Monday, 16 March 2015

छत्तीसगढ़ राज्य विरुध्द अभिजीत दास गुप्ता (धारा 302 भादस, 1860 )

 न्यायालय: सत्र न्यायाधीश, दुर्ग जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़)
 (पीठासीन न्यायाधीशः नीलम चंद सांखला)

सत्र प्रकरण क्रमांक 07/2014.
संस्थापन दिनांक 08-01-2014.
छत्तीसगढ़ राज्य,
व्दारा- पुलिस थाना भिर्लाइ नगर,
जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़)                                               ......... अभियोजन

वि रु ध्द

अभिजीत दास गुप्ता आत्मज
परिमल दास गुप्ता, आयु लगभग
45 वर्ष, साकिन-सेक्टर-06,
सड़क नंबर 79, मकान नंबर
1-बी, भिर्लाइ नगर, जिला दुर्ग
(छत्तीसगढ़)                                                                  ........ अभियुक्त

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श्री आनंदप्रकाश दीक्षित, तत्कालीन न्या.मजि.प्र.श्रे., दुर्ग व्दारा आ.प्र.क्र. 487/2013 राज्य वि. अभिजीत दास गुप्ता, अपराध अंतर्गत धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता को दिनांक 02/01/2014 को सत्र न्यायालय में उपार्पित किए जाने से उद्भूत सत्र प्रकरण.
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राज्य की ओर से श्री सुदर्शन महलवार, लोक अभियोजकअभियुक्त (अभिरक्षा में) की ओर से श्री शब्बीर अहमद, अधिवक्ता.
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नि र्ण य
(आज दिनांक 11 मार्च सन् 2015 को घोषित)
01. ऊपर नामित अभियुक्त के विरुध्द धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता, 1860 के अधीन दण्डनीय अपराध का आरोप है ।
02. प्रकरण में सिर्फ यह अविवादित तथ्य है कि, प्रार्थिया सुनीता दास गुप्ता ने पुलिस के समक्ष प्रदर्श पी-05 की लिखित सूचना दी थी ।
03. संक्षिप्त में अभियोजन वृतान्त निम्नानुसार है:-
(I) प्रकरण की प्रार्थिया श्रीमती सुनीता दास गुप्ता ने थाना भिलाईनगर में उपस्थित होकर प्रथम सूचना प्रतिवेदन दर्ज करने हेतु प्रदर्श पी-05 का लिखित आवेदन दिनांकित 29-09-2013 दिया कि वह एक शिक्षिका है, जो अपने पति एवं बच्‍चे सहित अपनी मां श्रीमती अंजली पाल के निवास सेक्टर-06, सड़क नंबर 79, मकान नंबर 1-बी भिलाईनगर में रहती है । दिनांक 29-09-2013 को स्कूल के बच्चों को लेकर महराज रविशंकर प्रसाद जी के राजनांदगांव आगमन पर उनके प्रोग्राम पर गई थी, घर में उसकी मां अकेली थी कि लगभग 04.15 बजे शाम को पड़ोस के वर्षा ने फोन के माध्यम से इसे सूचना दिया कि आपकी मम्मी पलंग के नीचे गिरी पड़ी है खून काफी निकल कर बहा है और वह बात नहीं कर रही है । सूचना पाकर वह घटना स्थल पर आई और देखी कि इसकी मम्मी खून से लथपथ थी, पांव में रस्सी फंसा हुआ था, नीचे परदे का पाइप दबा था, चेहरा दीवान के नीचे होने से स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था । श्रीमती अंजली पाल की मृत्यु हो चुकी थी । प्रार्थिया ने अपने आवेदन में यह भी लेख किया कि उसकी मम्मी की हत्या की गई है जिसके सिर के तरफ से खून फर्श पर बिखरा पड़ा था । उसकी मम्मी की हत्या इसके पति अभिजीत दास गुप्ता किया होगा, क्योंकि अभिजीत दास गुप्ता, इसे और इसकी मम्मी को मारता-पीटता रहता था एवं कहता था कि तुम लोगों को जिन्दा नहीं छोड़ूंगा जिसकी रिपोर्ट उसने थाना भिलाईनगर में की थी, जिस पर से इसके पति के विरुध्द कार्यवाही हुई थी और वह जेल भी गया था, इस कारण इससे और इसकी मां पर और अधिक गुस्सा रखता था ।
