Saturday, 14 March 2015

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 161 से 170)

 

आरोपीगण की अन्य प्रतिरक्षाएं
161- आरोपी तपन सरकार एवं आरोपी सत्येन माधवन के अधिवक्ता ने अपने 63 पृष्ठीय तर्क में मुख्यतः विवेचना में की गयी त्रुटियों की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया है एवं यह तर्क प्रस्तुत किया है कि प्रकरण के विवेचक अ0सा076 आर0के0राय एवं अ0सा077 राकेश भट्ठ ने प्रकरण में साक्ष्य संकलित नही किया है, बल्कि उन्होने साक्ष्य की कूटरचना की है और दुषित विवेचना कर मिथ्या साक्ष्य प्रतिस्थापित कर आरोपीगण को झूठा फंसाया है। इस संबंध में उन्होंने इस न्यायालय के समक्ष आरोपी तपन सरकार एवं सत्येन माधवन की निम्नलिखित प्रतिरक्षा को रखा है:-
1- अ0सा08 प्रशांत शर्मा ने प्रदर्श पी 128 को प्रमाणित नही किया है।
2- अ0सा060 सुभाष सिंह मण्डावी की डयुटी 6 बजे समाप्त हो जाती है, अतः वे प्रदर्श पी 128 को प्रमाणित नही कर सके है।
3- प्रदर्श पी 128, प्रदर्श पी 15 के हाशिये में दर्ज सान्हा क्रमांक 881, प्रदर्श पी 139 के हांशियें में दर्ज सान्हा क्रमांक 882 के तुलनात्मक अध्ययन से यह दर्शित होता है कि सान्हा क्रमांक 882 दिनांक 11/2/2005 के प्रातः 10.10 बजे के बाद की हो सकता है, उसके पहले का नही। जबकि सान्हा क्रमांक 882 प्रातः 6.50 बजे का बताया गया है।
4- प्रदर्श पी 138 की देहाती नालिशी में अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा के हस्ताक्षर नही है।
5- प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी 15 की नालिशी को तत्क्षण संबधित न्यायिक मजिस्टेंट के न्यायालय में प्रेषित नही किया गया है।
6- प्रदर्श पी 139 के नम्बरी मर्ग इन्टीमेशन प्रमाणित एवं विश्वसनीय नही है।
7- सान्हा क्रमांक 874 प्रदर्श पी 128 एवं प्रदर्श पी 47 ए क्रमशः 6.35 बजे व 8 बजे दर्ज होना बताया गया है, जो संभव नही है।
8- प्रथम सूचना पत्र प्रदर्श पी 15 की नॉलिशी की पावती द्वितीय श्रेणी न्यायिक मजिस्टेंट की है, जो सम्यक रूप से प्रमाणित नही की गयी है।
9- थाने का डयुटी रजिस्टर प्रस्तुत नही किया गया है।
10- अ0सा024 आरक्षक परमजीत शून्य की नॉलिशी को 7ः30 बजे लेकर गया होगा, तो उसे 8.00 बजे तक थाने पहुंच जाना था, लेकिन वह 10.10 बजे पहुंचा।
11- घटनास्थल का नक्शा प्रदर्श पी 225 में पांच कारतूस खोखे शव के पास पड़े होने का उल्लेख है, एक कारतूस और दो बुलेट पाये जाने का उल्लेख नही है, जबकि घटनास्थल से जप्त वस्तुओं के जप्ती पत्रक प्रदर्श पी 4 में दो कारतूस खोखे एक कारतूस और दो बुलेट जप्त करना बताया गया है।
12- प्रदर्श पी 225 के नजरी नक्शे में प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के खड़े होने का स्थान नही दर्शाया गया है।
13- प्रदर्श पी 225 में दर्शाये गये खोखे और जप्ती पत्र प्रदर्श पी 4 में दर्शाये गये खोखे आइडेन्टिकल होना प्रगट नही होता है क्येाकि प्रदर्श पी 225 में खोखे के पहचान चिन्ह एवं फायर पिन मार्क एवं एमएम का उल्लेख नही है।
14- शव पंचनामा प्रदर्श पी 2 में घटनास्थल सुभाष चौक धनजी के मकान के बगल दक्षिण भाग दर्शाया गया है, जबकि प्रदर्श पी 3 में घटनास्थल धनजी के मकान के दक्षिण पश्चिम में दर्शाया गया है।
15- प्रदर्श पी 2 के शव पंचनामें में शव के सिर के पास कारतूस के खाली खोखे तथा जिंदा राउण्ड कारतूस पड़े होने का उल्लेख है। शव का सिर पश्चिम दिशा में तथा पैर पूर्व दिशा में होना दर्शाया गया है। इसके विपरीत प्रदर्श पी 225 में खोखों की स्थिति शव के सिर के पास नही बल्कि शव के उत्तर तथा दक्षिण में दर्शायी गयी है।
16- शव पंचनामा प्रदर्श पी 2 में बुलट इंज्युरी एवं मृतक के कपड़ों में पाये गये बुलट का उल्लेख नही है।
17- मृतक के टी शर्ट में जो बुलट पायी गयी है, वह कहां से आयी, इसकी कोई विवेचना नही की गयी है।
18- अ0सा015 होल सिंह को पोस्टमार्टम के बाद नौ सीलबंद आइटम मिले थे, जो प्रदर्श पी 47 के अनुसार आठ पैकट प्राप्त होना बताया गया है।
19- अ0सा015 होल सिंह के साक्ष्य के अनुसार उसने 11/2/2005 को अस्पताल से प्राप्त माल को सीलबंद हालत में सौप दिया था, जिसकी जप्ती आरक्षक होल सिंह के आधिपत्य से दिनांक 12/2/2005 को की गयी है। इसका कोई साक्ष्य नही है कि मालखाने से माल कब निकाला गया।
20- अ0सा010 डॉ0 मेश्राम ने अनेक धारदार चोटों का उल्लेख किया है, लेकिन मृतक के पहने हुये कपड़ों पर धारदार हथियार से कटने का कोई निशान नही पाया गया है।
21- अ0सा010 के साक्ष्य की कण्डिका 7 के अनुसार मृतक के तीन टी शर्ट न्यायालय में प्रस्तुत नही की गयी है।
22- आरोपी के अधिवक्ता ने लिखित तर्क के साथ परिशिष्ट ए संलग्न किया है जिसमें उन्होंने अपराध विवरण के फार्म, सीएफएसएल मेमो में विवरण, माल भेजने के फार्म में विवरण, सीएफएसएल मेमो में विवरण की भिन्नता को दर्शाया है।
162- आरोपी तपन सरकार एवं आरोपी सत्येन माधवन के विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत उक्त प्रतिरक्षाओं को उपरी तौर पर देखे तो बहुत सारभूत प्रतीत होती है, लेकिन यदि उक्त प्रतिरक्षाओं के संबंध में प्रकरण के विवेचक द्वारा की गयी विवेचना की कार्यवाहियों का सुक्ष्म विश्लेषण करें तो यह ज्ञात होता है कि विवेचना में की गयी उक्त त्रुटियां सारभूत प्रकृति की नही है, एवं अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य की जड़ को प्रभावित नही करती है। आरोपी तपन सरकार एवं आरोपी सत्येन माधवन की उक्त प्रतिरक्षाओं को अस्वीकार करने का प्रथम कारण तो यह है कि इस प्रकरण में अ0सा01 तारकेश्वर सिंह, अ0सा07 चंदन साव, अ0सा02 केशव प्रसाद चौबे, अ0सा03 प्रशांत कुमार, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली, अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा व अ0सा09 गिरवर साहू या तो घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी है या घटना के तुरन्त बाद घटनास्थल पर पहुंचे हैं। उनके साक्ष्य का विस्तार से विश्लेषण इस न्यायालय द्वारा उपर की कण्डिकाओं में किया गया है और यह निष्कर्ष दिया जा चुका है कि उक्त साक्षियों के साक्ष्य में किया गया वह कथन जो अभियोजन के मामले का समर्थन करता है, उससे क्या-क्या तथ्य प्रमाणित होते हैं। अतः ऐसी स्थिति में आरोपीगण की उक्त प्रतिरक्षाएं जो विवेचना में की गयी त्रुटियों से संबंधित है, का कोई लाभ आरोपीगण को नही दिया जा सकता।
