Saturday, 14 March 2015

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 21 से 30)

 

21- अ0सा07 चंदन साव का उसके मुख्य परीक्षण के दो माह नौ दिन बाद सर्वप्रथम आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा प्रति परीक्षण किया गया और जब इस साक्षी ने अपने प्रति परीक्षण में अपने मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को अस्वीकार कर दिया तब इस न्यायालय के विशेष लोक अभियोजक ने अ0सा07 चंदन साव से सूचक प्रश्न जैसे प्रश्न पूछे हैं। अतः अ0सा07 चंदन साव का आरोपीगण के अधिवक्तागण द्वारा किये गये प्रतिपरीक्षण एवं इस न्यायालय के विशेष लोक अभियोजक द्वारा किये गये प्रति परीक्षण का अवलोकन किया गया। अ0सा07 चंदन साव का सर्वप्रथम प्रतिपरीक्षण आरोपी तपन सरकार एवं आरोपी सत्येन माधवन के अधिवक्ता श्री टी0सी0पंड्या द्वारा कियागया। इस प्रति परीक्षण में अ0सा07 चंदन साव ने आरोपीगण के विद्वान अधिवक्ता श्री टी0सी0पंड्या द्वारा दिये गये दस सुझावों को लगातार सही होने का कथन किया है, जबकि इस साक्षी का जब विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रतिपरीक्षण किया गया तो इस साक्षी ने लगभग 18 बार दिये गये सुझावों को गलत होने का कथन किया है। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि अ0सा07 चंदन साव को यह समझाया गया है कि आरोपीगण की ओर से जो भी सुझाव उसे दिया जावेगा, उसे वह सही होने का कथन करेगा, और विशेष लोक अभियोजक द्वारा जो सूझाव दिये जायेंगे उसे वह गलत बतायेगा। अतः अ0सा07 चंदन साव के प्रतिपरीक्षण में दिये गये सुझावों की स्वीकारोक्ति से भी यह प्रमाणित होता है कि अ0सा07 चंदन साव का उसके दं0प्र0सं0 की धारा 164 के बयान दिनांक 17/2/2005 और इस न्यायालय में हुये मुख्य परीक्षण दिनांक 2/8/2007 के बाद आरोपीगण द्वारा Win Over किया गया है। अतः यह द्वितीय कारण है कि जिसके कारण अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन पर विश्वास किया जा सकता है।
22- अ0सा07 चंदन साव ने अपने साक्ष्य में यह स्वीकार किया है कि उसने अ0सा060 श्री रामजीवन देवांगन के समक्ष दं0प्र0सं0 की धारा 164 का कथन किया था। यह न्यायालय दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथन की इस विधि से पूर्णतः अवगत है कि दं0प्र0सं0 की धारा 164 एवं 161 के तहत लिये गये कथनों में मुख्य अंतर यह होता है कि दं0प्र0सं0 की धारा 161 के कथनों का उपयोग न्यायालय में किये गये साक्षियों के कथनों के (Contra-diction) के  लिये किया जाता है। लेकिन दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथनों का उपयोग साक्षियों के न्यायालय में किये गये कथनों के (Contra-diction) एवं समर्थन (Support) दोनों के लिये किया जा सकता है। अतः दं0प्र0सं0 की धारा 164 की उक्त विधिक स्थिति को दृष्टिगत रखते हुये अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन एवं उसके दं0प्र0सं0 की धारा 164 में लिये गये कथन प्रदर्श पी 22 का अवलोकन किया गया। प्रदर्श पी 22 का कथन दिनांक 17/2/2005 को हुआ था, जबकि लगभग दो वर्ष बाद दिनांक 2/8/2007 को अ0सा07 चंदन साव का मुख्य परीक्षण इस न्यायालय में हुआ है। लेकिन अ0सा07 चंदन साव ने अपने मुख्य परीक्षण में प्रदर्श पी 22 के कथनो का अक्षरशः समर्थन किया है। यह तभी संभव हो सकता है जब किसी साक्षी ने किसी गम्भीर घटना को स्वयं देखा हो। अतः अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में विश्वास करने का तृतीय कारण यह भी है कि अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथन एवं दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत लिये गये कथन प्रदर्श पी 22 में कोई भी विरोधाभाष नही है।