(II) इस रिपोर्ट के आधार पर एम.बी.पटेल, पुलिस निरीक्षक(अ.सा.नं.12) ने अभियुक्त के विरुध्द धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध का प्रथम सूचना प्रतिवेदन प्रदर्श पी-06 दर्ज किया और उसके उपरान्त प्रदर्श पी-07 का मर्ग सूचना दर्ज किया । जिला अस्पताल, दुर्ग की मरच्युरी में जाकर मृतका अंजली पाल के शव का पंचनामा करने बाबत् पंचों को प्रदर्श पी-08 की नोटिस दी और पंचों की उपस्थिति में प्रदर्श पी-09 का नक्शा पंचायतनामा तैयार किया । पंचों ने मृत्यु का सही कारण जानने के लिए शव का पोस्टमार्टम कराने की सलाह दी थी, इसलिए मृतका के शव को प्रदर्श पी-03 के शव परीक्षा आवेदन के साथ आरक्षक जितेन्द्र सिंह के माध्यम से शव परीक्षण हेतु जिला चिकित्सालय, दुर्ग भेजा और इस हेतु आरक्षक जितेन्द्र कुमार को प्रदर्श पी-17 का कर्तव्य प्रमाण-पत्र दिया गया । डॉक्टर विपिन जैन, चिकित्साधिकारी (असा.नं.01) ने शव का परीक्षण कर प्रदर्श पी-01 की रिपोर्ट दिया और बाद में प्रदर्श पी-02 की क्वेरी रिपोर्ट दिया । जितेन्द्र सिंग कुशवाहा, आरक्षक (अ.सा.नं.2) ने चिकित्सक व्दारा दिये गये सीलबंद पैकेट को जब्ती पत्र प्रदर्श पी-04 के व्दारा थाना प्रभारी, भिलाईनगर से जब्त कराया । 
(III) एम.बी.पटेल, पुलिस निरीक्षक (अ.सा.नं.12) ने साक्षी सुनीता की उपस्थिति में उसके बताये अनुसार घटना स्थल का नज़री नक्शा प्रदर्श  पी-10 तैयार किया और दिनांक 30-09-2013 को अभियुक्त को अपनी अभिरक्षा में लेकर साक्षियों की उपस्थिति में उससे पूछताछ कर उसका मेमोरेण्डम कथन प्रदर्श पी-12 दर्ज किया, जिसमें अभियुक्त ने घटना में प्रयुक्त डंडे को घटनास्थल के किचन में छुपाकर रखने तथा बरामद करा देने की बात बतायी थी । उक्त मेमोरेण्डम के आधार पर साक्षियों की उपस्थिति में घटनास्थल के किचन से अभियुक्त व्दारा निकलकर देने पर एक बेत का डंडा जब्ती पत्र प्रदर्श पी-13 के अनुसार जब्त किया । अभियुक्त अभिजीत दास गुप्ता घटना के समय जो मटमैला रंग का फुलपेंट पहना था उसे साक्षियों की उपस्थिति में जब्ती पत्र प्रदर्श पी-14 के व्दारा जब्त किया । घटनास्थल से खून लगे सीमेंट रेत वाली मिट्टी तथा सादी मिट्टी जब्ती पत्र प्रदर्श पी-15 के अनुसार जब्त किया। घटना के समय मृतका जिन कपड़ों को पहने हुई थी उन्हें जब्ती पत्र प्रदर्श पी-04 के अनुसार जब्त किया । अभियुक्त के विरुध्द आरोप प्रमाणित पाये जाने पर उसे गिरफ्तारी पंचनामा प्रदर्श पी-16 के व्दारा गिरफ्तार किया और उसके गिरफ्तारी की सूचना प्रदर्श  पी-16 ए उसके परिजन को दी। गिरफ्तारी के पश्चात् अभियुक्त को डॅाक्टरी मुलाहिजा हेतु जिला चिकित्सालय, दुर्ग भेजा गया, जहां डॅाक्टर आर.डी.शर्मा  ने उसका मुलाहिजा कर प्रदर्श पी-14-ए की रिपोर्ट दिया ।
(IV) भरतलाल साहू, उपनिरीक्षक (अ.सा.नं.9) ने प्रकरण में जब्त सादी मिट्टी, आरोपी के कपड़े, तथा मृतका के कपड़े इत्यादि सम्पत्ति को प्रदर्श पी-12 के आवेदन के साथ और अपराध में प्रयुक्त डंडा को प्रदर्श पी-13 ए के आवेदन के साथ मुख्य चिकित्सा अधिकारी, दुर्ग को परीक्षण हेतु प्रेषित किया और साक्षी गणेश तिवारी का बयान दर्ज किया । राजेश कुमार साहू, निरीक्षक पुलिस (अ.सा.नं.7) ने विवेचना के दौरान श्रीमती वर्षा गोस्वामी का कथन दर्ज किया था ।
(V) एम.बी.पटेल, पुलिस निरीक्षक (अ.सा.नं.12) ने विवेचना के दौरान साक्षी सुनीता दास, किरण कुमार साहू, राखल चन्द्रपाल, सुनील शर्मा के कथन उनके बताये अनुसार दर्ज किया । जब्तशुदा वस्तुओं को पुलिस अधीक्षक, दुर्ग के ज्ञापन प्रदर्श पी-18 के व्दारा रासायनिक परीक्षण हेतु राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला, रायपुर भिजवाया, जहां से प्रदर्श पी-19 की पावती प्राप्त हुई और बाद में प्रदर्श पी-20 की रिपोर्ट प्राप्त हुई। घटना स्थल का फोटोग्राफ प्रदर्श पी-21 और अभियुक्त के
विरुध्द पूर्व में किये गये प्रतिबंधात्मक कार्यवाही का इस्तगासा प्रदर्श पी-22 प्रकरण में संलग्न किया गया ।
(VI) पटवारी भीखमचन्द मेश्राम  (अ.सा.नं.8) से घटना स्थल का नक्शा प्रदर्श पी-11 तैयार करवाया गया और अनुसंधान पूर्ण  होने के उपरान्त अभियुक्त के विरुध्द भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के तहत अभियोग-पत्र न्या.मजि.प्र.श्रे., दुर्ग के न्यायालय में पेश किया गया, जहां से प्रकरण सत्र न्यायालय द्वारा विचारण योग्य होने से सत्र न्यायालय को उपार्पित किया गया ।
04. अभियुक्त ने धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत दंडनीय अपराध के आरोप को अस्वीकार कर विचारण का दावा किया । अभियोजन ने अपने पक्ष समर्थन में कुल 12 साक्षियों का परीक्षण कराया है। अभियोजन साक्षियों के परीक्षण के उपरान्त धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अभियुक्त का परीक्षण किया गया तथा उसे प्रतिरक्षा में प्रवेश कराया गया । प्रतिरक्षा में अभियुक्त व्दारा किसी बचाव साक्षी का परीक्षण नहीं कराया गया है ।
05. प्रकरण में अभिनिर्धारण हेतु निम्नलिखित विचारणीय प्रश्न उत्पन्न होते हैं:-
(1) क्या श्रीमती अंजली पाल की हत्यात्मक मृत्यु हुई है ?
(2) क्या अभियुक्त अभिजीत दास गुप्ता ने साशय अथवा जानते हुए मृतका श्रीमती अंजली पाल को डंडा से मारकर उसकी मृत्यु कारित कर हत्या किया ?
विचारणीय प्रश्न क्रमांक-01:
06. सुनीता दास गुप्ता (अ.सा.नं.1) के अनुसार उसने अपनी मां अंजली पाल की हत्या अभियुक्त व्दारा कर दिए जाने की शंका जाहिर करते हुए उसकी मृत्यु की लिखित सूचना प्रदर्श पी-05 भिलाईनगर थाने में दी थी, जिसके आधार पर थाना भिलाईनगर में प्रदर्श पी-06 का प्रथम सूचना प्रतिवेदन दर्ज किया गया था और प्रदर्श पी-07 की मृत्यु की सूचना दर्ज की गई थी । उक्त साक्ष्य का समर्थ न करते हुए एम.बी.पटेल, पुलिस निरीक्षक (अ.सा.नं.12) ने कहा है कि उसने दिनांक 29-09-2013 को प्रार्थि या सुनीता दास गुप्ता की लिखित सूचना प्रदर्श  पी-05 पर से आरोपी अभिजीत दास गुप्ता के विरुध्द धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध का प्रथम सूचना रिपोर्ट प्रदर्श पी-06 दर्ज किया था और उसके उपरान्त श्रीमती अंजली पाल पत्नी जे.पी.पाल की आरोपी व्दारा हत्या किये जाने की मर्ग सूचना प्रदर्श पी-07 प्रार्थिया सुनीता दास के बताये अनुसार दर्ज की थी । फिर जिला अस्पताल, दुर्ग की मरच्युरी में जाकर मृतका अंजली पाल के शव का पंचनामा करने बाबत् पंचों को प्रदर्श  पी-08 की नोटिस दी और पंचों की उपस्थिति में प्रदर्श पी-09 का नक्शा पंचायतनामा तैयार किया । पंचों ने मृत्यु का सही कारण जानने के लिए शव का पोस्टमार्टम कराने की सलाह दी थी, इसलिए मृतका के शव को प्रदर्श पी-03 के शव परीक्षा आवेदन के साथ आरक्षक जितेन्द्र सिंह के माध्यम से शव परीक्षण हेतु जिला चिकित्सालय, दुर्ग भेजा और इस हेतु आरक्षक जितेन्द्र कुमार को प्रदर्श पी-17 का कर्तव्य प्रमाण-पत्र दिया था।
07. डॉक्टर विपिन जैन, चिकित्साधिकारी (अ.सा.नं.01) के अनुसार शासकीय जिला चिकित्सालय दुर्ग में दिनांक 01.10.2013 को सुबह 11 बजकर 40 मिनट पर थाना भिलाई नगर के आरक्षक जितेन्द्र सिंह, क्रमांक 134 के द्वारा मृतका अंजलि पाल धर्मपत्नी जे.जी. पाल, उम्र 65 वर्ष, जाति कायस्थ, निवासी-क्वार्टर नम्‍बर 79, स्ट्रीट नंबर 1बी, सेक्टर-6, भिर्लाइ  का शव परीक्षा आवेदन उनके समक्ष प्रस्तुत किया गया। उसी दिनांक 01.10.2013 को ही शव की पहचान कराने के पश्चात् दोपहर 01.00 बजे वह एवं उनके वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अखिलेश यादव द्वारा संयुक्त रूप से पोस्टमार्टम प्रारम्भ किया गया ।
(I) शव का बाह्य परीक्षण करने पर उन्होंने पाया कि शव परीक्षण टेबल पर एक 65 वर्षीय प्रौढ महिला का शव मौजूद था । शव पर अकड़न मौजूद नहीं थी । नाखून पेल थे, चेहरे एवं खोपड़ी पर जमा हुआ खून मौजूद था । मृतका के कपड़े साड़ी, ब्लाउज एवं पेटीकोट पर खून मौजूद थे । कपड़ों को पृथक कर सुरक्षित किया गया । मृतका की दोनों ऑखें बंद थी  एवं मुॅह बंद था । पेट फूला हुआ था । दोनों पैर एवं जॉघ एवं बाह्य जननेन्द्री स्वस्थ थीं । अनेक इन्साइज्ड वूण्ड जिनकी संख्या छः थी, जिनमें से पॉच खोपड़ी पर मौजूद थे और एक माथे पर मौजूद था । परीक्षण में निम्नलिखित चोटें पाई गई:-
1. 02 ग 0.5 सें.मी. आकार का इन्साइज्ड वूण्ड माथे पर  मौजूद था।
2. 04 ग 14 सें.मी.  आकार का इन्साइज्ड वूण्ड बॉये पेराइटल  एरिया पर मौजूद था ।
3. 02 ग 0.5 सें.मी.  आकार का इन्साइज्ड वूण्ड खोपड़ी पर  बीचोंबीच मौजूद था ।
4. 02 ग 0.5 सें.मी. आकार का इन्साइज्ड वूण्ड दाहिने  पेराइटल बोन पर मौजूद था ।
5. 02 ग 0.5 सें.मी. आकार का इन्साइज्ड वूण्ड दाहिने  पेराइटल प्रामिनेन्स पर मौजूद था ।
6. 02 ग 0.5 सें.मी. आकार का इन्साइज्ड वूण्ड राइट  टेम्पोरल बोन पर मौजूद था ।
7. शव के पूरी दाहिनी भुजा एवं अग भुजा पर अनेक स्थानों पर नीले रंग का दाग (कन्ट्यूजन मार्क) मौजूद था ।
8. दाढ़ी पर 04 ग 02 सें.मी. आकार का कन्ट्यूजन मौजूद  था जिसका रंग लाल एवं भूरा था ।
9. बॉयी कलाई पर विकृति एवं एब्नार्मल मोबिलिटी मौजूद थी जो कि रेडियस एवं अल्ना बोन के टूटने की वजह से  हुई थी । छाती में दाहिनी ओर स्तन के नीचे  0.2 ग 06  सें.मी.  आकार का कन्ट्यू जन मार्क लाल-भूरे रंग का  मौजूद था ।