163- आरोपीगण की उक्त प्रतिरक्षाएं इसलिये भी स्वीकार योग्य नही है, क्योंकि, उक्त सभी प्रतिरक्षाएं घटना दिनांक 11/2/2005 को या 12/2/2005 को निर्मित किये गये दस्तावेजों से संबंधित है। इस संबंध में प्रकरण के विवेचक अ0सा077 राकेश भट्ठ ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 43 में स्वतः होकर कथन किया है कि घटना दिनांक 11/2/2005 को घटना के कारण कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गयी थी। इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 44 में कथन है कि कानून और व्यवस्था की स्थिति मृतक की हत्या के बाद से बिगड़ना प्रारम्भ हो गयी थी जो प्रातः 11 बजे तक बिगड़ी रही और उसके बाद दोपहर को शव पोस्टमार्टम से वापस आया तो पुनः कानून और व्यवस्था की स्थिति रात्रि 8ः30 बजे बिगड़ी रही। अ0सा077 राकेश भट्ठ ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 24 में यह भी कथन किया है कि मृतक महादेव के मोहल्ले के लोगों ने प्रदर्शन किया था और प्रिन्ट मीडिया और इलेक्ट्रा निक मीडिया के लोग लगातार मृतक महादेव के हत्या का प्रसारण और प्रकाशन कर रहे थे। अतः ऐसी स्थिति में जबकि घटना दिनांक 11/2/2005 को मृतक की हत्या के कारण शहर में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गयी थी और ऐसी स्थिति में यदि 11/2/2005 को निर्मित किये गये दस्तावेजों में विवरण को लेकर कोई त्रुटि हुई है तो वह इस प्रकार की नही है, जिसके कारण आरोपीगण को दोषमुक्त किया जा सके।
164- विवेचना में की गयी त्रुटियों या दुषित विवेचना के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय के कतिपय न्यायदृष्टांत अवलोकनीय है जो निम्न है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय ने निम्नानुसार अभिनिर्धारित किया है:-
1- सुराजीत सरकार विरूद्ध स्टेट आफ वेस्ट बंगाल ए.आई. आर. 2013 सुप्रीम कोर्ट 807 के पैरा 54 में यह अवलोकित किया गया है:-
54.We are not prepared to accept as a broad proposition of law that in no case can defective or shoddy investigations lead to an acquittal. It would eventually depend on the defects pointed out. If the investigation results in the real culprit of an offence not being identified, then acquittal of the accused must follow. It would not be permissible to ignore the defects in an investigation and hold an innocent person guilty of an offence which he has not committed. The investigation must be precise and focused and must lead to the inevitable conclusion that the accused has committed the crime. If the investigating officer leaves glaring loopholes in the investigation, the defence would be fully entitled to exploit the lacunae.In such a situation, it would not be correct for the prosecution to argue that the Court should gloss over the gaps and find the accused person guilty. If this were permitted in law, the prosecution could have an innocent person put behind bars on trumped up charges. Clearly, this is impermissible and this is not what this Court has said.