23- अ0सा07 चंदन साव का प्रति परीक्षण दिनांक 2/8/2007 को आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा इसलिये नही किया गया, क्योंकि उनके अनुसार आरोपीगण का बचाव खुल जावेगा। जबकि इसी दिन अभियोजन द्वारा अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली का प्रतिपरीक्षण किया गया है। अ0सा05 लिंगाराजू एवं अ0सा06 मुरली का परीक्षण 12.30 बजे दोपहर को प्रारम्भ किया गया और 2.00 बजे दोपहर को समाप्त हो गया था। चुंकि दोनों साक्षी पक्षद्रोही हुये थे, इसलिये आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा उनका प्रतिपरीक्षण कर लिया गया है। लेकिन अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण 2.40 से प्रारम्भ किया जाकर 3.10 बजे दोपहर को समाप्त हो गया था। लेकिन इस साक्षी का प्रति परीक्षण न्यायालय का समय होने के बाद भी आरोपीगण द्वारा नही किया गया। लेकिन दिनांक 11/10/2007 को अ0सा07 चंदन साव का प्रति परीक्षण किया गया, तब आरोपीगण की ओर से आरोपीगण की प्रतिरक्षा से संबंधित ऐसा कोई भी प्रश्न नही पुछा गया जो आरोपीगण की प्रतिरक्षा को खोलता हो। अतः यह चतुर्थ कारण है जिसके कारण अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों पर अविश्वास नही किया जा सकता है।
अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की विश्वसनीयता का परीक्षण
24- इसी प्रकार प्रकरण का द्वितीय प्रत्यक्षदर्शी साक्षी अ0सा01 तारकेश्वर सिंह है। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने पुलिस को घटना दिनांक 11/2/2005 के ठीक दूसरे दिन 12/2/2005 को प्रदर्श डी 1 का पुलिस बयान दिया था, जिसमें उसने घटना दिनांक 11/2/2005 को घटना देखने की पुष्टि की थी। इस साक्षी का न्यायालय में परीक्षण दिनांक 17/4/2006 को हुआ और उस दिन इस साक्षी का आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा प्रतिपरीक्षण भी पूर्ण कर लिया गया। लेकिन इस प्रकरण के दो आरोपी जयदीप एवं अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू, अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मुख्य परीक्षण व प्रति परीक्षण दिनांक 27/4/2006 को फरार थे, जो अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के बाद गिरफ्तार किये गये। तब अ0सा07 तारकेश्वर सिंह को पुनः दिनांक 1/8/2008 को अर्थात् उसके साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के लगभग दो वर्ष बाद पुनः प्रतिपरीक्षण हेतु आहुत किया गया। तब आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण ने अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से प्रश्नोत्तरी के रूप में उसका प्रतिपरीक्षण किया। जिसमें अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने मुख्य परीक्षण दिनांक 27/4/2006 को किये गये सम्पूर्ण कथन को अस्वीकार कर दिया। अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 को अपने साक्ष्य की कण्डिका 36 से 38 में यह व्यक्त किया है कि ‘‘उसने महादेव की हत्या होते नही देखा, उसे क्राइम ब्राच दुर्ग के इंचार्ज राजीव शर्मा ने यह धमकी दिया था कि उसके पुत्र संतोष सिंह के मर्डर के केस को खराब कर देंगे और उसे भी अंदर कर देगे, इसीलिये उसने दिनांक 27/4/2006 को पुलिस के दबाव में बयान दिया था। उसके सामने जप्ती पत्र प्रदर्श पी 4 के अनुसार खोख की जप्ती नही हुई थी।‘‘ इसके बाद अ0सा01 तारकेश्वर सिंह को पक्षद्रोही साक्षी घोषित करवाकर दिनांक 17/10/2008 को विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रति परीक्षण किया गया, जिसका आरोपीगण के विद्वान अधिवक्तागण द्वारा पुनः दिनांक 24/11/2008 को प्रति परीक्षण किया गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का साक्ष्य कुल चार तिथियों में पूर्ण हुआ है।
25- उक्त स्थिति में प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास किया जावे अथवा न किया जावे ? इस प्रश्न के उत्तर के लिये अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की ‘‘सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक मूल्यांकन‘‘ की आवश्यकता है। अतः अब यह न्यायालय अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य की ‘‘सुक्ष्म एवं सावधानीपूर्वक मूल्यांकन‘‘ करने की ओर अग्रसर हो रहा है।
26- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का दिनांक 01/8/2008 को अर्थात् उसके साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के दो वर्षो बाद किया गया प्रति परीक्षण केवल आरोपी जयदीप एवं आरोपी अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव से संबंधित होना चाहिये था, लेकिन इस साक्षी के प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 के अवलोकन से यह विदित होता है कि इस साक्षी का प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 आरोपी जयदीप एवं आरोपी अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव तक सीमित नही था। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का प्रथम कारण यह है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रति परीक्षण दिनांक 01/8/2008 आरोपी जयदीप एवं अरविंद उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव तक सीमित नही था। द्वितीय कारण यह भी है कि यदि किसी साक्षी का एक बार परीक्षण प्रतिपरीक्षण हो जाता है, उसके बाद उस साक्षी के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को ‘‘उस साक्षी का पूर्व कथन‘‘ नही माना जा सकता है। चुंकि पूर्व कथन नही माना जा सकता है, इसलिये अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 का उपयोग केवल आरोपी जयदीप सिंह एवं आरोपी अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू के लिये ही साक्ष्य के रूप में ग्राह्य हो सकता है, अन्य आरोपियों के संबंध में साक्ष्य के रूप में ग्राह्य नही हो सकता है। इस संबंध में मिश्री लाल एवं अन्य विरूद्ध म0प्र0 राज्य एवं अन्य 2005 ए.आई.आर.एस.सी.डब्ल्यू. 2770 का पैरा 5 एवं 6 अवलोकनीय है:-
5. The learned Counsel for the appellants seriously attacked the evidence of PW2 Mokam Singh. This witness was examined by the Sessions Judge on 6-2-1991 and cross-examined on the same day by the defence counsel. Thereafter, it seems, that on behalf of the accused persons an application was filed and PW2 Mokam Singh was recalled. PW-2 was again examined and cross-examined on 31-7-1991. It may be noted that some of the persons who were allegedly involved in this incident were minors and their case was tried by the Juvenile Court. PW2 Mokam Singh was also examined
as a witness in the case before the Juvenile Court. In the Juvenile Court, he gave evidence to the effect that he was not aware of the persons who had attacked him and on hearing the voice of the assailants, he assumed that they were some Banjaras. Upon recalling, PW-2 Mokam Singh was confronted with the evidence he had given latter before the Juvenile Court on the basis of which the accused persons were acquitted of the charge under Section 307 IPC for having made an attempt on the life of this witness.
6. In our opinion, the procedure adopted by the Sessions Judge was not strictly in accordance with law. Once the witness was examined in-chief and cross-examined fully, such witness should not have been recalled and re- examined to deny the evidence he had already given before the court, even though that witness had given an inconsistent statement before any other court or forum subsequently. A witness could be confronted only with a previous statement made by him.At the time of examination of PW2 Mokam Singh on 6-2-2001, there was no such previous statement and the defence counsel did not confront him with any statement alleged to have been made previously. This witness must have given some other version before the Juvenile Court for extraneous reasons and he should not have been given a further opportunity at a later stage to completely efface the evidence already given by him under oath. The courts have to follow the procedures strictly and cannot allow a witness to escape the legal action for giving false evidence before the court on mere explanation that he had given it under the pressure of the police or some other reason. Whenever the witness speaks falsehood in the court, and it is proved satisfactorily, the court should take a serious action against such witnesses.
27- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर विश्वास करने का तृतीय कारण यह भी है कि पटवारी अ0सा013 सत्यनारायण कौशिक द्वारा बनाये गये प्रदर्श पी 3 के नक्शे के अनुसार लाल स्याही से चिन्हित स्थल पर मृतक महादेव महार का शव पड़ा था, जहां से अ0सा01 तारकेश्वर का मकान (नक्शे में क्रमांक 1 से चिन्हित है) मात्र तीन फूट की दूरी पर है। अतः स्पष्ट है कि अभियोजन के अनुसार मृतक महादेव महार की हत्या की घटना अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के मकान के ठीक सामने हुई है। अतः ऐसी स्थिति में अ0सा01 तारकेश्वर सिंह घटना का स्वाभाविक साक्षी है। अतः स्वाभाविक साक्षी के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर अविश्वास नही किया जा सकता।
28- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 पर विश्वास करने का चतुर्थ कारण यह भी है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह का पुलिस बयान प्रदर्श डी 1 घटना के ठीक दूसरे दिन दि0 12/2/2005 को लिया गया था। इस पुलिस बयान प्रदर्श डी 1 एवं इस साक्षी के साक्ष्य दिनांक 17/4/2006 में कोई भी महत्वपूर्ण विरोधाभाष या लोप नही है।
29- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से पक्षद्रोही घोषित होने के पश्चात विशेष लोक अभियोजक द्वारा प्रश्न किया गया है, तब अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 52 और 53 में यह स्वीकार किया है कि यह कहना सही है कि उसने क्राइम ब्रांच के इंचार्ज राजीव शर्मा के दबाव में दिनांक 27/4/2006 को बयान देने की शिकायत 47 विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005 पुलिस के किसी वरिष्ठ अधिकारी को अथवा शासन को नही किया। इस साक्षी का यह भी कथन है कि उसने दिनांक 1/8/2008 के पूर्व, व दिनांक 01/8/2008 को न्यायालय के समक्ष अपने पुनः परीक्षण के दौरान भी स्वतः होकर कोई शिकायत नही किया एवं किसी न्यायालय में परिवाद भी प्रस्तुत नही किया। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का पंचम कारण ऐसी किसी शिकायत का अभाव भी है।
30- अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने प्रति परीक्षण दिनांक 1/8/2008 को यह व्यक्त किया है कि उस पर क्राइम ब्रांच के राजीव शर्मा का यह दबाव था कि वह आरोपीगण के विरूद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करें, नही तो उसके पुत्र संतोष सिंह के मर्डर के केस को बिगाड़ देंगे। लेकिन इस साक्षी के पुत्र धनजी उर्फ संतोष का मर्डर दिनांक 2 मार्च 2005 को हुआ था, जिसकी स्वीकारोक्ति अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 46 में की है। अतः स्पष्ट है कि 2 मार्च 2005 को हुये हत्या के प्रकरण का अभियोग पत्र अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 के पूर्व ही प्रस्तुत कर दिया गया होगा। अतः अभियोग पत्र प्रस्तुति के उपरान्त क्राइम ब्राच के इंचार्ज राजीव शर्मा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के पुत्र की हत्या के प्रकरण को कैसे बिगाड़ देंग, यह इस न्यायालय के समझ के परे है। अतः अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 पर विश्वास करने का छठवा कारण यह भी है कि अ0सा01 तारकेश्वर सिंह ने दबाव का जो कारण बताया है, वह विश्वास के योग्य नही है। इस संबंध में यह भी उल्लेखनीय है कि जब विशेष लोक अभियोजक द्वारा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह से उसके साक्ष्य की कण्डिका 48 में उसके पुत्र के हत्या के प्रकरण मे अभियोग पत्र प्रस्तुत करने की तिथि पूछी गयी तो उसने पहले तो नही बता सकने का कथन किया है और जब उसे दिनांक 24/5/2005 की तिथि बताकर प्रश्न किया गया तो इस साक्षी ने अपने साक्ष्य की कण्डिका 48 में व्यक्त किया है कि उसके पुत्र की हत्या का अभियोग पत्र दिनांक 24/5/2005 को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया होगा। अतः यदि दिनांक 24/05/2005 को अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के पुत्र की हत्या का अभियोगपत्र प्रस्तुत कर दिया गया है, तब इस साक्षी का इस न्यायालय में साक्ष्य दिनांक 27/4/2006 को हुआ है, तब इस साक्षी के पुत्र की हत्या के प्रकरण को इंस्पेक्टर राजीव शर्मा द्वारा बिगाड़े जाने का प्रश्न ही उत्पन्न नही होता है।

No comments:
Write comments

Category

149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी