Saturday, 14 March 2015

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 11 से 20)

 

11- इस संबंध में अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 11, 12 में पुलिस कांस्टेबिल हरखराम क्रमांक 1028 द्वारा लायी गयी लाठी और दांव का परीक्षण कर यह व्यक्त किया है कि प्रेषित लाठी से मृतक को आयी चोट क्रमांक 4 से 7 आ सकती है। इसी प्रकार उन्होने यह भी व्यक्त किया है कि प्रेषित दांव से मृतक को आयी चोट क्रमांक 8 से 21 आ सकती है। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य में चोट क्रमांक 4 से 21 को गम्भीर प्रकृति की चोट होना भी व्यक्त किया है। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 12 में यह भी व्यक्त किया है कि प्रेषित दांव से प्राणघातक चोट आना संभव है, जिसके संबंध में उनकी रिपोर्ट क्रमशः प्रदर्श पी 36 एवं 37 है। इस प्रकार अ0सा010 डॉ0जे0पी0मेश्राम ने मृतक का शव परीक्षण कर यह पाया कि मृतक को जो 21 चोटें उसकी मृत्यु के पहले आयी थी, उन्ही 21 चोटों के कारण उसे शॉक और हेमरेज हुआ और परिणाम स्वरूप उसकी मृत्यु हुई। इस प्रकार अ0सा010 डॉ0 जे0पी0मेश्राम के साक्ष्य से यह प्रमाणित होता है कि मृतक की मृत्यु फायर आर्म, हार्ड व ब्लन्ट आब्जेक्ट एवं हार्ड एवं शार्प आब्जेक्ट से कारित की गयी चोटों के कारण हुई थी, जो कि हत्यात्मक प्रकृति की थी।
12- इस अवधारणीय प्रश्न पर निष्कर्ष दिये जाने हेतु मृतक महादेव का शव पंचनामा प्रदर्श पी 2 भी अवलोकनीय है, जिसके साक्षी अ0सा035 सदवन महार भी है। इस प्रदर्श पी 2 के शव पंचनामा में मृतक के सिर में दो जगह धारदार हथियार से चोट आने का और मुंह में चोट का निशान, पूरे मुंह में खुन और सिर के पास काफी खुन पड़े होने का उल्लेख है, जिससे भी यह प्रमाणित होता है कि मृतक की मृत्यु की प्रकृति हत्यात्मक थी। अतः स्पष्ट है कि अभियोजन अवधारणीय प्रश्न क्रमांक 1 को प्रमाणित करने में सफल हुआ है।
अवधारणीय प्रश्न क्रमांक 2 पर सकारण निष्कर्ष
13- इस अवधारणीय प्रश्न पर निष्कर्ष दिये जाने के पूर्व इस प्रकरण में अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्य के प्रकार एवं आरोपीगण की प्रतिरक्षाओं का उल्लेख किया जाना आवश्यक है, ताकि इस अवधारणीय प्रश्न पर न्याय की मंशा के अनुरूप निष्कर्ष दिया जा सके। इस प्रकरण में अभियोजन ने उक्त अवधारणीय प्रश्नों को प्रमाणित करने हेतु निम्नानुसार साक्ष्य प्रस्तुत किया है:-
1- मृतक की हत्या के प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य।
2- प्रकरण के विवेचक द्वारा संकलित दस्तावेज एवं रासायनिक परीक्षण का साक्ष्य।
3- प्रकरण के विवेचक द्वारा संकलित इलेक्ट्निक साक्ष्य।
अब यह न्यायालय उक्तानुसार संकलित किये गये साक्ष्य की क्रमवार विवेचना की ओर अग्रसर हो रहा है।
प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का साक्ष्य
14- प्रत्यक्षदर्शी साक्षी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा08 प्रशांत शर्मा एवं अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य के संबंध में आरोपीगण की यह प्रतिरक्षा है कि:-
1- उक्त सभी साक्षी पक्षद्राही हुये हैं। उक्त सभी साक्षियों (अ0सा01 को छोडकर) का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में हुआ था, लेकिन उक्त सभी साक्षियों ने अपने-अपने प्रतिपरीक्षण में यह स्वीकार किया है कि उन्होने घटना नही देखी है, उनके कलमबंद कथन के समय पुलिस वाले न्यायालय के बाहर खड़े थे और पुलिस के दबाव में उन्होंने न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग के न्यायालय में कथन किया था। अ0सा05 लिंगाराजू ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 व अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 13 में यह भी कथन किया है कि तारकेश्वर सिंह ने उन्हें बताया था कि महादेव की हत्या रात में किसी ने कर दी है। अतः सभी आरोपीगण के विद्वान अधिवक्ताओं की प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य के संबंध में यही प्रतिरक्षा है कि उक्त पक्षद्रोही साक्षियों के साक्ष्य मे किये गये कथनों के आधार पर आरोपीगण की दोषसिद्धी नही की जा सकती। इस संबंध में अ0सा08 प्रशांत शर्मा के साक्ष्य की कण्डिका 3,5,6,9, अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की कण्डिका 36, 37, 67 अ0सा05 लिंगाराजू के साक्ष्य की कण्डिका 2, 3, 5 अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की कण्डिका 12, 13 एवं 14 अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य की कण्डिका 4, 7 एवं 8 की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ठ किया है।
2- द्वितीय प्रतिरक्षा है कि जब उक्त साक्षी पक्षद्राही हो गये है और उन्होने न्यायिक मजिस्टेंट के समक्ष दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन पुलिस के दबाव में लेखबद्ध करना बताया है, तब उक्त प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य के दं.प्र.सं. की धारा 164 के तहत लिये गये कथन के आधार पर आरोपीगण की दोषसिद्धी नही की जा सकती। इस संबध में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन लेखबद्ध करने वाले न्यायिक मजिस्टेंट अ0सा059 रामजीवन देवांगन के साक्ष्य की कण्डिका 16, 21 में किये गये कथनों के आधार पर भी यह स्पष्ट है कि उक्त साक्षियों को पुलिस लेकर आयी थी, और उन्होने पुलिस के दबाव में कथन किया था।
3- तृतीय प्रतिरक्षा यह है कि दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन किसी साक्षी के आवेदन/निवेदन पर किसी भी मजिस्टेंट को लेखबद्ध करने की कोई अधिकारिता नही है। अतः इस प्रकरण में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अधिकारिता के अभाव में लिये गये कथन शून्य है। इस संबध में आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन के अधिवक्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय का न्यायदृष्टांत 1999 क्रिमनल लॉ जर्नल 3976, 1990 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्रमांक 385 (पी एण्ड एच), 2006 क्रिमनल लॉ जर्नल 4813 एवं 1998 (2) एमपीडब्ल्यूएन का न्यायदृष्टांत भी प्रस्तुत किया है।
15- जैसा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 में यह उल्लेखित है कि सर्वोत्तम साक्ष्य वही होता है, जो प्रत्यक्ष हो। इस प्रकरण में जैसा कि उपर उल्लेख किया जा चुका है, कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत अ0सा05 लिंगा राजू, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा09 गिरवर साहू ने स्वयं न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग अ0सा059 रामजीवन देवांगन के समक्ष उपस्थित होकर क्रमशः प्रदर्श पी 26, प्रदर्श पी 22, प्रदर्श पी 30 का कथन अभिलिखित करवाया था, जिसमें उन्होंने अभियोजन के मामले की पुष्टि की थी।
16- इस प्रकरण में अभियोजन की कहानी इस प्रकार है कि मृतक महादेव महार की हत्या की घटना को संतोष सिंह उर्फ धनजी, तारकेश्वर सिंह, चंदन साव, गिरवर साहू व लिंगा राजू नामक व्यक्तियों ने देखा था। अर्थात् स्पष्ट है कि अभियोजन ने इस प्रकरण में मृतक महादेव महार की हत्या की घटना को पांच अभियोजन साक्षियों द्वारा देखना बताया है। उक्त पांच अभियोजन साक्षियों में से चार साक्षी संतोष उर्फ धनजी, चंदन साव, गिरवर साहू व लिंगाराजू ने स्वयं दुर्ग न्यायालय के न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) के समक्ष उपस्थित होकर लिखित आवेदन दिया कि मृतक महादेव महार की हत्या के घटना के संबंध में दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत उनका कथन लेखबद्ध किया जावे। अतः दुर्ग जिला न्यायालय के तात्कालीन न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) ने घटना दिनांक 11/2/2005 के छठवे दिन दिनांक 17/2/2005 को उक्त चारों प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों का दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत कथन लेखबद्ध किया गया, जिसमें से संतोष सिंह उर्फ धनजी, साक्षी तारकेश्वर सिंह के पुत्र थे, जिसकी बाद में अन्य आरोपियों द्वारा हत्या कर दी गयी। अभियोजन ने तारकेश्वर सिंह को भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के रूप में संयोजित किया था, जिसका दं0प्र0सं0 की धारा 161 के तहत कथन लिपिबद्ध किया गया था, जो प्रदर्श डी 1 है।
17- अभियोजन द्वारा उक्त प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों को इस न्यायालय में भी साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा07 चंदन साव एवं अ0सा09 गिरवर साहू हैं। अतः सर्वप्रथम दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अभिलिखित किये गये कथन वाले साक्षी अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा09 गिरवर साहू के साक्ष्य का अवलोकन किया गया। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत उन तीनों साक्षियों से न्यायालय से अनुमति प्राप्त कर अभियोजन द्वारा सूचक प्रश्न जैसे प्रश्न पूछे गये हैं। अतः यह न्यायालय अब उक्त तीनों साक्षियों के साक्ष्य का पृथक-पृथक विवेचन कर यह निष्कर्ष दिये जाने की ओर अग्रसर हो रही है कि क्या उक्त तीनों साक्षियों का साक्ष्य विश्वसनीय है, अथवा नही है, और यदि विश्वसनीय है तो क्यो ?
अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य की विश्वसनीयता का परीक्षण
18- सर्वप्रथम अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य का अवलोकन किया गया। अ0सा07 चंदन साव ने अपने मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये सम्पूर्ण कथन का अक्षरशः समर्थन किया है। लेकिन आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने अ0सा07 चंदन साव का उसके मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को उसका प्रतिपरीक्षण नही किया गया, जिसका कारण आदेश पत्र दिनांक 2/8/2007 के अनुसार यह है कि साक्षी के प्रतिपरीक्षण से उनका बचाव खुल जावेगा। जबकि इसी दिनांक को अ0सा05 लिंगा राजू का परीक्षण व प्रति परीक्षण आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा किया गया है। बहरहाल, अ0सा07 चंदन साव का प्रतिपरीक्षण उसके मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 के दो माह 9 दिन विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005 बाद दिनांक 11/10/2007 को किया गया। तब अ0सा07 चंदन साव अपने प्रति परीक्षण दिनांक 11/10/2007 में अपने मुख्य परीक्षण में किये गये सम्पूर्ण कथन से मुकर गये एवं उन्होंने यह कथन किया है कि वह मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को पुलिस के अत्याधिक दबाव में थे। उन्होंने पुलिस के डराने धमकाने से दिनांक 2/8/2007 को पुलिस के बताये अनुसार न्यायालय में असत्य कथन दिया था। वास्तव में उन्होंने महादेव की हत्या होते नही देखा है। महादेव की हत्या किसने की, उसे किसने मारा, वह नही जानता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि अ0सा07 चंदन साव अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को अपने प्रतिपरीक्षण में अस्वीकार कर दिया है। अतः अब यह न्यायालय अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य में किये गये सम्पूर्ण कथन की सूक्ष्म विवेचन कर यह निष्कर्ष दिये जाने हेतु अग्रसर हो रही है कि क्या अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों पर विश्वास किया जा सकता है?
19- अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 21, 22  में उसे न्यायिक मजिस्टेंट प्रथम श्रेणी, दुर्ग श्री रामजीवन देवांगन (अ0सा059) के न्यायालय में हुये बयान व आदेश पत्रिका की प्रतिलिपि दिखाकर पूछा गया तो उसने प्रदर्श पी 21, 22 व प्रदर्श पी 23 के अ से अ भाग में अपने हस्ताक्षर होना स्वीकार किया है। इस साक्षी को प्रदर्श पी 22 का दं0प्र0सं0 की धारा 164 का बयान पढ़ने दिया गया, तब उसने पढ़कर व्यक्त किया है कि उसने ऐसा ही बयान न्यायिक मजिस्टेंट के न्यायालय में दिया था। लेकिन इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 14 एवं 25 में कथन है कि उसे महादेव की हत्या के बाद पुलिस वाले 5-7 दिन तक थाने में रखे थे और उसे एक बयान लिखकर दिये थे, और कहे थे कि ऐसा ही बयान मजिस्टेंट के समक्ष देना है। उसके 5-7 दिन बाद पुलिस वाले उसे न्यायिक मजिस्टेंट देवांगन साहब के न्यायालय में बयान देने के लिये लाये थे और कहे थे कि अगर ऐसा बयान नही दिये तो किसी केस में फंसा देंगे या एनकाउण्टर करवा देंगे। लेकिन प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि अ0सा07 चंदन साव ने पुलिस के दबाव की शिकायत तात्कालीन न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन से क्यों नही की । इस संबंध में अ0सा07 चंदन साव ने अपने प्रति परीक्षण की कण्डिका 25 में कथन किया है कि यह कहना सही है कि प्रदर्श पी 23 का आवेदन उसने स्वयं न्यायिक मजिस्टेंट श्री देवांगन के समक्ष प्रस्तुत किया था, लेकिन उसने न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन से प्रदर्श पी 22 का कथन करते समय एवं इस न्यायालय में दिनांक 2/8/2007 को बयान देते समय न्यायालय को यह नही बताया कि वह पुलिस दबाव में है।
20- अतः अ0सा07 चंदन साव के प्रतिपरीक्षण में किये गये कथन से यह स्पष्ट होता है कि अ0सा07 चंदन साव ने न तो न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन के समक्ष दिनांक 17/2/2005 को और न ही इस न्यायालय के समक्ष दिनांक 2/8/2007 को इस बात की शिकायत की कि वह पुलिस के दबाव में है। जबकि दं0प्र0सं0 की धारा 164 का कथन लेखबद्ध करते समय उसे न्यायिक मजिस्टेंट श्री रामजीवन देवांगन द्वारा यह भली-भांति समझाया गया था कि वह कथन करने के लिये बाध्य नही है, और उसने यह कथन स्वेच्छा से करना है। अतः अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन पर विश्वास करने का प्रथम कारण यह है कि अ0सा07 चंदन साव ने न तो दिनांक 2/8/2007 को इस न्यायालय में और न ही दिनांक 17/2/2005 को न्यायिक मजिस्टेंट के न्यायालय में इस तथ्य की कोई शिकायत नही किया कि वह पुलिस के दबाव में है।

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