये रिश्वत लेने की बात पूछने पर उसने रिश्वत लेने से इंकार किया तथा प्रार्थी से कोई रूपये नहीं लेना बताया गया । उसके पश्चात निरीक्षक सेन के निर्देश पर शिवप्रसाद साहू द्वारा आरोपी के हाथ छोडकर साफ कांच के गिलास में पानी लेकर सोडियम कार्बोनेट का जलीय घोल तैयार कर आरोपी एवं प्रार्थी को छोडकर ट्रेप दल के सभी सदस्यों का हाथ धुलाये जाने पर घोल रंगहीन रहा जिसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ जिसे कांच की शीशी में सीलबंद कर रखा गया । उसके बाद पुन: सोडियम कार्बोनेट का जलीय घोल तैयार कर आरोपी राजीव तिवारी के दोनों हाथों की उंगलियों को डुबाये जाने पर घोल का रंग गुलाबी हो गया जिसे एक साफ कांच की शीशी में सीलबंद किया गया । उसके बाद ट्रेप प्रभारी डी.एस.परिहार द्वारा प्रार्थी से लिया गया रिश्वती रकम लिये जाने के संबंध में पटवारी से पूछने पर रिश्वत लेने से इंकार किया तब प्रार्थी को बुलाकर पूछा गया तो प्रार्थी द्वारा बताया गया कि, आरोपी उसे अपने कंप्यूटर कक्ष में ले जाकर अपने हाथ में हाथ में रूपये लेना और कम्प्युटर टेंबल में रखना बताया जहां रिश्वती रकम दिखाई दे रहा था उक्त रिश्वती रकम को पंच साक्षी ए.के.प्रसाद द्वारा बरामद किया गया । संपूर्ण कार्यवाही में प्राप्त घोलों का रासायनिक परीक्षण कराया गया। परीक्षण रिपोर्ट में धनात्मक पाया गया। प्रार्थी से संबंधित दस्तावेज की जप्ती किया गया। घटनास्थल का नजरी नक्शा पटवारी के द्वारा तैयार करवाया गया तथा रिश्वत लेन-देन के समय की बातचीत के संबंध में लिप्यांतरण पंचनामा तैयार किया गया और सी.डी.तैयार की गयी तथा आरोपी को गिरफ्तार किया गया और देहाती नालिसी को राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण /एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर के अपराध क्रमांक 42/2016 में प्रथम सूचनापत्र दर्ज किया गया जो प्र.पी. 15 है । जप्तशुदा घोल एवं फिनाफथलीन पावडर को रासायनिक जांच के लिए राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला रायपुर प्र.पी.36 का प्रेषित किया गया । आरोपी की सेवा पुस्तिका हेतु तहसीलदार भाटापारा को प्र.पी. 42 का ज्ञापन भेजा गया उक्त ज्ञापन के परिपालन में तहसीलदार भाटापारा द्वारा प्र.पी. 22 के अनुसार ज्ञापन भेजा गया । तत्पश्चात गवाहों के कथन लेखबद्घ किया गया व राज्य शासन से आरोपी के संबंध में अभियोजन स्वीकृति हेतु विधि एवं विधायी कार्य विभाग न्यायिक रायपुर से प्राप्त किया गया जो प्र.पी. 26 है, तत्पश्चात विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) के समक्ष अभियोग पत्र दिनांक 23.12.2016 को प्रस्तुत किया गया ।
7. मेरे पूर्वाधिकारी श्री बृजेन्द्र कुमार शास्त्री विशेष न्यायाधीश(भ्रष्टाचार नि.अधिनियम) द्वारा दिनांक 18.01.2017 को आरोपी के विरूद्घ धारा 07, 13(1) (डी) व 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अन्तर्गत आरोप की विरचना की गयी। आरोपी का अभिवाकृ लिया गया जिस पर आरोपी ने अपना अपराध अस्वीकार किया और विचारण चाहा है । अभियोजन साक्ष्य के उपरांत धारा 313 द.प्र.सं. के अन्तर्गत अभियुक्त परीक्षण में आरोपी ने स्वयं को निर्दोष होना कहा और अपने कथन में कहा कि '' ए. सी.बी.वालों के सीखाने पर विद्वेषषश झूठ बोल रहे हैं, मैं निर्दोष हूँ , मुझे झूठा फंसाया गया हैं |'' तथा आरोपी ने अपने प्रतिरक्षा में साक्ष्य नहीं देना व्यक्त किया है।
8. अभियोजन ने अपने समर्थन में निम्न लिखित साक्षियों का साक्ष्य कराया गया है -
अभियोजन अभियोजन साक्षी का नाम साक्ष्य का प्रकार साक्षी क्र. अ.सा.01) श्री ए.के.प्रसाद पंचसाक्षी श्री अनिल बक्शी प्रथम सूचना पत्र लेख 02 (अ.सा.02) कर्ता। अ.सा.03) श्री खिलेश्वर प्रसाद पटवारी पटवारी नक्शा। अ.सा.04) श्री गंगाप्रसाद वर्मा प्रार्थी। 5 अ.सा.05) श्री महेश सिंह राजपूत आरोपी के पदस्थापना जानकारी अ.सा.06) श्री शादाब मेमन पंचसाक्षी | ((अ०सा० 10) श्री विश्वनाथ स्वर्णकार अभियोजन स्वीकृति 10 सहायक ग्रेड-3 9. आरोपी ने अपने समर्थन में किसी साक्षी का साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है।

प्रकरण के निराकरण हेतु निम्न विचारणीय प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है:-
1- क्या घटना दिनांक को आरोपी लोक सेवक के रूप में पटवारी हल्का नंबर 12 तहसील भाटापारा में पटवारी
के पद पर पदस्थ था ?
2- क्या घटना दिनांक को आरोपी के समक्ष प्रार्थी का नामांतरण एवं प्रमाणीकरण का कार्य लंबित था ?
3- क्या आरोपी, प्रार्थी का नामांतरण एवं प्रमाणी -करण संबंधी कार्य करने हेठु सक्षम प्राधिकारी था ?
4- क्या आरोपी द्वारा प्रार्थी के नाम पर नामांतरण एवं प्रमाणीकरण करने के बदले में वैध पारिश्रमिक से भिन्न राशि र 15, 000 रिश्वत के रूप में प्रार्थी से मांग की थी ?
5- क्या आरोपी द्वारा दिनांक 01.06.2016 को उपरोक्त कार्य के एवज में प्रार्थी से र 10,000 वैध पारिश्रमिक से भिन्न रिश्वत के रूप में प्राप्त किया था ?
6. क्या आरोपी द्वारा लोकसेवक के रूप में आपर्राधिक अवचार कारित किया गया हैं ?

विचारणीय प्रश्न क्रमांक 01 पर निष्कर्ष व निष्कर्ष के आधार:-
10. प्रकरण में आरोपी को पटवारी हल्का नंबर 12 तहसील भाटापारा, तहसील-भाटापारा पलारी, जिला बलौदाबाजार (छ.ग.) में पटवारी के पद पर पदस्थ रहना बताया गया है। इस संबंध में (अ.सा.11)एस.के.सेन ने बताया है कि, उसके द्वारा दिनांक 08.06.2016 को तहसीलदार भाटापारा आरोपी राजीव तिवारी की सेवा पुस्तिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्रदान करने हेतु एक पत्र प्रेषित किया था उक्त पत्र प्रदर्श पी 42 है। उक्त पत्र के परिपालन में तहसीलदार भाटापारा के द्वारा पुलिस अधीक्षक एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर को संबोधित करते हुए एक ज्ञापन प्रेषित कर आरोपी राजीव तिवारी पटवारी की सेवा पुस्तिका, नियुक्ति संबंधी प्रविष्टि एवं पटवारी हल्का नंबर 12 ग्राम टिकुलिया में आरोपी के पदस्थापना संबंधी दस्तावेजों की सत्य प्रतिलिपि प्रेषित किया। उक्त ज्ञापन प्रदर्श पी 24 है।
11. उक्त ज्ञापन के संबंध में अभियोजन की ओर से तहसीलदार महेश सिंह राजपूत (अ.सा.05) ने अपने परीक्षण में बताया है कि, दिनांक 28.06.2016 को कार्यालय पुलिस अधीक्षक एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर से अपराध क्रं० 42/2016 धारा 7,13(1)0,13(2)पी.सी.एक्ट आरोपी राजीव तिवारी हल्का पटवारी क्रमांक 12 टिकुलिया के प्रकरण के संबंध में उनके कार्यालय से निम्न जानकारी चाही गयी थी उन जानकारियों को उसके कार्यालय द्वारा प्र.पी. 22 के अनुसार आवश्यक दस्तावेजा संलग्न कर प्रेषित किया गया है जिसके अ से अ भाग पर उसके हस्ताक्षर है । आरोपी की सेवापुस्तिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्र.पी.23,आरोपी के कतरव्यों एवं उत्तरदायित्वों की विभागीय प्रपत्रों की प्रमाणित प्रतिलिपि, गोपनीय प्रतिवेदन प्रस्तुत किया है जो प्र.पी.24 है ।
12. प्रकरण में आरोपी के विरूद्घ दांडिक प्रकरण चलाने हेतु अभियोजन स्वीकृति प्रदान की गयी है जो प्र.पी.26 है। जिसमें आरोपी को टिकुलिया का पटवारी होना लेख है। उपरोक्त दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट है कि आरोपी पटवारी हल्का क्रमांक 12 ग्राम टिकुलिया तहसील भाटापारा जिला बलौदाबाजार में पटवारी के रूप में 
लोक सेवक के पद पर पदस्थ था। उपरोक्त आधारों पर यह स्पष्ट है कि, आरोपी पटवारी हल्का नंबर 12,ग्राम टिकुलिया, तहसील-भाटापारा, जिला बलौदाबाजार- भाटापारा (छ.ग.) में पटवारी के पद पर लोक सेवक के रूप में पदस्थ रहना प्रमाणित हो जाता है ।




विचारणीय प्रश्न क्रमांक 02 एवं 03 पर निष्कर्ष व निष्कर्ष के आधार -
13. प्रकरण में प्रार्थी अ०सा० 4 गंगा प्रसाद वर्मा का कहना है कि, उसने कमल किशोर के पावर ऑफ एटार्नि के माध्यम से तिजेश्वर निषाद की भूमि क्रय की थी जिसके नामांतरण हेतु वह तहसीलदार एवं पटवारी के पास चक्का लगाया करता था उसके पश्चात उसे एक दलाल के माध्यम से उसका काम करवाने के लिए पन्द्रह हजार
रूपये की मांग उक्त दलाल ने की थी उसे उक्त दलाल का नाम मालूम नहीं था जिस कारण वह ए.सी.बी.कार्यालय शिकायत करने के लिए गया था। जहां उसने बताया कि दलाल के द्वारा उसका नामांतरण करवाये जाने के लिए पन्द्रह हजार रूपये की मांग की जा रही है।
14. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया कि, उसने पिलेश्वर निषाद के स्वामित्व की भूमि खसरा नं. 677/1 रकबा 0.470 हे. को आम मुख्त्यार के आधार पर कमल किशोर से खरीदा था। साक्षी यह स्वीकार करता है कि उसने उक्त भूमि की संपूर्ण राशि चेक के माध्यम से कमल किशोर को दे दिया। साक्षी यह भी स्वीकार करता है कि रजिस्ट्री बैनामा मिलने के पश्चात वह तहसील कार्यालय भाटापारा गया था। साक्षी ने इस बात से इंकार किया कि भाटापारा तहसील आफिस में उसे पता चला कि पिलेश्वर निषाद ने उक्त भूमि के नामांतरण पर आपत्ति लगाया है। स्व्त: कहता है कि जब वह पटवारी कार्यालय गया था तब आरोपी ने उसे बताया था कि जिस जमीन को आप खरीदे है उस जमीन पर तहसीलदार के न्यायालय में नामांतरण व प्रमाणीकरण की कार्यवाही पर रोक लगाये जाने हेतु आपत्ति किया है। साक्षी ने यह स्वीकार किया कि उसके पश्चात वह तहसीलदार भाटापारा में गया था। जहां उसे पता चला कि पिलेश्वर ने नांमातरण व प्रमाणीकरण पर आपत्ति किया है जिसके संबंध में तहसीलदार भाटापारा ने उसे भी नोटिस दिया था। आरोपी अधिवक्ता के द्वारा दस्तावेज दिखाकर साक्षी से प्रतिपरीक्षण किया गया है जिसमें साक्षी ने आदेश पत्र दिनांक 10.05.20 16 प्र.डी.01 पिलेश्वर द्वारा तहसीलदार को दिया गया आवेदन प्र.डी.02 है। नोटिस प्र.डी.05 तथा कमल किशोर को दी गयी नोटिस प्र.डी.06 व पिलेश्वर को दी गयी नोटिस प्र.डी.07 है प्रार्थी को दी गयी नोटिस प्र.डी.08 है।
15. साक्षी ने स्वीकार किया है कि, नामांतरण और प्रमाणीकरण करने का अधिकार तहसीलदार का है और तहसीलदार के आदेश पर ही नामांतरण और प्रमाणीकरण को पटवारी पंजी में चढाता है । स्वत: कहता है कि, भूमि के नामांतरण हेतु सर्वप्रथम आवेदन पटवारी को देते है।
16. प्रकरण में प्रार्थी ने नामांतरण व प्रमाणीकरण का कार्य लंबित होना कहा है और अपने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार करता है कि, नामांतरण और प्रमाणीकरण का अधिकार तहसीलदार को है तथा आरोपी से सीधे बात न होना और दलाल के द्वारा उक्त काम करवाये जाने का कथन करना दर्शित होता है। प्रकरण में प्रस्तुत दस्तावेज प्र..डी.01 से लेकर प्र.डी. 11 तक के दस्तावेज में तहसीलदार के समक्ष उक्त आवेदन प्रस्तुत किया जाना दर्शित होता है वैसे भी नामांतरण का कार्य तहसीलदार का होता है और पटवारी का कार्य नहीं होता है यद्यपि पटवारी उक्त प्रतिवेदन तैयार करता है। परन्तु प्रार्थी ने आरोपी के द्वारा आरोपी के समक्ष अपने नामांतरण का कार्य लंबित नहीं रहना बताया है। तथा प्रार्थी ने अपनी भूमि के नामांतरण हेतु आरोपी के समक्ष कोई आवेदन लिखित में नहीं देना स्वीकार किया है। साथ ही भू राजस्व संहिता के प्रावधानों के अनुसार नामांतरण का अधिकार तहसीदार को होता है।
17. चूंकि नामांतरण का अधिकार तहसीलदार को होता है और प्रार्थी ने आरोपी को कोई भी आवेदन नहीं देना बताया है। जिससे आरोपी के समक्ष प्रार्थी का कोई कार्य लंबित रहने की स्थिति दर्शित नहीं होती है। साथ ही दलाल के माध्यम से नामांतरण के संबंध में जानकारी होना बताया है । ऐसी स्थिति में आरोपी के समक्ष प्रार्थी
का कोई कार्य लंबित रहना प्रमाणित नही हो पाता है। प्रकरण में छ.ग.भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों के अनुसार नामांतरण करने का अधिकार तहसीलदार का होता है जिससे आरोपी प्रार्थी का कार्य करने हेतु सक्षम प्राधिकारी होना प्रमाणित नहीं हो पाता है और आरेपी के समक्ष प्रार्थी का कोई कार्य लंबित रहना भी प्रमाणित नहीं हो पाता है।




विचाणीय प्रश्न क्रमांक 04 ,05 व 06 पर निष्कर्ष एवं निष्कर्ष के आधार-
18. प्रार्थी गंगा प्रसाद वर्मा अ०सा० 04 का कहना है कि, एक दलाल के माध्यम से उसका काम करवाने के लिए पन्द्रह हजार रूपये की मांग उक्त दलाल ने किया था जिसका नाम उसे नहीं मालूम है तब वह शिकायत करने ए.सी.बी.कार्यालय चला गया । जहां उसने बताया कि, एक दलाल के द्वारा नामांतरण करवाये जाने के लिए पन्द्रह हजार रूपये की मांग की जा रही है तब ए.सी.बी.कार्यालय में उससे पूछा गया कि, किसके विरूद्घ शिकायत करना चाहते हो तब उसने बताया कि, हो सकता है पटवारी ही मांग रहा हो जिस कारण उसने पटवारी के विरूद्घ शिकायत की थी।
19. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया है कि, वह जमीन के नामांतरण हेतु पटवारी के पास गया था । तब आरोपी ने उससे कहा था कि जमीन के नामांतरण के संबंध में पिलेश्वर ने आपत्ति लगाया है । साक्षी ने इस बात से इंकार किया कि पटवारी ने उससे नामातरण के संबंध में पैसे की मांग की थी। स्वत: कहा कि तहसीलदार से करवा लो कहा था। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया है कि, दिनांक 01.06.2016 को आरोपी ने अपने कार्यालय में उससे प्रत्यक्ष रूप से रिश्वत की मांग नहीं की थी। स्वत: कहा कि, आरोपी से उसकी केवल मोबाईल पर बात हुई थी और आमने-सामने कोई बात नहीं हुई थी। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि, उसने मोबाईल में आरोपी को कहा था कि, तहसीलदार आपको कार्यालय में बुला रहे है इसके अलावा और कोई बात नहीं हुई थी।
 20. साक्षी से धारा 165 साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत प्रश्न पूछे गये हैं । जिसमें दलाल लोगों ने दस हजार रूपये स्वयं को देने के लिए कहा था बताया है और उसने सोचा कि पटवारी ने पैसे की मांग की है जिस कारण उसने पटवारी को ले जाकर दिया था। इस प्रकार स्वयं प्रार्थी ने आरोपी के द्वारा पैसे की मांग किये जाने की बात को समर्थन प्रदान नहीं किया है।
 21, अभियोजन के द्वारा आरोपी की मांग के संबंध में टेप रिकार्ड और लिप्यांतरण पंचनामा जिसमें रिश्वत पूर्व बातचीत प्र०पी० 03 है और उसकी सी.डी.लेपटाप के माध्यम से तैयार की गयी जिसका जप्तीपत्र प्र०पी0 04 है। इस संबंध में अ०सा० 11 एस.के.सेन ने बताया है कि प्रार्थी के द्वारा दिनांक 28.05.2016 को ए.सी.बी. में आवेदन प्रस्तुत किया था जो प्र.पी. 19 है उक्त लिखत आवेदन के सत्यापन के लिए उसने प्रार्थी को डिजीटल वायस रिकार्डर को चलाने की विधि समझा कर दिया था जिसका पंचनामा प्र.पी.20 है जिसके ब से ब भाग पर उसके हस्ताक्षर है। दिनांक 30.05.2016 को प्रार्थी ने उसे फोन करके बताया कि, उसने आरोपी के साथ दिनांक 29.05.2016 को कार्यालय में जाकर बातचीत कर रिश्वत मांग वार्ता को रिकार्ड किया है जिसमें आरोपी दस हजार रूपये लेने के लिए सहमत हो गया है। तब उसने प्रार्थी को दिनांक 01.06.2016 को उक्त रिकार्डेड वार्तालाप और द्वितीय शिकायत आवेदनपत्र के साथ लिमतरा भाटापारा रोड मेहन्द्रा ट्रेक्टर शो-रूम के सामने मिलने के लिए कहा था।
 22. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया है कि उक्त डिजीटल वायस रिकार्डर में पहले से कोई आवाज मौजूद थी या नहीं अथवा खाली था अथवा नहीं इसकी उसने कोई जांच नहीं किया है। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि उसने दिनांक 28.05.2016 को डिजीटल वायंस रिकार्डर को प्रार्थी को दिया था जिसे प्रार्थी ने उसे दिनांक 01.06.2016 को वापस किया था। साक्षी ने स्वीकार किया कि उक्त अवधि में वाईस रिकार्डर प्रार्थी के पास था और यदि इस बीच प्रार्थी ने किसी और की बातचीत को पुन: रिकार्ड कर लिया हो तो वह नहीं जानता । साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि उक्त वाईस रिकार्डर में कितने लोगों की आवाज थी वह नहीं बता सकता है। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि वह घटना के पूर्व आरोपी के आवाज को नहीं पहचानता था। साक्षी यह भी स्वीकार करता है कि लिप्यांतरण पंचनामा में दस हजार रूपये दोगें तब प्रमाणीकरण नामांतरण और ऋणपुस्तिका बनाउंगा वाली बात नहीं है। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि, उक्त वाईस रिकार्डर में किसी अन्य व्यक्ति की भी आवाज थी।
 23, अ०सा० 04 गंगाप्रसाद वर्मा का कहना है कि इसे शिकायत प्रस्तुत करने के बाद एक माईक्रो वाईस रिकार्डर दिया गया था जिसके संबंध में पंचनामा प्र.पी.20 है वह उक्त टेप रिकार्ड को लेकर आरोपी के कार्यालय में गया था और वहां अत्यधिक भीड थी जिस कारण वह टेप रिकार्ड ठीक से चालू नहीं कर पाया था। प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने दिनांक 01.06.2016 को लिमतरा भाटापारा रोड में महिन्द्रा शो-रूम के सामने ए.सी.बी.वालों द्वारा उक्त वायस रिकार्डर की रिकार्डिंग को सुना जाना इंकार किया है और उसका लिप्तयांतरण पंचनामा बनाया जाना भी याद नहीं होना कहा है। साक्षी ने उक्त टेप रिकार्ड की सी.डी.बनाये जाने को भी इंकार किया है।
 24. अ०सा० 01ए.के.प्रसाद पंच साक्षी है जिसने अपने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि, उसने डिजीटल वायस रिकार्डर को सुना था जिसमें स्पष्ट आवाज नहीं थी और कौन क्या बोल रहा है यह समझ नहीं आ रहा था। अ०सा० 06 शादब मेमन जो भी अन्य पंच साक्षी है उसने अतिरिक्त लोक अभियोजक के द्वारा सूचक प्रश्न पूछे जाने पर प्रार्थी द्वारा प्रस्तुत टेप रिकार्ड की रिकार्डिंग को सुनना इंकार किया है। अ०सा० 07 दशरथ लाल धृतलहरे सैनिक ने अपने प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि जो सी.डी.जप्ती की गयी थी वह खाली थी। 25. प्रकरण में डिजीटल वॉयस रिकार्डर कैसेट के आधार पर रिकार्ड किया जाता है और ऐसे बातचीत को प्रमाणित करने के संबंध में उक्त टेप में जिन व्यक्तियों की आवाजें है उनका आवाज का नमुना लेकर परीक्षण किया जाता है परन्तु प्रकरण में ऐसी कोई जांच कराये जाने का उल्लेख नहीं है। ऐसी स्थिति में उक्त बातचीत आरोपी से ही की गयी है यह स्पष्ट नहीं हो पाता है साथ ही उक्त टेप की आवाजों का भी परीक्षण नहीं करवाया गया है तथा टेप रिकार्ड दो दिन विलंब से प्रार्थी द्वारा जमा किया गया है और उक्त टेप रिकार्ड सीलबंद भी नहीं किया गया था । तथा स्वयं प्रार्थी ने आरपी के पास जाने पर उक्त टेप रिकार्ड को चालू नहीं कर पाना बताया है। जिससे भी स्वयं प्रार्थी के साक्ष्य से उक्त वॉयस रिकार्डर की बातचीत और लिप्यांतरण पंचनामा की कार्यवाही को समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता है।
 26. टेप रिकार्डर से टेप की गई वार्ता को साक्ष्य अधिनियम की धारा 3 के अंर्तगत दस्तावेज की श्रेणी में रखा गया है इस संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायदृष्टांत Ziyauddin Barhanuddin Bukhari Vs Brijmohan Ramdass Mehra and others में टेप रिकार्ड को साक्ष्य में ग्राहय होने की शर्ते बतायी गयी है-




it was held by this court that taperecords of speeches were "documents". as defined by Section 3 of the Evidecne Act, which stood on no different footing than photograplhs, and that they were admissible in evidence on staisfying the following conditions : " (a) The voice of the person alleged to be speaking must be duly identified by the maker of the record or by others who know it. (b) Accuracy of what was actually recorded had to be proved by the maker of the record and satisfactory evidence , direct or circumstantial, had to be there so as to rule out possibilities of tamering with the record. (c) The subjectmatter recorded had to be shown to be relevant according to rules of 1 (1976) 2 SCC 17 : 1975(supp) SCR 281 relevancy found in the Evidence Act." 
 27. इसी प्रकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांत R.M.Malkani v. State of Maharashtra में टेप अभिलिखित बातचीत के साक्ष्य में ग्राहय होने की शर्ते बतायी गयी है-
this Court has observed that tape recorded conversation is admissible provided first the conversation is rlevant to the matters in issue: secondly, there is identification of the voice; and, thirdly the accuracy of the tape recorded conversation is proved by eliminating the possiblility of erasing the tape record. 
28. इसके अतिरिक्त प्रकरण में रिश्वत मांगे जाने के संबंध में रिश्वत मांग वार्ता को प्रार्थी व आरोपी के मध्य हुए वार्तालाप को टेप रिकार्ड के माध्यम से टेप किया गया है जिसका लिप्यांतरण पंचनामा तैयार किया गया है। चूंकि लिप्यांतरण पंचनामा को इलेक्ट्रानिक माध्यम से तैयार किया गया है ऐसी स्थिति में वह इलेक्ट्रानिक साक्ष्य की श्रेणी में आता है और ऐसे इलेक्ट्रानिक साक्ष्य को साक्ष्य में ग्राह्य किये जाने हेतु धारा 65(8) साक्ष्य अधिनियम का प्रमाण पत्र होना आवश्यक है । इस संबंध में माननीय 2 (1973)19300471:1973 (2) 507 417 सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा प्रतिपादित न्याय दृष्टांत Anvar P.V. Vs P.K.Basheer & Others में इलेक्ट्रानिक एविडेंस की ग्राह्यता के संबंध में सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं और प्रकरण में लिप्यांतरण पंचनामा के संबंध में धारा 65(B)साक्ष्य अधिनियम का कोई प्रमाण पत्र नहीं है ऐसी स्थिति में लिप्यांतरण पंचनामा एवं रिश्वत लेन-देन वार्ता से अभियोजन को कोई सहायता प्राप्त नहीं हो पाती है।
29. अ०सा० 04 गंगाप्रसाद वर्मा ने बताया है कि, घटना दिनांक को रिश्वती रकम को उसे फिनाफथलीन पावडर लगाकर दिया गया तथा उसके साथ ए.सी.बी.का एक अधिकारी रिश्वती रकम दिये जाते समय गया था उसे निर्देश दिया गया था कि, रिश्वती रकम देने के पश्चात वह सिर का गमछा खोलकर संकेत देगा। वह जब आरोपी के कार्यालय गया तब उस समय वह कार्यालय में नही था उसके पश्चात उसने आरोपी को फोन करके कहा कि, उसे तहसीलदार बुला रहे हैं तब आरोपी आया उस समय बहुत धूल उड रही थी इसलिए वह अपने आंख को पोछने के लिए सिर से गमछा उतार कर आंख पोछने लगा । जिसे ए.सी.बी.वाले ईशारा समझ कर आ गये तब उसने हडबडाहट में रिश्वती रकम को आरोपी के टेबल में रख दिया था। उस समय आरोपी वहां पर मौजूद नहीं था। इसके पश्चात ए.सी.बी.वाले कार्यालय में आकर उससे पूछे कि पटवारी कौन है तब उसने आरोपी की ओर ईशारा किया तब ए.सी.बी.वाले आरोपी को पकड लिए और उसके पश्चात ए.सी.बी.वालों ने उससे पूछा कि, रूपया कहां है तब उसने बताया कि, रूपया टेबल के उपर है।
30. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया है कि, आरोपी से दस हजार रूपये रिश्वत लेने की बात पूछे जाने पर आरोपी ने इंकार किया था। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि,घटना दिनांक को उसने आरेपी को कोई रकम नहीं दिया था | इस साक्षी से धारा 165 साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत प्रश्न पूछे गये हैं जिसमें पूछा गया है कि, जब साक्षी ने पटवारी को पैसा नहीं दिया है और टेबल पर रख दिया है उक्त बात को ए.सी.बी.को बताया था या नहीं जिस पर प्रार्थी ने बताया कि उसने उक्त बात ए.सी.बी.को नहीं बतायी उक्त बात नहीं बताने का कारण पूछे जाने पर साक्षी ने बताया कि, ए.सी.बी.वालों ने उससे पैसा कहां है पूछा था और पैसे देने के संबंध में पूछा था जिसे उसने टेबल पर रखना बताया था। इस संबंध में पुन: साक्षी से प्रश्न पूछा गया कि किसे पैसा देना बताये थे तब साक्षी ने पटवारी को दस हजार रूपये नामांतरण के लिए देना बताया था। तत्पश्चात साक्षी से पुन: पूछा गया कि, नामांतरण के लिए दस हजार रूपये देने की बात किसने बतायी थी जिस पर साक्षी ने बताया कि उसे दलाल लोगों ने बताया था और दलाल लोगों ने स्वयं को पैसा देने के लिए कहा था। साक्षी का कहना है कि उसने सोचा कि पटवारी ने पैसे की मांग की है जिस कारण पटवारी को लेकर दिया था।
 31. प्रकरण में प्रार्थी ने आरोपी को रिश्वती रकम नही देने की बात कही है और आरोपी के टेबल में रिश्वती रकम को रख देना बताया है और उस समय आरोपी को वहां पर मौजूद नहीं रहना बताया है। अ०सा० 1 ए.के. प्रसाद जो कि पंचसाक्षी है ने बताया है कि आरपी की तलाशी लेने पर कोई पैसा नहीं मिला तब प्रार्थी से पूछने पर प्रार्थी ने बताया कि पैसा उसने टेबल पर रखा है तब टेबल से पैसे को उठाकर नंबर का मिलान किया गया था । तथा साक्षी ने बताया है कि, ए.सी.बी.के कर्मचारी ने सादा पानी लेकर घाल बनाया था जिसमें आरोपी का हाथ धुलाये जाने पर घोल का रंग परिवर्तित नहीं हुआ था। प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने यह स्वीकार किया है कि पटवारी कार्यालय के पास तोड-फोड चल रही थी और धूल उड रही थी। साक्षी यह भी स्वीकार करता है कि जहां वह खडा था वहां से आरोपी का कमरा नहीं दिखाई देता है।