2- हेमा विरूद्ध स्टेट, द्वारा इंस्पेक्टर आफ पुलिस मद्रास एआईआर 2013 सुप्रीम कोर्ट 1000 के पैरा 10 में यह अवलोकित किया गया है कि :-
10.It is also settled law that for certain defects in investigation, the accused cannot be acquitted. This aspect has been considered in various decisions. In C. Muniappan and others v. State of Tamil Nadu, 2010 (9) SCC 567 : (AIR 2010 SC 3718), the following discussion and conclusion are relevant which are as follows (Para 44 of AIR) :-
"55. There may be highly defective investigation in a case. However, it is to be examined as to whether there is any lapse by the IO and whether due to such lapse any benefit should be given to the accused. The law on this issue is well settled that the defect in the investigation by itself cannot be a ground for acquittal. If primacy is given to such designed or negligent investigations or to the omissions or lapses by perfunctory investigation, the faith and confidence of the people in the criminal justice administration would be eroded. Where there has been negligence on the part of the investigating agency or omissions, etc.  hich resulted in defective investigation, there is a legal obligation on the part of the court to examine the prosecution evidence dehors such lapses, carefully, to find out whether the said evidence is reliable or not and to what extent it is reliable and as to whether such lapses affected the object of finding out the truth. Therefore, the investigation is not the solitary area for judicial scrutiny in a criminal trial. The conclusion of the trial in the case cannot be allowed to depend solely on the probity of investigation.
3-इसी प्रकार माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत बाबू एवं अन्य विरूद्ध स्टेट Rep. by inspector of police chennai AIR 2013 SC 1769  के पैरा 16 में अवलोकित किया गया है कि:-
16. -------------------- in this case there is direct evidence of three eye-witnesses, PW-1, PW- 2 and PW-3, to establish beyond reasonable doubt that the appellants had struck the deceased with knives. If a defect in the investigation does not create a reasonable doubt on the guilt of the accused, the Court cannot discard the prosecution case on the ground that there was some defect in the investigation.
4-करणसिंह विरूद्ध स्टेट आफ हरियाणा एवं अन्य एआईआर 2013 सुप्रीम कोर्ट 2348 के पैरा 14 में अवलोकित किया गया है कि:-
14.Omissions made on the part of the Investigating Officer, where the prosecution succeeds in proving its case beyond any reasonable doubt by way of adducing evidence, particularly that of eye-witnesses and other witnesses, would not be fatal to the case of the prosecution, for the reason that every discrepancy present in the investigation does not weigh upon the court to the extent that it necessarily results in the acquittal of accused, unless it is proved that the investigation was held in such manner that it is dubbed as "a dishonest or guided investigation", which will exonerate the accused.(See: Sonali Mukherjee v. Union of India, (2010) 15 SCC 25 : (AIR 2010 SC (Supp) 415) : (2010 AIR SCW 499); Mohd. Imran Khan v. State Government (NCT of Delhi), (2011) 10 SCC 192 : (2011 AIR SCW 6821); Sheo Shankar Singh v. State of Jharkhand and Anr., AIR 2011 SC 1403 : (2011 AIR SCW 1845); Gajoo v. State of Uttarakhand, (2012) 9 SCC 532 : (2012 AIR SCW 5598); Shyamal Ghosh v. State of West Bengal, AIR 2012 SC 3539 : (2012 AIR SCW 4162); and Hiralal Pandey and Ors. v. State of U.P., AIR 2012 SC 2541) : (2012 AIR SCW 2503).
Thus, unless lapses made on the part of Investigating authorities are such, so as to cast a reasonable doubt on the case of the prosecution, or seriously prejudice the defence of the accused, the court would not set aside the conviction of the accused merely on the ground of tainted investigation.
दोषपूर्ण विवेचना के संबंध में आरोपी सत्येन माधवन एवं तपन सरकार के अधिवक्ता ने माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत 2014 (2) क्राइम्स पेज क्रमांक 207 एस0सी0 एवं 1994 क्रिमनल लॉ जर्नल (एससी) 2320 प्रस्तुत किया है। लेकिन प्रथम न्यायदृष्टांत में अत्यंत दोषपूर्ण विवेचना ;टमतल बनतेवतलद्ध के तहत महत्वपूर्ण साक्षी स्वामी का परीक्षण विवेचक द्वारा नही किया गया था एवं टेस्ट आइडेन्टीफिकेशन परेड भी नही कराया गया। इसी प्रकार द्वितीय न्यायदृष्टांत में भी विवेचक ने मिथ्या साक्ष्य निर्मित किया था, जबकि इस प्रकरण में उक्त विवेचन अनुसार विवेचक द्वारा मिथ्या साक्ष्य निर्मित या प्रतिस्थापित नही करना पाया गया है। अतः उक्त प्रस्तुत न्यायदृष्टांत का कोई लाभ आरोपीगण को नही दिया जा सकता।
165- अतः माननीय उच्चतम न्यायालय के उक्त न्यायदृष्टांतों में अवलोकित की गयी विधि को दृष्टिगत रखते हुये अब यह न्यायालय आरोपी तपन सरकार और आरोपी सत्येन माधवन की प्रतिरक्षा को क्रमशः लेते हुये अभियोजन के साक्ष्य की विवेचना की ओर अग्रसर हो रहा है।
प्रतिरक्षा क्रमांक 1 एवं 2
166- यह बात सही है कि अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा से प्रदर्श पी 128 को दर्ज करवाने या नही करवाने के बारे में कोई प्रश्न नही किया गया है, लेकिन इस संबंध में अ0सा06 मुरली ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 में यह कथन किया है कि प्रशांत उर्फ गुड्डा ने उसके घर से सुपेला थाने फोन किया और फिर उसके घर से चला गया। इस संबंध में अ0सा060 सुभाष सिंह मण्डावी ने भी अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 में यह स्वीकार किया है कि दिनांक 11/2/2005 को 6.15 बजे किसी ने अपना नाम प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा बताते हुये फोन पर पुलिस थाना सुपेला में सूचना दी कि तपन सरकार और उसके साथी ने महादेव महार की हत्या सुभाष चौक में कर दी है, तुरन्त आओ। जिसे रोजनामचा सान्हा क्रमांक 874 में तत्काल दर्ज किया। मूल सान्हा की कार्बन कापी प्रदर्श पी 128 है, जिसकी सत्यप्रतिलिपि प्रदर्श पी 128 सी है। यद्यपि इस साक्षी ने अपने विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005 प्रतिपरीक्षण की कण्डिका 2 में यह स्वीकार किया है कि उसकी थाना सुपेला में दिनांक 10/2/2005 की रात 9 बजे से दिनांक 11/2/2005 की सुबह 6 बजे तक थाना सुपेला में उसकी ड्युटी मुंशी रोजनामचा थी। लेकिन इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 में स्वतः होकर कथन किया है कि सुबह जब वह थाना मुंशी रोजनामचा की डयुटी से रिलीफ हो रहा था, उसी समय फोन आया, तो उसने फोन उठा लिया। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 और 3 में पुन ः यह कथन किया है कि उस दिन दिनांक 11/2/2005 को सुबह जब डयुटी से रिलीफ हो रहा था तो ड्युटी के बाद करीब आधा घण्टा वह वहां रहा, ताकि थाने के लॉक प्रधान आरक्षक डोमार सिंह जो उसका सक्सेसर था, उसे आवश्यक जानकारी दे सके। इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 5 में यह भी कथन किया है कि दिनांक 11/2/2005 के सुबह 6 बजे के बाद वह जो करीब आधा घण्टा भी आगे रूका था, ऐसा वह और दिन में भी रूकता है। अतः स्पष्ट है कि अ0सा08 प्रशांत शर्मा द्वारा टेलीफोन से की गयी शिकायत को अ0सा060 सुभाषसिंह मण्डावी ने अटेण्ड किया था। यद्यपि उसकी ड्युटी 6 बजे समाप्त हो गयी थी, लेकिन यह स्वाभाविक है कि ड्युटी से रिलीफ होते समय आवश्यक जानकारी सक्सेसर को देने में आधा घण्टे का अतिरिक्त समय लग ही जाता है। अतः ऐसे में यदि अ0सा060 सुभाषसिंह मण्डावी ने डयुटी से रिलीफ होने के आधा घण्टे के अंदर फोन को अटेण्ड किया था, तो उसमें कोई अनियमितता या अवैधता दर्शित नही होती है और न ही यह दर्शित होता है कि प्रदर्श पी 128 का सान्हा फर्जी रूप से अभिलिखित किया गया है। अतः स्पष्ट है कि आरोपीगण की प्रतिरक्षा क्रमांक 1 और 2 स्वीकार योग्य नही है।
प्रतिरक्षा क्रमांक 3,4,6 एवं 9
167- प्रदर्श पी 128 के रोजनामचा सान्हा से दो तथ्य शंका से परे प्रमाणित होते हैं कि मृतक की हत्या के तुरन्त बाद आरोपी तपन सरकार एवं उसके साथियों का नाम मृतक की हत्या के अपराध में अभिलिखित कर दिया गया था। दूसरा मृतक महादेव महार की हत्या के तुरन्त बाद नाईट आफिसर अनिता सागर उपनिरीक्षक अपने हमराह स्टाफ होल सिंह के साथ तत्काल घटनास्थल रवाना हो गयी थी। अभियोजन के प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य से जिसका उल्लेख इस निर्णय के उपर किया जा चुका है, से भी यह प्रमाणित होता है कि मृतक महादेव महार की हत्या के तुरन्त बाद अ0सा060 अनिता सागर घटनास्थल पर पहुंच गयी थी।
168- अ0सा069 अनिता सागर ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 1 में कथन किया है कि वह घटनास्थल पर गयी और मर्ग सदर कायम कर पंचनामा कार्यवाही में लिया गया। मर्ग सूचना प्रदर्श पी 138 है। इस साक्षी का अपने साक्ष्य की कण्डिका 2 में कथन है कि उन्होंने प्रार्थी प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा के बताये अनुसार देहाती नालिशी लेखबद्ध की थी जो प्रदर्श पी 15 है, जिसके स से स भाग पर उसके और अ से अ भाग पर प्रार्थी संतोष शर्मा उर्फ प्रशांत उर्फ गुड्डा के हस्ताक्षर है। इस साक्षी ने अपने प्रतिपरीक्षण की कण्डिका 4 और 5 में यह स्वीकार किया है कि घटनास्थल पर 6.40 बजे पहुंच गयी थी और घटनास्थल पर पहुंचने वाली पहली पुलिस अधिकारी थी। उसके पहुंचने के 5-10 मिनट बाद तत्कालीन टी0आई0 राकेश भट्ठ, आरक्षक परमजीत, दिनेश तथा अन्य स्टाफ भी घटनास्थल पर पहुंच गये । इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 6, 7 एवं 8 में कथन किया है कि यह कहना सही है कि प्रदर्श पी 138 में सूचनाकर्ता प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा के हस्ताक्षर नही है। उसने थाने से रवानगी होते समय महादेव महार की मृत्यु की सूचना एस.डी.एम. को नही दी थी और प्रदर्श पी 138 की प्रति भी एस.डी.एम. को नही भेजी थी। इस साक्षी ने यह भी स्वीकार किया है कि उसने देहाती नालिशी प्रदर्श पी 15 प्रातः 7.05 बजे दर्ज कर उसे तुरन्त नम्बर पर दर्ज करने हेतु थाना भेज दिया था। अतः प्रदर्श पी 128, प्रदर्श पी 15 और प्रदर्श पी 139 का अवलोकन किया गया। प्रदर्श पी 128 वह रोजनामचा सान्हा है, जो सर्वप्रथम दर्ज किया गया था, जो कि प्रातः 6.35 बजे दर्ज किया गया था, जबकि प्रदर्श पी 15 देहाती नालिशी है, जो दिनांक 11/2/2005 को प्रातः 7.05 बजे दर्ज कर लिया गया था। नम्बरी मर्ग इन्टीमेशन जिसे आरक्षक परमजीत सिंह क्रमांक 490 ने लाकर थाने में प्रस्तुत किया था, इस प्रदर्श पी 139 के मर्ग इन्टीमेशन में जो कि घटना के लगभग आधा घण्टे के अंदर ही दर्ज किया गया है, आरोपी तपन सरकार, मंगल सिंह, सत्येन माधवन, जयदीप, प्रभाष, गोविन्द विश्वकर्मा, बच्चा उर्फ अब्दुल जायद उर्फ अशरफ, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, गुल्लू श्रीवास्तव, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, विनोद एवं अन्य 5-6 लोगों का उल्लेख है और यह भी उल्लेख है कि वे लोग तलवार, कट्टा, खुखरी और डण्डे से लैस होकर मृतक महादेव महार की मारपीट कर हत्या किये हैं।
169- अतः घटना के मात्र आधा घण्टे के अंदर दर्ज प्रदर्श पी 128, प्रदर्श पी 139 में आरोपीगण के नाम का उल्लेख है, और तुरन्त बाद दर्ज होने से उसकी कुटरचना या फैब्रीकेशन का कोई अनुमान भी नही लगाया जा सकता है। यद्यपि प्रदर्श पी 138 की देहाती नालिशी में प्रशांत उर्फ गुड्डा के हस्ताक्षर नही है, और न ही उसे एस.डी.एम. को सूचित किया गया है, लेकिन प्रकरण में यह साबित हुआ है कि घटना की सर्वप्रथम सूचना अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा ने टेलीफोन से दी थी। अतः ऐसी स्थिति में प्रदर्श पी 138 की देहाती नॉलिशी में प्रशांत उर्फ गुड्डा के हस्ताक्षर न होने का कोई भी प्रतिकुल प्रभाव अभियोजन के प्रकरण पर नही पड़ता है, और न ही एस.डी.एम. को सूचनार्थ प्रति न भेजने का कोई प्रभाव अभियोजन के प्रकरण पर पड़ता है, क्योंकि प्रकरण के स्वतंत्र साक्षियों के साक्ष्य में भी यह आया है कि घटना के तुरन्त बाद घटनास्थल पर पुलिस के उच्चाधिकारी पहुंच गये थे । अतः स्पष्ट है कि आरोपीगण की प्रतिरक्षा क्रमांक 3,4,6, 9 स्वीकार योग्य नही है, अतः अस्वीकार की जाती है।
प्रतिरक्षा क्रमांक 7
170- यह सही है कि प्रदर्श पी 128 का सान्हा क्रमांक 174 मृतक महादेव की हत्या के बाद 6ः35 बजे दर्ज किया गया है। लेकिन अ0सा015 होल सिंह के डयुटी प्रमाण पत्र प्रदर्श पी 47 ए एवं प्रदर्श पी 139 में सान्हा क्रमांक 882 एवं 881 लाल स्याही से अंकित है। लेकिन प्रथम तो इस संबंध में कोई भी प्रश्न प्रदर्श पी 139, प्रदर्श पी 47 ए को अभिलिखित करने वाले साक्षी से नही पुछा गया है। द्वितीय यह भी है कि प्रकरण में सान्हा क्रमांक 882, 881 प्रस्तुत ही नही किया गया है। तृतीय यह भी है कि प्रदर्श पी 139 के प्रथम सूचना पत्र में थाने पर सूचना प्राप्त होने का दिनांक और समय के रोजनामचा सान्हा क्रमांक के कॉलम में 881/11.2.2005 अंकित है, जिससे यह निष्कर्ष नही निकाला जा सकता है कि सान्हा क्रमांक 881 में प्रथम सूचना पत्र दर्ज करने का समय अभिलिखित है। अतः उक्त कारणों से आरोपीगण की उक्त प्रतिरक्षा स्वीकार योग्य नही है कि घटना के सान्हा क्रमांक 874 दो बार प्रातः 6.35 और 8 बजे लिखा गया है, बल्कि यह स्पष्ट है कि सान्हा क्रमांक 874 प्रदर्श पी 128 प्रातः 6.35 को लिखा गया है और प्रदर्श पी 47 ए अ0सा015 होलसिंह का कर्तव्य प्रमाण पत्र है। अतः प्रतिरक्षा क्रमांक 7 स्वीकार योग्य नही है।

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