32. अ०सा० 06 शादाब मेमन पंच साक्षी ने बताया है कि, आरोपी जहां था वहां ए.सी.बी.वालें कुछ कार्यवाही कर रहे थे जिसे वह स्पष्ट रूप से नहीं देख पाया था।अतिरिक्त लोक अभियोजक के द्वारा सूचक प्रश्न पूछने पर साक्षी ने इस बात की जानकारी नहीं होना कहा है कि अरोपी से रिश्वत की बात पूछने पर आरोपी ने इंकार किया था और यह स्वीकार किया कि प्रार्थी को बुलाकर पूछने पर प्रार्थी ने बताया कि आरोपी ने कम्प्यूटर कक्ष में ले जाकर रूपये लेकर कम्प्यूटर टेबल में रखा है। साक्षी ने स्वीकार किया है कि पंच साक्षी ए.के. प्रसाद ने उक्त नोट को कम्प्यूटर टेबल से उठाया था । साक्षी ने इस बात की जानकारी नहीं होना कहा कि घोल में आरोपी का हाथ धुलाये जाने पर उसका रंग गुलाबी हो गया था।
33. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया है कि, पटवारी कार्यालय के आस- पास तोड-फोड की कार्यवाही चल रही थी और वहां बहुत भीड थी और धूल भी उड रहा था। साक्षी ने स्वीकार किया कि, पटवारी कार्यालय के अंदर थोडी देर रूक कर नास्ता करने बाहर चला गया था। साक्षी ने यह स्वीकार किया कि आरोपी के कार्यालय में कम्प्यूटर टेबल में नोट को किसने रखा है उसने नहीं देखा है और यह भी स्वीकार करता है कि ए.सी.बी.वालों ने प्रार्थी से पूछा था तब प्रार्थी ने बताया कि उसने कम्प्यूटर टेबल में नोट को रखा है। 34. अ०सा० 08 रविशंकर तिवारी निरीक्षक हमराह ने बताया है कि, प्रार्थी के द्वारा ईशारा करने के पश्चात तब वे लोग आरेपी के कार्यालय में गये और आरेपी से रिश्वती रकम लेने के संबंध में पूछने पर आरोपी ने इंकार किया और रिश्वती रकम कहां रखे हो यह पूछने पर आरेपी ने रिश्वत लेने से इंकार किया तब प्रार्थी को बुलाकर पूछा गया जिसमें प्रार्थी ने बताया कि उसे कम्प्यूटर रूम ले गये थे जिसमें कम्प्यूटर टेबल के उपर रिश्वती रकम को रखे थे। साक्षी का कहना है कि आरोपी का हाथ घोल में डुबाये जाने पर घोल का रंग हल्का परिवर्तित हुआ था जो गुलाबी नहीं हुआ था।
35. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने यह स्वीकार किया कि आरोपी के कार्यालय के आस-पास तोड-फोड की कार्यवाही चल रही थी जिस कारण बहुत भीड थी और बहुत धुल उड रहा था। साक्षी ने स्वीकार किया कि, पटवारी कार्यालय में चार रूम थे और जिस रूम में आरोपी को पकडे थे उस रूम में रिश्वती रकम नहीं थी और वहां से कम्प्यूटर टेबल नहीं दिख रहा था। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि, आरपी की तलाशी लेने पर उसकी जेब से कुछ नहीं निकला था। तब प्रार्थी को बुलाकर रिश्वती रकम के संबंध में पूछताछ करने पर प्रार्थी ने बताया था कि रिश्वती रकम कम्प्यूटर टेबल के पास रखा है।
36. अ०सा० 09 शिव प्रसाद साहू आरक्षक ने बताया है कि उसे छाया साक्षी के रूप में प्रार्थी के साथ भेजा गया था और जब प्रार्थी रिश्वत देने आरोपी के कार्यालय के अंदर गया था तब वह बाहर ही खडा था । उसके पश्चात प्रार्थी के ईशारा मिलने पर ए.सी.बी.वाले अंदर चले गये और आरोपी को पकड लिये थे। तब उसने घाल कार्यवाही की थी। आरेपी से रिश्वती रकम के संबंध में पूछने पर आरोपी ने रिश्वत लेने से इंकार किया था इसके पश्चात प्रार्थी को बुलाकर पूछने पर प्रार्थी ने रिश्वती रकम को कम्प्यूटर टेबल में रखना बताया था। उक्त कम्प्यूटर कक्ष में आरोपी को साथ ले जाकर प्रार्थी द्वारा बताये गये कम्प्यूटर टेबल से पंच साक्षियों द्वारा ढूढने पर नोट प्राप्त हुआ था। साक्षी ने बताया कि उसने आरोपी के उंगलियों को घोल में डुबाया था तब घोल का रंग हल्का गुलाबी हो गया था।
37. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया कि, जिस कमरे में आरोपी को पकडे थे उसके दूसरे कमरे में रिश्वती रकम बरामद हुआ था। साक्षी यह भी स्वीकार करता है कि जिस रूम में आरोपी को पकडा गया था वहां से रिश्वती रकम रखा हुआ कम्प्यूटर टेबल नहीं दिखायी देता। साक्षी यह स्वीकार करता है कि पटवारी कार्यालय के कम्प्यूटर टेबल पर किसने रिश्वती रकम को रखा था वह नहीं देख पाया था।
38. अ०सा० 11 एस.के.सेन विवेचना अधिकारी ने बताया है कि, प्रार्थी का ईशारा पाकर जब वे लोग आरोपी के कार्यालय के अंदर गये तब आरोपी से पूछने पर आरोपी ने रिश्वत लेने से इंकार किया तब प्रार्थी को बुलाकर पूछने पर प्रार्थी ने बताया कि आरोपी ने कम्प्यूटर कक्ष में ले जाकर रिश्वती रकम को अपने हाथ में लिया और कम्प्यूटर टेबल पर रखवा दिया था। आरोपी का हाथ घोल से धुलाये जाने पर घोल का रंग परिवर्तित होकर हल्का गुलाबी हो गया । साक्षी ने आरोपी के हाथ के घोल को प्र.पी.45 के रूप में पहचाना है। 39. प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने इंकार किया कि प्र.पी.45 में गुलाबी घोल नहीं है। साक्षी ने आरेपी के कार्यालय के पास तोडफोड की कार्यवाही होने की जानकारी नहीं होना कहा। साक्षी ने स्वीकार किया कि आरेपी की तलाशी लेने पर आरिपी के पास से रिश्वती रकम की बरामदगी नहीं हुई थी। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि, आरोपी से रिश्वती रकम के संबंध में पूछने पर आरापी ने अनभिज्ञता जाहिर की थी और किसी से रिश्वती रकम नहीं लेना कहा था। साक्षी ने स्वीकार किया कि, तत्पश्चात प्रार्थी को बुलाकर पूछने पर प्रार्थी ने दूसरे कमरे में कम्प्यूटर टेबल के उपर रिश्वती रकम को रखा होना बताया था। साक्षी ने यह भी स्वीकार किया कि जिस कमरे में उन्होंने आरोपी को पकडा था उस कमरे से दूसरे कमरे में रखा हुआ कम्प्यूटर टेबल दिखाई नहीं देता था | साक्षी ने यह स्वीकार किया कि, रिश्वती रकम दूसरे कमरे के कम्प्यूटर टेबल में रखा हुआ था।
40. प्रकरण में स्वयं प्रार्थी ने आरापी को रिश्वती रकम देने से इंकार है और रिश्वती रकम को टेबल पर रख देना बताया है और प्रकरण में रिश्वती रकम आरोपी के शरीर से बरामद नहीं हुई है साथ ही जिस कक्ष में आरोपी था उस कक्ष से भी रिश्वती रकम बरामद नही हुई है और रिश्वती रकम दूसरे कमरे में रखे कम्प्यूटर टेबल से बरामद हुआ है। आरोपी का हाथ धुलाने पर घोल का रंग परिवर्तित नही होना पंच साक्षी ए.के. प्रसाद ने स्वीकार किया है। जिससे दर्शित होता है कि, आरोपी ने रिश्वती रकम को हाथ में नहीं लिया है इसके अतिरिक्त अन्य साक्षियों ने आरापी का हाथ धुलाये जाने पर हल्का गुलाबी होना बताया है जिससे इस बिन्दु पर विरोधाभाष की स्थिति दर्शित हो रही है। साथ ही आरोपी के द्वारा प्रार्थी से रिश्वती रकम की मांग किया जाना भी प्रमाणित नही हुआ है जो ऐसे अपराधों में आवश्यक शर्त है साथ ही आरोपी के समक्ष प्रार्थी का कार्य लंबित नही था और आरोपी प्रार्थी का कार्य करने हेतु सक्षम प्राधिकारी भी नहीं है जिससे उपरोक्त आधारों पर अभियोजन के प्रकरण पर सन्देह करने का आधार उत्पन्न हो जाता है।
41. प्रकरण में मात्र रिश्वती रकम की बरामदगी से आरोपी को दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता। इस संबंध विभिन्न न्यायदृष्टांतों में सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं जिनमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय Krishan Chander Vs. State of Delhi तथा C.M.Girish Babu v. CBI, Cochin तथा M.Narsinga Rao v. State of A.P. माननीय छ.ग. माननीय छ.ग.उच्च न्यायालय के न्यायदृष्टांत S.K.Nande v State of Madhya Pradesh में इसी प्रकार के सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं।
42, उपरोक्त साक्ष्य की विवेचना के आधार पर आरोपी के समक्ष प्रार्थी का कोई कार्य लंबित रहना प्रमाणित नहीं हुआ है इससे आरोपी के द्वारा रिश्वत की मांग किया जाना और रिश्वत की रकम स्वेच्छापूर्वक प्राप्त किया जाना भी सन्देह से परे प्रमाणित नहीं हो पाता है तथा आरोपी के कब्जे से रिश्वती रकम की जप्ती भी नहीं हुई है । ऐसी स्थिति में आरोपी के द्वारा लोक सेवक के रूप में प्रार्थी से रिश्वत की राशि प्राप्त करना और लोक सेवक के रूप में अवचार कारित किया जाना सन्देह से परे प्रमाणित नहीं हो पाता है।
43. उपरोक्त सभी आधारों पर अभियोजन अपना प्रकरण आरोपी के विरूद्घ धारा (डी) व 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के अन्तर्गत सन्देह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा है। अत: सन्देह का लाभ देकर आरोपी राजीव तिवारी को धारा 07,13(1)(डी) व 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के आरोप से दोष मुक्त किया जाता है। 
44. आरोपी दिनांक 01.06.2016 से 04.08.2016 तक कुल दो माह 05 दिन न्यायिक अभिरक्षा में निरूद्ध रहा है। 45. प्रकरण में जप्त संपत्ति 10,000/-(दस हजार रूपये) 1000/-, 1000/-(एक-एक हजार रूपये का दस नोट) की राशि अपील अवधि पश्चात् प्रार्थी को वापस किया जावे अन्यथा किसी दावेदार के उपस्थित न होने पर धारा 458 दं.प्र.सं. के अन्तर्गत कार्यवाही की जावे । प्रकरण में जप्तशुदा 7 नग सीलबंद घोल की शीशियां, दो नग सीलबंद लिफाफा, एक पैकेट में फुलपेंट एवं पर्स, दो नग सी.डी. अपील अवधि बाद नष्ट किया जावे। प्रकरण में जप्त ग्राम टिकुलिया पटवारी हल्का नं. 12 रा.नि.मं. भाटापारा का नामांतरण पंजी वापस किया जावे, अपील होने की दशा में माननीय अपीलीय न्यायालय के निर्देशानुसार निराकरण किया जावे।
निर्णय खुले न्यायालय में दिनांकित हस्ताक्षरित व मुद्रांकित कर घोषित।
मेरे निर्देश में टंकित।
सही /-

(प्रफुल्ल सोनवानी
विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार अधि.) 
बलौदाबाजार (छ.ग.) 




छत्तीसगढ़ शासन विरुद्ध पुरूषोत्तम उर्फ छोटू यादव

सत्र प्रकरण क्रमांक-150/2017
न्यायालय : प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दुर्ग (छ.ग.)
(पीठासीन अधिकारी : अजीत कुमार राजभानू)
सत्र प्रकरण क्रमांक-150/2017
(अप.क्र.55/2017, थाना कुम्हारी)
संस्थित दिनांक : 08-08-2017
छत्तीसगढ़ शासन, द्वारा : थाना प्रभारी,
आरक्षी केन्द्र कुम्हारी, जिला दुर्ग (छ.ग.)                                                                        ..... अभियोजन

।। विरुद्ध ।।
1. पुरूषोत्तम उर्फ छोटू यादव पिता संतोष यादव उम्र 19 वर्ष ।
2. मुकेश पटेल पिता भागवत पटेल, उम्र 19 वर्ष ।
3. ताराचंद पटेल उर्फ तमाडू़ पिता संतोष पटेल, उम्र 18 वर्ष ।
4. मुकेश साहू पिता जनकू साहू, उम्र 19 वर्ष ।
5. प्रताप पटेल पिता शत्रुहन पटेल, उम्र 19 वर्ष ।
6. सेतुराम धु्रव उर्फ सेतु पिता पूरन धु्रव, उम्र 22 वर्ष ।
7. रोशन यादव पिता रामनारायण यादव, उम्र 20 वर्ष ।

सभी निवासी : महामाया पारा, बाजार चौक,
पटेल पारा, कुम्हारी, जिला दुर्ग (छ.ग.)                                              ..... अभियुक्तगण

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न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी (कु. रूपल अग्रवाल), भिलाई-3 द्वारा दाण्डिक प्रकरण क्रमांक-331/2017 में पारित उपार्पण आदेश दिनांक 27-07-2017 से उद्भुत सत्र प्रकरण ।
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राज्य की ओर से सुश्री फरिहा अमीन, अपर लाक अभियाजक। अभियुक्तगण की ओर से श्री संतोष शर्मा एवं श्री चेतन तिवारी, अधिवक्तागण ।
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।। निणर्य ।।
(आज दिनांक 30-05-2018 का घाषित किया गया)
1- अभियुक्तगण के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा-148, 294, 506(बी) एवं 329 सहपठित धारा-34 के अंतर्गत यह आरोप है कि उन्हांने दिनांक 13-03-2017 को 19.00 बजे विकास मिश्रा के घर के सामने, 320 कॉलोनी अटल आवास, कुम्हारी में आपस में मिलकर सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में हॉकी स्टिक, डण्डा, बेल्ट आदि वस्तुओं से सज्जित होकर जमाव कर, बलवा करते हुये सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में रविभूषण सिंह का मॉं, बहन की गंदी-गंदी अश्लील गाली -गलौज कर रविभूषण सिंह को जान से मारने की धमकी देकर आपराधिक अभित्रास कारित किया एवं सभी अभियुक्तगण ने एक साथ मिलकर सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में रविभूषण सिंह से शराब पीने के लिय पैसे मांगकर, पैसे देने हेतु मजबूर करने के लिये उद्यापन करते हुये हॉकी स्टिक, लाठी, डण्डा, बेल्ट एवं हाथ-मुक्का से मारकर स्वेच्छया घार उपहति कारित किया ।
2- अभियोजन कहानी का सार संक्षेप में इस प्रकार है कि प्रार्थी विनाद कुमार सिंह द्वारा दिनांक 14-03-2017 को थाना कुम्हारी में इस आशय की रिपार्ट दर्ज करायी गई कि उसका भाई रविभूषण, उसकी मॉं रामावती के साथ 320 कॉलानी अटल आवास, कुम्हारी में रहता है, जो दिनांक 13-03-2017 को अपने घर के सामने खड़ा था, तभी वहां सेतुराम यादव अपने साथियां के साथ मॉं, बहन की गंदी-गंदी गालियां देने लगा, जिसे उसके भाई रविभूषण ने मना किया, तो इसी बात से नाराज होकर यह कहते हुये कि तू हमका मना करने वाला कौन होता है, उसके भाई रविभूषण को मॉं, बहन की गंदी-गंदी गाली देकर जान से मारने की धमकी देते हुये अपने पास रखे डण्डे, हॉकी स्टिक से मारपीट करने लगे, जिससे उसका भाई नीचे गिर गया । वह अपने भाई को उपचार हेतु कृष्णा हॉस्पिटल, कुम्हारी ले गया, जहां से डॉक्टरों के कहने पर सुयश हॉस्पटल, कोटा, रायपुर में लेजाकर भर्ती कराया है । उसका भाई आई.सी.यू. में बेहोश है, ईलाज चल रहा है ।
3- प्रार्थी द्वारा की गई उक्त रिपार्ट के आधार पर थाना कुम्हारी पुलिस के द्वारा भा,द,संहिता की धारा-294, 506(बी) एवं 323/34 के अंतर्गत अपराध क्रमांक 55/2017 पंजीबद्ध कर, प्रकरण विवेचना में लिया गया । आरोपियां की पतासाजी कर उन्हें गिरफ्तार किया जाकर उनका मेमारेण्डम कथन लेखबद्ध किया गया तथा उनके मेमोरेण्डम कथन के आधार पर उनके द्वारा पेश करने पर घटना के समय रविभूषण का मारने में प्रयुक्त हॉकी स्टिक, बेल्ट व डण्डा जप्त किया गया । घटना स्थल का मौका नक्शा बनाया गया । आहत का आयी चोटें हॉकी स्टिक, बेल्ट व डण्डा से आ सकने व उसे पहुंचायी गई चोटों की प्रकृति के सम्बंध में डॉक्टर से क्वेरी की गई । गवाहों के कथन लेखबद्ध किये गये, जिसमें उन्होंने आरापीगण द्वारा प्रार्थी से शराब पीने के लिये पैसे मांगते हुये मॉं, बहन की गाली-गलौज करने तथा आहत द्वारा शराब पीने के लिये पैसे देने से मना करने पर मॉ, बहन की गाली- गलौज करते हुये जान से मारने की धमकी देकर मारपीट करने का कथन किया । तत्पश्चात् विवेचना पूर्ण कर अभियाग-पत्र न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (कु.रूपल अग्रवाल), भिलाई-3 के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जा दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 331/2017 के रूप में पंजीबद्ध हुआ तथा अपराध अनन्यतः सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय होने से उपार्पण आदेश दिनांक 27-07-2017 के अनुसार उपार्पित किया गया, जो सत्र प्रकरण क्रमांक-150/2017 के रूप में पंजीबद्ध होकर विधिवत् निराकरण हेतु अन्तरण पर इस न्यायालय को प्राप्त हुआ ।




4- तत्कालीन पीठासीन अधिकारी द्वारा अभियुक्तगण के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा-148, 294, 506(बी) एवं 329 सहपठित धारा-34 का आराप विरचित किया जाकर, पढकर सुनाये व समझाये जाने पर अभियुक्तगण ने आरोप अस्वीकार कर, विचारण किये जाने का निवेदन किया । अभियाजन साक्षियों के कथनां के उपरान्त धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रश्नावली के रूप में अभियुक्तण का परीक्षण कराया गया । धारा-233 दण्ड प्रक्रिया संहिता के उपबन्धां के अनुसार प्रतिरक्षा में प्रवेश कराये जाने पर अभियुक्तगण ने अभियाजन साक्षियां के कथनों को झूठा फंसाने का कथन करते हुए प्रतिरक्षा में किसी भी साक्षी का परीक्षण नहीं कराना व्यक्त किया ।
5- अभियोजन की ओर से अपने पक्ष-समर्थन में साक्षी विनाद कुमार सिंह (अ.सा-1), रविभूषण सिंह (अ.सा-2), डॉ0राजीव साहू (अ.सा-3), मनोज सिंह (असा-4), जी.एन.चौधरी (अ.सा-5) एवं मीलूराम कंवर (अ.सा-6) का कथन कराया गया है ।
6- प्रकरण के निराकरण के लिये विचारणीय बिंदु यह है कि :-
1- क्या अभियुक्तगण ने आपस में मिलकर सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में हॉकी स्टिक, डण्डा, बेल्ट आदि वस्तुओं से सज्जित होकर जमाव कर, बलवा किया ?
2- क्या अभियुक्तगण ने सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में रविभूषण सिंह को मॉं, बहन की गंदी-गंदी व अश्लील गाली-गलौज कर प्रार्थी व अन्य सुनने वालों को क्षोभ कारित किया ?
3- क्या अभियुक्तगण ने रविभूषण सिंह को जान से मारने की धमकी देकर आपराधिक अभित्रास कारित किया ?
4- क्या अभियुक्तगण ने एक साथ मिलकर सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में रविभूषण सिंह से शराब पीने के लिय पैसे मांगकर, पैसे देने हेतु मजबूर करने के लिये उद्यापन करते हुये हॉकी स्टिक, लाठी, डण्डा, बेल्ट एवं हाथ-मुक्का से मारकर स्वेच्छया घोर उपहति कारित किया ?
।। विचारणीय बिंदु क्रमांक-1 से 4 पर सकारण निष्कर्ष ।।
7- उक्त विचारणीय बिंदु को प्रमाणित करने हेतु अभियाजन की ओर से प्रस्तुत साक्षी विनोद कुमार सिंह (अ.सा-1) ने अपने साक्ष्य में आरापीगण रोशन, छोटू उर्फ पुरूषात्तम, सेतुराम यादव, फंदी उर्फ छोटू को नाम और चेहरे से तथा अन्य आरोपियां को चेहरे से पहचानना कहा है । घटना के सम्बंध में साक्षी का कथन है कि घटना दिनांक को होली के दिन यह अपने परिवार के साथ अटल आवास के दूसरे तल में खड़ा था और आरोपीगण नीचे भूतल में गाली-गलौज कर रहे थे । आरोपीगण का इसके भाई रविभूषण सिंह ने गाली देने से मना किया था, तब आरोपीगण ने इसके भाई से कहा था कि तू हमको मना करने वाला कौन है, और ऐसा करते हुये उसके भाई के साथ डण्डा एवं स्टिक से मारपीट किये थे । आरोपीगण इसके भाई को मारपीट करते हुये खींचकर नीचे भूतल में ले गये थे और अत्यधिक मारपीट किये थे, तब इसका भाई नीचे गिर गया था । आरापीगण ने इसके भाई के उपर पानी डालकर देखा, जब उन्हें काई हलचल नहीं दिखायी दी, तब आरोपीगण उसे छोड़कर चले गये थे । यह अपने भाई का पहले कृष्णा हॉस्पिटल, कुम्हारी चौक लेकर गया था, फिर डॉक्टरां की सलाह पर सुयश अस्पताल, काटा, रायपुर लेजाकर ईलाज कराया था । इसका भाई 24 घण्टे आई.सी.यू. में भर्ती था । घटना की रिपोर्ट इसके भाई मनाज सिंह ने थाना कुम्हारी, दुर्ग में दर्ज करायी थी । देहाती नॉलिसी प्रदर्श पी-1 पर साक्षी ने अ से अ भाग पर अपना हस्ताक्षर होना कहा है ।
8- प्रतिपरीक्षण में इस साक्षी ने अपने पुलिस बयान में अपने परिवार के साथ अटल आवास के दूसरे तल में खड़े होने, आरापीगण द्वारा भूतल में गाली- गलौज करने, आरोपीगण द्वारा इसके भाई को मारपीट करते हुये भूतल में ले जाने और अत्यधिक मारपीट करने और पानी डालकर देखने तथा हलचल नहीं होने पर छोड़कर चले जाने की बात बता देना कहा है । अपने पुलिस बयान में इस बात का उल्लेख नहीं होने के सम्बंध में जानकारी नहीं होना कहा है । इस प्रकार साक्षी द्वारा उपरोक्त तथ्यों को न्यायालय में बढ़ाचढ़ाकर बताया गया है । आगे प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने यह स्वीकार किया है कि पुलिस ने किसी भी आरापी की पहचान नहीं कराया था । यह स्वीकार किया है कि देहाती नॉलिसी प्रदर्श पी-1 में सेतुराम यादव एवं अन्य के विरुद्ध रिपार्ट लिखाया था, शेष आरापियों का नाम नहीं बताया था। स्वतः कहता है कि उस समय उनका नाम इसे नहीं पता था । आगे साक्षी बताता है कि इसके घर के पास दुकान वाला डागेश ने आरापीगण का नाम बताया था । यह अस्वीकार किया है कि यह घटना के समय मौजूद नहीं था और घटना को घटित हाते अपनी ऑंख से नहीं देखा है । यह स्वीकार किया है कि कथित घटना के समय यह अपने भाई का बीच-बचाव नहीं किया था ।
9- इस साक्षी ने यह भी स्वीकार किया है कि उनके घर घटनास्थल से सुयश अस्पताल, रायपुर जाते समय बीच में कुम्हारी पुलिस थाना पड़ता है, लेकिन ये लाग थाना नहीं गये थे । यह स्वीकार किया है कि घटनास्थल घनी आबादी का क्षेत्र है, जहां आसपास के घरां में लाग निवास करते हैं, लेकिन किसी ने भी बीच-बचाव नहीं किया था । यह स्वीकार किया है कि रिपोर्ट लिखाते समय लाठी, हॉकी स्टिक आदि की बात नहीं बताया था । कंडिका-16 में साक्षी ने कथन किया है कि यह, मनोज सिंह और रविभूषण एक ही माता-पिता की सन्तान हैं और एक साथ निवास करते हैं । यह अस्वीकार किया है कि जिस मकान में खड़े हाना बताया है, वहां यह नहीं रहता है । यह स्वीकार किया है कि घटना होली के त्यौहार के दिन की है और शाम 6.30-7.00 बजे की है, लेकिन यह अस्वीकार किया है कि लोगां के चेहरे में र ंग-गुलाल होने तथा सूर्यास्त होने से अंधेरा होने के कारण किसी को नहीं पहचान पाया था । कंडिका-20 में साक्षी ने स्वीकार किया है कि प्रदर्श पी-1 की देहाती नॉलिसी लिखाते समय इसका रविभूषण से बातचीत नहीं हो पाया था । यह अस्वीकार किया है कि जिस वाहन से इसके भाई का अस्पताल ले गये थे, उस वाहन से इसके भाई का एक्सीडेण्ट हुआ था । यह अस्वीकार किया है कि घटना दिनांक को इसका भाई शराब पीया हुआ था ।
10- साक्षी रविभूषण सिंह (अ.सा-2) प्रकरण में आहत है । इस साक्षी ने आरोपीगण का चेहरे से पहचानना व्यक्त किया है, नाम बताने में असमर्थतता व्यक्त किया है । घटना के सम्बंध में साक्षी का कथन है कि होली के दिन संध्या 5.00-5. 30 बजे आरापीगण और उनके साथ अन्य लोग हुड़दंग कर रहे थे तथा मोहल्ले- वासियों को ललकारकर अश्लील गालियां दे रहे थे । इसने आरोपीगण को घर से दूर जाने का निवेदन किया, तब आरापीगण मारपीट पर उतारू हा गये और एक के बाद एक इसे मारने लगे, जिससे इसे गम्भीर चोटे  आयी और यह मूर्छित हा गया । जब होश आया, तब यह सुयश अस्पताल में था और आई.सी.यी. में भर्ती था । पुलिस ने घटनास्थल का नक्शा प्रदर्श पी-2 इसके बताये अनुसार तैयार किया था, जिस पर अ से अ भाग पर इसके हस्ताक्षर हैं । साक्षी ने पुलिस को प्रदर्श पी-3 का अपना पुलिस बयान देना स्वीकार किया है ।
11- प्रतिपरीक्षण में इस साक्षी ने अपने पुलिस बयान में यह बता देना कहा है कि आरोपीगण संध्या 5.30 बजे हुड़द ंग कर रहे थे और मोहल्लेवासियों को ललकार रहे थे तथा अश्लील गालियां दे रहे थे । इसके द्वारा आरापीगण को दूर जाने का निवेदन करने पर वे मारपीट पर उतारू होकर इससे मारपीट किये, जिससे गम्भीर चोट आया और मूर्छित हो गया था । उक्त बात पुलिस के बयान में न होने के सम्बंध में साक्षी ने जानकारी नहीं हाना कहा है । कंडिका-6 में साक्षी ने स्वीकार किया है कि घटना से पहले आरोपीगण का नाम नहीं जानता था । घटना के समय यह अकेला था और इसके नजदीक में कोई नहीं था । बेहोश होने के पूर्व घटना के सम्बंध में इसका किसी व्यक्ति से बातचीत नहीं हुआ था । यह भी स्वीकार किया है कि यह साक्ष्य दिनांक का भी आरोपीगण का नाम नहीं जानता है और इसने पुलिस को बयान देते समय किसी आरापी का नाम नहीं बताया था, अगर पुलिस वालां ने लिखा होगा, तो अपने मन से लिख लिया होगा । इसने पुलिस का यह भी नही बताया था कि घटना को किसने देखा है ।
12- आगे प्रतिपरीक्षण में साक्षी ने स्वीकार किया है कि घटना दिनांक को यह भी शराब पीया हुआ था । घटनास्थल घनी आबादी क्षेत्र है, जहां आसपास के लाग निवास करते हैं । इसने किसी भी व्यक्ति को घर के बाहर नहीं देखा था । इसका भाई विनोद, इसके माता-पिता एक साथ निवास करते हैं । यह स्वीकार किया है कि घटना के समय इसे बचाने इसके भाई विनाद तथा इसके माता-पिता नहीं आये थे । यह भी स्वीकार किया है कि कथित घटना दिनांक को आरोपीगण एवं अन्य लोगां के साथ जो वाद-विवाद होना बता रहा है, उसका मुख्य कारण आरोपीगण एवं अन्य लोगों के द्वारा अश्लील गालियां देना था, इसके अलावा अन्य किसी बात का लेकर वाद-विवाद नहीं हुआ था । इसने अपने पुलिस बयान में यह नहीं बताया था कि कौन सा आरापी लाठी और अन्य हथियार रखा था, स्वतः कहा कि कुछ लोगां ने हॉकी स्टिक रखा था । यह अस्वीकार किया है कि घटना दिनांक को शराब पीकर वाहन चलाते समय गिरने से इसे चोट आयी थी, इसी कारण इसके परिजनों ने सुयश अस्पताल में भर्ती हाते समय रोड एक्सीडेण्ट से चोट लगना बताया था । अन्य सुझावां का इस साक्षी ने अस्वीकार किया है ।




13- साक्षी मनोज सिंह (अ.सा-4) आहत का भाई है, इसने आरापीगण में से चार-पांच लोगां को चेहरे से पहचानना कहा है, नाम बताने में असमर्थता व्यक्त किया है । घटना के सम्बंध में इसने भी कथन किया है कि घटना दिनांक को हाउसिंग बोर्ड कॉलानी, कुम्हारी स्थित मकान एल.आई.जी. ।-269 में शाम 6.00-6.30 बजे आराम कर रहा था, तभी इसे मोबाईल पर सूचना प्राप्त हुई कि इसके भाई की मृत्यु हो गई है । जब यह कृष्णा हॉस्पिटल, कुम्हारी पहुंचा, तब अस्पताल में इसके परिजन रो रहे थे और डॉक्टर ने बताया दिया था कि इसके भाई रविभूषण की मृत्यु हा गई है, तब यह अपनी ऑटा में रविभूषण का लिटाकर सुयश हॉस्पिटल, रायपुर ले गया था, जहां 8-9 दिनों तक भर्ती रखकर ईलाज किया था । 
14- आगे साक्षी का कथन है कि इसने अपने भाई से घटना के विषय में जानकारी मांगी थी, लेकिन उसने किसी भी आरोपी का नाम नहीं बताया था । थाना कुम्हारी की पुलिस ने इसके सामने आरापीगण के पेश करने पर एक हॉकी एवं एक बेल्ट की जप्ती की थी । यह बताने में साक्षी असफल रहा कि किस आरोपी से हॉकी और किस आरोपी से बेल्ट जप्त किया गया है । जप्ती पत्रक प्रदर्श पी-6 एवं प्रदर्श पी-7 पर साक्षी ने अ से अ भाग पर अपना हस्ताक्षर स्वीकार किया है । प्रतिपरीक्षण में इस साक्षी का कथन है कि घटना के समय इसका भाई विनोद कुमार इसके साथ एल.आई.जी. ।/269, कुम्हारी के मकान में रहता था । इसने अपनी आंखां से अपने भाई रविभूषण के साथ होती घटना का नहीं देखा है । 
15- डॉ0राजीव साहू (अ.सा-3) न्यूरोसर्जन के द्वारा आहत का मुलाहिजा किया गया है । इस साक्षी का कथन है कि यह वर्ष 2011 से सुयश हॉस्पिटल, रायपुर में विजिटिंग न्यूरोसर्जन के पद पर पदस्थ हैं । दिनांक 13-03-2017 को रविभूषण का ईलाज के लिये लाया गया था, परिजनों ने बताया था कि मरीज को दो-तीन लोगां के द्वारा लड़ाई के दौरान चोट आयी थी । इनके द्वारा जांच करने पर पाया गया कि मरीज होश में था, उसका जी.सी.एस.स्कोर (मरीज का न्यूरोलॉजिकल स्थिति) 13/15 था, जो सामान्य से कम था, नॉर्मल व्यक्ति का जी.सी.एस.स्कार 15/15 होता है । परीक्षण में मरीज के चेहरे के दाहिने तरफ 3/2 सें.मी. छिला हुआ चोट का निशान मौजूद था, सिर के सी.टी.स्केन करने पर पता चला कि मरीज के बांये पैराईटा टेम्पारल स्केल्प में सूजन था । इनके मतानुसार मरीज को आयी चोट गम्भीर प्रकृति की थी । उनके द्वारा दिया गया मेडिकल रिपार्ट प्रदर्श पी-4 पर अ से अ भाग पर इनके हस्ताक्षर हैं । 
16- आगे साक्षी का कथन है कि दिनांक 13-05-2017 को थाना कुम्हारी द्वारा प्रस्तुत दो सीलबंद पैकेट में एक हॉकी स्टिक, जिसकी लम्बाई 36 इंच थी एवं एक डण्डा, जिसकी लम्बाई 33 इंच थी, की जांच कर, रिपोर्ट दिया गया था। इनके रिपोर्ट के अनुसार डण्डा एवं हॉकी स्टिक से आहत को आयी चोटें आ सकती हैं । क्वेरी रिपोर्ट प्रदर्श पी-5 पर अ से अ भाग पर इसके हस्ताक्षर हैं । प्रतिपरीक्षण में स्वीकार किया है कि आहत दिनांक 13-03-2017 को उपचार हेतु भर्ती हुआ था और मुलाहिजा रिपार्ट दिनांक 16-03-2017 को तैयार किया गया है । यह स्वीकार किया है कि प्रारम्भिक उपचार इनके द्वारा नहीं किया गया है, प्रारम्भिक उपचार करने वाला डॉक्टर पूछकर इस बात का उल्लेख करता है कि आहत का चोट कैसे आयी थी । यह स्वीकार किया है कि मरीज का सी.टी.स्केन परीक्षण इनके निर्देश पर किया गया है । सी.टी.स्केन रिपोर्ट में मरीज का शराब पीया होना तथा रोड एक्सीडेण्ट लिखा है, स्वतः कहा कि रिपार्ट पी.जी.श्रीधर द्वारा तैयार किया गया है, इसके बारे में वही बता सकते हैं । कंडिका-11 में साक्षी ने स्वीकार किया है कि शराब पीकर वाहन चलाते समय गिरकर किसी कठार वस्तु से टकरा जाने पर इस प्रकार की चोट आ सकती है । 
17- अ.सा-6 मीलूराम कंवर का साक्ष्य है कि थाना कुम्हारी में उप-निरीक्षक के पद पर पदस्थ रहने के दौरान उसने दिनांक 04-04-2017 का आरोपी सेतराम धु्रव उर्फ सेतू को प्रदर्श पी-21 के गिरफ्तारी पत्रक के अनुसार गिरफ्तार किया था। आरोपी सेतराम धु्रव उर्फ सेतू का अपनी अभिरक्षा में लेकर उसके बताये अनुसार गवाहों की उपस्थिति में मेमारेण्डम कथन प्रदर्श पी-23 लेखबद्ध किया था और उसके मेमारेण्डम कथन के आधार पर आरापी द्वारा निकालकर पेश करने पर उसने लकड़ी से बना हुआ हॉकी का स्टिक गवाहां की उपस्थिति में प्रदर्श पी-24 के जप्ती पत्रक के अनुसार जप्त किया था । 
18- प्रतिपरीक्षण में इस साक्षी ने स्वीकार किया है कि देहाती नॉलिसी प्रदर्श पी-1 में आरोपी का नाम सेतुराम यादव एवं अन्य लिखा हुआ है । यह भी स्वीकार किया है कि जिस व्यक्ति का दिनांक 04-07-2017 को हिरासत में लिया गया है, वह सेतुराम यादव नहीं है, बल्कि सेतुराम धु्रव है । साक्षी स्वतः कहता है कि सेतुराम धु्रव ने स्वयं को मामले का आरोपी बताते हुये सरेण्डर किया था । यह स्वीकार किया है कि समर्पण के पूर्व आरोपी ने इसके सामने अपराध स्वीकार नहीं किया था । यह भी स्वीकार किया है कि आहत तथा किसी भी साक्षी ने आरापी सेतराम यादव के हाथ में हॉकी स्टिक हाने का कथन नहीं किया है । यह अस्वीकार किया है कि सेतराम धु्रव से कोई जप्ती नहीं किया गया है । 
19- अ.सा-5 जी.एन.चौधरी का कथन है कि थाना कुम्हारी में सहायक उप-निरीक्षक के पद पर पदस्थ रहने के दौरान दिनांक 14-03-2017 का सुयश अस्पताल, रायपुर से प्राप्त सूचना के आधार पर प्रार्थी विनाद कुमार सिंह के बताये अनुसार उसने देहाती नॉलिसी प्रदर्श पी-1 तथा देहाती नॉलिसी के आधार पर उसी दिनांक को प्रदर्श पी-8 के अनुसार अपराध पंजीबद्ध किया था । दिनांक 29-05- 2017 का रविभूषण की उपस्थिति में उसके बताये अनुसार घटनास्थल का मौका नक्शा प्रदर्श पी-2 तैयार किया था और घटनास्थल का लाल स्याही से चिन्हांकित किया था । सुयश हॉस्पिटल, रायपुर में आहत रविभूषण के किये जा रहे उपचार एवं उसके आयी चोटां के सम्बंध में जानकारी प्राप्त करने हेतु ज्ञापन प्रेषित किया गया था। विवेचना के क्रम में उसने आरोपी ताराचंद पटेल द्वारा पेश करने पर गवाह मदन सिंह एवं मनोज सिंह की उपस्थिति में प्रदर्श पी-6 के जप्ती पत्र के अनुसार बांस का एक डण्डा तथा आरापी रोशन यादव द्वारा पेश करने पर इन्ही गवाहों के समक्ष उसने एक बेल्ट प्रदर्श पी-7 के जप्ती पत्र के अनुसार जप्त किया था । इसने आरापी पुरूषोत्तम उर्फ छोटू यादव, रोशन यादव, मुकेश पटेल, ताराचंद पटेल, मुकेश साहू एवं प्रताप पटेल को गवाहों की उपस्थिति में गिरफ्तार कर गिरफ्तारी की सूचना उनके परिजनों को दिया था । 
20- इस साक्षी ने आगे यह भी कथन किया है कि आहत रविभूषण का कथन लेने हेतु उसने चिकित्सा अधिकारी, सुयश अस्पताल काटा, रायपुर से अनुमति प्राप्त करने के लिये प्रदर्श पी-17 का ज्ञापन लेखबद्ध किया था तथा आहत का आयी चोटों की प्रकृति जानने के लिये मुख्य चिकित्सा अधिकारी का क्वेरी आवेदन प्रदर्श पी-18 एवं घटना में प्रयुक्त डण्डा, हॉकी स्टिक से आहत को आयी चोटां के विषय में जानकारी प्राप्त करने के लिये प्रदर्श पी-19 के अनुसार क्वेरी आवेदन सुयश हॉस्पिटल, रायपुर प्रेषित किया था । उसने प्रार्थी विनोद कुमार सिंह, आहत रविभूषण सिंह, गवाह रमौती, देवी सिंह एवं मनोज सिंह के बताये अनुसार उनके कथन लेखबद्ध किया था । 
21- प्रतिपरीक्षण में इस साक्षी ने कथन किया है कि घटना की जानकारी पहली बार दिनांक 14-03-2017 को थाने के मोहर्रिर से मिली थी । यह स्वीकार किया है कि अस्पताल के भर्ती कागजात में रविभूषण का भर्ती कराने का कारण एल्काहलिक पेसेन्ट तथा रोड ट्रेफिक एक्सीडेण्ट होना बताया गया था । यह भी स्वीकार किया है कि देहाती नॉलिसी में प्रार्थी विनोद कुमार सिंह ने घटना को स्वय देखना नहीं बताया था । विनाद कुमार, घटनास्थल अटल आवास के पास का निवासी नहीं है । देहाती नॉलिसी में रविभूषण ने किस आरोपी का गाली देने से मना किया था और किस व्यक्ति ने जान से मारने की धमकी दी थी, इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है । यह स्वीकार किया है कि प्रकरण में सेतराम यादव नाम का व्यक्ति गिरफ्तार करना नहीं पाया गया है, इसने मामले के आरापी सेतराम धु्रव का शिनाख्ती कार्यवाही नहीं कराया है । यह भी स्वीकार किया है कि किसी भी आरापी की पहचान भी नहीं करायी है । 




22- आगे प्रतिपरीक्षण की कंडिका-16 में साक्षी ने स्वीकार किया है कि आहत रविभूषण का बयान दिनांक 31-03-2017 का दर्ज किया है । आहत एवं किसी भी साक्षी ने आरोपीगण का नाम बताते समय उसके पिता का नाम, उम्र एवं निवास के सम्बंध में कोई जानकारी नहीं दिया था । यह स्वीकार किया है कि आहत रविभूषण द्वारा इस बात की जानकारी नहीं दी गई थी कि उसे शराब पीने के लिये पैसे किस व्यक्ति के द्वारा मांगा गया था । यह भी स्वीकार किया है कि आहत एवं अन्य व्यक्तियो ं ने यह नहीं बताया है कि किस व्यक्ति के मारने पर चोट आया था । इस साक्षी ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि साक्षी विनोद सिंह के द्वारा देहाती नॉलिसी एवं पुलिस बयान में स्वयं के अटल आवास के दूसरे तल में खड़े होने और आरोपीगण द्वारा नीचे भूतल में गाली-गलौज करने तथा इसके भाई को मारपीट करते हुये खींचकर नीचे भूतल में ले जाने वाली आदि बात नहीं बताई थी । इस बात की जानकारी नहीं होना कहा है कि विनाद कुमार को आरापीगण का नाम राकेश के माध्यम से पता चला था । 
 23- इस साक्षी ने गवाह मनोज सिंह के द्वारा न्यायालय में अतिरिक्त रूप से कथनों को विस्तारित करते हुये बताये गये तथ्यां का पुलिस बयान में नहीं बताने की बात भी स्वीकार किया है । यह स्वीकार किया है कि प्रदर्श पी-9 के दस्तावेज में थाना प्रभारी, सरस्वती नगर, रायपुर की सील लगी हुई है और उसी सील के ऊपर थाना प्रभारी, कुम्हारी, जिला दुर्ग की सील लगी है । प्रदर्श पी-9 का दस्तावेज दिनांक 13-03-2017 को तैयार किया गया है और दिनांक 13-03-2017 का पुलिस थाना कुम्हारी में इस घटना के सम्बंध में कोई अपराध पंजीबद्ध नहीं हुआ था । कंडिका-25 में साक्षी ने स्वीकार किया है कि इनके द्वारा आहत रविभूषण सिंह का कथन लेने हेतु अनुमति बावत् आवेदन-पत्र दिनांक 14-03-2017 को दिया गया था और प्रदर्श पी-17 में चिकित्सक द्वारा मरीज बयान दे सकता है, अनुमति दी जाती है, लिखकर सीलमुद्रा से चिन्हांकित किया गया है । यह स्वीकार किया है कि आहत का बयान दिनांक 21-03-2017 को दर्ज किया गया है, दिनांक 14-03-2017 का अनुमति मिलने के बाद भी बयान दर्ज नहीं किया गया है । 
24- अभियोजन की ओर से प्रस्तुत उक्त साक्षियां के परिप्रेक्ष्य में बचाव-पक्ष की ओर से यह तर्क किया गया है कि मामले में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत तथ्य सन्देहास्पद हैं । साक्षी विनोद सिंह (अ.सा-1), जिसके द्वारा देहाती नॉलिसी दर्ज करायी गई है, वह मौके पर उपस्थित नहीं था, अतः घटना के सम्बंध में उक्त साक्षी का कथन विश्वास योग्य नहीं है । आहत को आयी चोटें आरोपीगण द्वारा की गई मारपीट से कारित हाना प्रमाणित नहीं है, बल्कि आहत को अस्पताल में भर्ती कराते समय रोड एक्सीडेण्ट से चोट कारित होने की बात बतायी गई थी, जो अभियोजन के मामले का सन्देहास्पद बनाता है । मामले में घटना, अटल आवास की है, जहां सभी घरों में लोग निवास करते हैं, किन्तु आहत एवं उसके परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त आसपास के किसी भी व्यक्ति को साक्षी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे मामले के साक्षियां के कथनों की विश्वसनीयता प्रभावित होती है । अभियोजन के साक्ष्य विश्वसनीय नहीं हैं, अतः आरोपीगण की दोषसिद्धि के लिये उक्त साक्ष्य ग्राह्य नहीं है, अतः आरोपीगण दोषमुक्ति के अधिकारी हैं । 
25- जबकि अभियोजन की आेर से यह तर्क किया गया है कि मामले के आहत सहित प्रत्यक्षदर्शी साक्षियां ने घटना का समर्थन किया है । आहत को गम्भीर उपहति कारित होना, चिकित्सीय साक्ष्य से प्रमाणित हुआ है, अतः आरापीगण के विरुद्ध आरोप प्रमाणित होते हैं । 
26- विचार किया गया । मामले में अभियाजन के द्वारा प्रस्तुत कहानी के अनुसार घटना दिनांक का आरोपीगण के द्वारा आहत रविभूषण सिंह के साथ शराब पीने के लिये पैसा मांगा गया और आहत द्वारा मना करने पर उन्हो ंने मॉं, बहन की गाली देकर, जान से मारने की धमकी देकर हॉकी स्टिक, डण्डा, बेल्ट और हाथ- मुक्का से मारपीट किया था, जिससे आहत नीचे गिरकर बेहोश हो गया था । यह घटना दिनांक 13-03-2017 को शाम लगभग 7.00 बजे की बतायी गई है । साक्षी विनोद सिंह, जिसके द्वारा देहाती नॉलिसी दर्ज करायी गई है, उसने देहाती नॉलिसी में शराब के लिये पैसे मांगकर मारपीट करने के तथ्य का हवाला नहीं दिया है, साथ ही एकमात्र आरोपी के रूप में सेतराम यादव को नामजद किया है और उसके साथ अन्य लाग शामिल होना बताया है । अन्य आरापीगण का नाम, साक्षी ने दुकानदार डागेश के माध्यम से पता चलना बताया है, अर्थात् मामले में डागेश भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी था, जिसका परीक्षण नहीं कराया गया है । साक्षी विनोद के अनुसार मामले में रिपोर्ट दर्ज कराने से पहले आहत रविभूषण ने उसे अन्य आरापीगण के बारे में कुछ नहीं बताया था । स्वय ं रविभूषण ने अपने साक्ष्य में आरोपीगण को नाम से नहीं जानना कहा है, अतः देहाती नॉलिसी एवं साक्षी के पुलिस बयान में आरोपीगण के नाम का उल्लेख किस आधार पर आया है, यह स्पष्ट नहीं है । यहां तक कि आरोपी सेतराम यादव के रूप में देहाती नॉलिसी में एक व्यक्ति का आरापित किया गया है, किन्तु सेतराम यादव के नाम के किसी व्यक्ति का मामले में अभियाजित नहीं किया गया है, बल्कि सेतराम धु्रव नामक व्यक्ति का अभियोजित किया गया है, जो मामले में स्वयं न्यायालय के समक्ष समर्पण किया है । यहा ं पर, जबकि आरोपी के नामजद रिपोर्ट में दर्ज नाम एवं अभिरक्षा में लिये गये आरोपी के नाम में भिन्नता है, उस परिस्थिति में पहचान कार्यवाही कराया जाना आवश्यक था, जो मामले में नहींं कराया गया है, जो मामले को प्रभावित करता है । 
27- साक्षीगण ने अपने कथन में व्यक्त किया है कि सभी आरोपीगण ने आहत के साथ मारपीट किया था, किन्तु यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि मामले में सात व्यक्ति आरोपित हैं, सभी के द्वारा हॉकी, डण्डा एवं बेल्ट से मारपीट करना बताया गया है, इसके बाद भी आहत के सिर पर मात्र एक चोट के अलावा अन्य किसी प्रकार के चोट का उल्लेख, चिकित्सक साक्षी के द्वारा नहीं किया गया है । अतः उक्त तथ्य इस बात को असम्भावित करते हैं कि सभी आरापीगण के द्वारा मारपीट किया गया था । 
28- जहां तक आहत को आयी चोट की गम्भीरता एवं प्रकृति का प्रश्न है, मामले में घटना की प्रथम बार रिपोर्ट, देहाती नॉलिसी प्रदर्श पी-1 के आधार पर दर्ज की गई है, जा दिनांक 14-03-2017 को 16.50 बजे अभिलिखित किया गया है, जबकि आहत को दिनांक 13-03-2017 को सुयश अस्पताल में भर्ती होना बताया गया है । मुलाहिजा आवेदन प्रदर्श पी-4 के अनुसार दिनांक 13-03-2017 का ही आहत का मुलाहिजा आवेदन भरकर पेश किया गया था, किन्तु उक्त दिनांक तक थाना कुम्हारी में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई थी । यदि मुलाहिजा रिपोर्ट थाना कुम्हारी द्वारा भरा गया है, तो यह मामले के दर्ज हाने से पहले ही मुलाहिजा करा लिये जाने की स्थिति को दर्शित करता है । यह भी उल्लेखनीय है कि चिकित्सा अधिकारी द्वारा मुलाहिजा रिपोर्ट दिनांक 16-03-2017 को प्रदान किया गया है, अर्थात् घटना के चौथे दिन मुलाहिजा रिपोर्ट तैयार किया गया है । मुलाहिजा रिपोर्ट के अनुसार आहत के बांये पैराईटल टेम्पोरल स्केल्प में स्वेलिंग था, जिसे चिकित्सा अधिकारी डॉ.राजीव साहू ने गम्भीर बताया है, किन्तु स्केल्प में स्वेलिंग के अलावा अन्य किसी प्रकार की गम्भीर अथवा घातक परिस्थिति सी.टी.स्केन में प्रकट नहीं हाती है तथा मात्र सूजन, जो किसी प्रकार से जटिल नहीं था, वह चोट धारा-320 भा.दं.संहिता के अधीन परिभाषित गम्भीर प्रकृति के चोट की परिभाषा में नहीं आता है । 
29- इसके अलावा आहत लगातार 20 दिनों तक तीव्र पीड़ा से पीड़ित रहा अथवा 20 दिनों तक उपचार के अधीन रहा, ऐसा भी साक्ष्य नहीं है, अतः उक्त परिस्थितियां में आहत का आयी चोट को गम्भीर प्रकृति की चोट होना, नहीं माना जा सकता है । यद्यपि चिकित्सक साक्षी ने आहत की चोट का गम्भीर कहा है, किन्तु जैसा कि न्याय दृष्टान्त हंसराज उर्फ हंसू शंकर गोंड ़ विरुद्ध महाराष्ट्र राज्य, 2001(भाग-2) एम.पी.वीकली नाट्स, नोट नंबर 147 (सुप्रीम कोर्ट) में ठहराया गया है कि चिकित्सीय साक्ष्य केवल राय है, जिस पर निर्णय आधारित नहीं हो सकता है । अनिल राय विरुद्ध बिहार राज्य, 2001(7) एस.सी.सी. 318 में ठहराया गया है कि अभियोजन साक्षी के मौखिक कथन और चिकित्सक की राय, न्यायालय द्वारा जब विचार में ली जाती है, तो मौखिक साक्ष्य का अधिमान्यता दी जाती है । चिकित्सक की राय, सत्य से अधिक परिकल्पना आधारित हाती है । अतः उपराक्त परिस्थितियों में आहत को आयी चोट का गम्भीर प्रकृति की चोट होना प्रमाणित नहीं हुआ है । 
30- मामले में अभियाजन की कहानी के अनुरूप तथ्यों का किसी भी साक्षी ने समर्थित नहीं किया है । किसी भी साक्षी ने आरापीगण के द्वारा शराब पीने के लिये पैसे मांगने तथा आहत द्वारा पैसे नहीं देने पर मारपीट कर, उपहति कारित करने का कथन नहीं किया है, बल्कि न्यायालय में नयी परिस्थिति को प्रकट किया है कि आरोपीगण के द्वारा कॉलानी के सामने लोगों को गाली-गलौज कर ललकार रहे थे और अश्लील गालियां दे रहे थे । इस प्रकार अभियाजन के मामले से भिन्न परिस्थिति उत्पन्न होती है । किसी भी साक्षी ने यह स्पष्ट कथन नहीं किया है कि आरोपीगण ने किस प्रकार की अश्लील गालियां उच्चारित की, जो सुनने में बुरा लगा, साथ ही ऐसा भी साक्ष्य नहीं है कि आरोपीगण ने जान से मारने की धमकी दिया, जिससे वास्तव में भय कारित हुआ था । अतः विचारणीय बिंदु क्रमांक-2, 3 एवं 4 के सम्बंध में विधिक साक्ष्य का अभाव है । 
31- जहां तक आरापीगण के द्वारा घातक आयुध से सज्जित होकर बल एवं हिंसा का प्रयाग कर, बलवा कारित करने का प्रश्न है, इस बिंदु पर किसी भी साक्षी ने ऐसा कथन नहीं किया है कि आरोपीगण उक्त हॉकी स्टिक, डण्डा, बेल्ट आदि से लैस हाकर मौके पर आये थे और गाली-गलौज कर रहे थे, अतः आरापीगण के द्वारा सामान्य उद्देश्य के तहत् बलवा कारित करने के लिये सुसज्जित होने के सम्बंध में साक्ष्य नहीं है । अभियोजन के प्रकरण से ही यह प्रकट होता है कि शराब पीने के लिये ही पैसे की मांग की गई और नहीं देने पर गाली-गलौज कर, मारपीट किया गया, अर्थात् आहत से बलपूर्वक पैसे मांगने के लिये पूर्व की तैयारी के साथ आरोपीगण की मौके पर उपस्थिति साबित नहीं होती है । घटना दिनांक को होली का त्यौहार था, उस दिन लोगां का आपस में समूह बनाकर रहने मात्र से यह नहीं कहा जा सकता है कि वे किसी अवैध उद्देश्य के लिये एकत्र हुये थे, साथ ही यह तथ्य इसलिये भी विश्वसनीय नहीं है कि सभी आरापीगण के द्वारा यदि पहले से ही गाली-गलौज किया जा रहा था और साक्षी विनाद, जो कथित रूप से पहली मंजिल पर से खड़े होकर देख रहा था, वह विवाद होने के बाद भी अपने भाई का बचाने के लिये नहीं जाता है ।
32- इसी प्रकार साक्षी रविभूषण ने अपने साक्ष्य में यह स्पष्ट स्वीकार किया है कि उसके भाई अथवा माता-पिता या मोहल्ले के कोई लाग बीच-बचाव के लिये नहीं आये थे । यदि सभी आरोपीगण के द्वारा सामान्य उद्देश्य के तहत् आरोपी से हॉकी स्टिक, डण्डा एवं बेल्ट से मारपीट किया गया था तथा आहत बेहाश हो गया था, इसके बाद भी आहत के सिर में मात्र एक चोट की उपस्थिति, सभी आरोपीगण के द्वारा मारपीट करने की सम्भावना का समाप्त कर देती है और चूंकि मामले में यह स्पष्ट साक्ष्य नहीं है कि किस आरापी ने उक्त एकमात्र चोट कारित किया था । उक्त एक चोट के लिये सभी आरोपीगण को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि मामले में सामान्य उद्देश्य के तत्व प्रमाणित नहीं हुये हैं । 




33- मामले में अभियाजन के द्वारा प्रस्तुत उपराक्त साक्षियों के विवेचना से न्यायालय यह पाती है कि अभियोजन का मामला विश्वसनीय रूप से ठोस विधिक साक्ष्य से प्रमाणित नहीं है, अतः आरोपीगण के विरुद्ध विचाराधीन आरोपों का प्रमाणित करने में विश्वसनीय साक्ष्य के अभाव में आरापीगण की दाषसिद्धि नहीं ठहरायी जा सकती है । अतः आरोपीगण का भा.दं.संहिता की धारा-148, 294, 506(बी) एवं 329 सहपठित धारा-149 के आरापां से दोषमुक्त किया जाता है । 
34- अभियुक्तगण के जमानत व मुचलके, माननीय अपीलीय न्यायालय में अपील प्रस्तुत होने की स्थिति में उपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु धारा 437(क) दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान के तहत् निर्णय दिनांक से आगामी 06 माह तक प्रभावशील रहेंगे। 
35- अभियुक्तगण पुरूषात्तम उर्फ छाटू यादव, मुकेश पटेल, ताराचंद पटेल, प्रताप पटेल एवं मुकेश साहू दिनांक 22-03-2017 से दिनांक 28-03-2017 तक (कुल 07 दिन), अभियुक्त सेतराम धु्रव उर्फ सेतु दिनांक 04-04-2017 से दिनांक 11-04-2017 तक (कुल 08 दिन) एवं अभियुक्त रोशन यादव दिनांक 29-05-2017 से दिनांक 31-05-2017 तक (कुल 03 दिन) अभिरक्षा में रहे हैं, अतः अभियुक्तगण के द्वारा बितायी गई अभिरक्षा अवधि के सम्बंध में धारा-428 दं.प्र.संहिता के तहत् प्रमाण-पत्र, निर्णय के साथ संलग्न किया जावे । 
36- प्रकरण में जप्तशुदा डण्डा, बेल्ट व हॉक स्टिक अपील अवधि पश्चात्, अपील न होने पर नष्ट किया जावे । अपील होने की दशा में माननीय अपीलीय न्यायालय के निर्देशानुसार सम्पत्तियों का निराकरण किया जावे ।
दुर्ग,                                                                                                                        सही/-

दिनांक : 30 मई, 2018                                                                               (अजीत कुमार राजभानू)
                                                                                                            प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश
                                                                                                                          दुर्ग (छ.ग.)

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh SC Shayara Bano Temporary injunction Varsha Dongre अजीत कुमार राजभानू अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दिलीप सुखदेव दुर्ग न्‍यायालय देवा देवांगन नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रफुल्ल सोनवानी प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर रेवा खरे श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा स्मिता रत्नावत हरे कृष्ण तिवारी