(II) शव का आंतरिक परीक्षण करने पर पाये कि, खोपड़ी की चमड़ी के अंदर के भाग में जमा हुआ खून मौजूद था । सिल्ली दाहिने टेम्पोरल एरिया पर फटी हुई थी एवं पेल थी। खोपड़ी के अंदर सबड्यूरल एवं इण्ट्राड्यू रल हीमेटोमा मौजूद था । ब्रेन पेल था । सारी पसलियॉ टूटी हुई थीं एवं टूटी हुई पसलियों के नुकीले हिस्से फेफड़े को भेद दिये थे । वक्षगुहा में जमा हुआ खून मौजूद था । फुफ्फुस, कंठ, श्वासनली एवं दोनों फेफड़े पेल थे । हृदय की झिल्ली पेल थी । हृदय के दाहिने ओर के चेम्बर में जमा खून मौजूद था तथा बॉया चेम्बर खाली था । वृहदवाहिका में जमा हुआ खून मौजूद था । पर्दा, ऑतों की झिल्ली पेल थीं । भोजन नली की म्यूकोसा भी पेल थी । भोजन की थैली में अधपचा भोजन एवं द्रव मौजूद था जिसका वजन करीब 400 से 600 मि.ली. था । छोटी ऑत में द्रव एवं गैस मौजूद थे । बड़ी ऑत के अंतिम सिरे में मल मौजूद था । यकृत, प्लीहा एवं गुर्दा सामान्य आकार के थे जिन्हें काटकर देखने पर पेल पाये गये थे । भीतरी एवं बाहरी जननेन्द्रियॉ सामान्य थी ।
(III) मृतका के राइट टेम्पोरल बोन, लेफ्ट रेडियस एवं अल्ना बोन फ्रेक्चर थी । रिपोर्ट में बतलाई गई सारी चोटें मृत्यु के पूर्व की थीं । मृतका के शरीर पर मौजूद खून से सने कपड़े, सफेद रंग की साड़ी, सफेद रंग का पेटीकोट एवं पीले कलर का ब्लाउज को सुरक्षित कर सीलपैक कर सबंधित आरक्षक को सौंप दिया था । 
(IV) उनके मतानुसार मृत्यु का कारण अत्यधिक रक्तस्राव से उत्पन्न शॉक था जो कि सिर एवं छाती के चोटों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था । शव परीक्षण एवं मृत्यु के बीच का अंतराल नहीं दिया जा सका क्योंकि शव को डीफ्रीजर में लम्बे समय तक फ्रीज किया गया था । उनकी शव परीक्षण रिपोर्ट प्रदर्श पी-1 है जिसके अ से अ भाग पर उनके तथा ब से ब भाग पर उनके सहयोगी चिकित्सक डॉ. अखिलेश यादव के हस्ताक्षर हैं जिसे वे पहचानते हैं। इन्होंने शव परीक्षण प्रतिवेदन में मृत्यु की प्रकृति के बारे में उल्लेख नहीं किया था। लोक अभियोजक द्वारा पूछे जाने पर साक्षी का कहना है कि मृत्यु की प्रकृति हत्यात्मक थी।
08. उपरोक्त साक्षियों के उपरोक्त बिन्दु पर दिये गये कथन में ऐसी कोई बात नहीं आई है, जिसके कारण उनके व्दारा उक्त बिन्दु पर दिये गये कथन पर अविश्वास किया जा सके । डॉक्टर विपिन जैन, चिकित्साधिकारी (अ.सा.नं.01) व्दारा मृतका की मृत्यु का कारण अत्यधिक रक्तस्राव से उत्पन्न शॉक होना बताया गया है, जो कि सिर एवं छाती के चोटों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था और मृत्यु की प्रकृति हत्यात्मक होना बताया है । जिस व्यक्ति का पोस्टमार्टम किया गया, वह मृतका अंजली पाल का शव था, इस बिन्दु पर कोई विवाद नहीं है। इससे अभियोजन की इस कहानी को बल मिलता है कि घटना दिनांक 29-09-2013 को मृतका की मृत्यु हुई और मृतका की मृत्यु का कारण अत्यधिक रक्तस्राव से उत्पन्न शॉक था, जो कि सिर एवं छाती के चोटों के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ था, या दूसरे शब्दों में ऐसा कहा जा सकता है कि घटना दिनांक को अंजली पाल का किसी व्यक्ति व्दारा वध करने के कारण मृत्यु हुई ।
विचारणीय प्रश्न क्रमांक-02:
09. अभियोजन की ओर से तर्क के दौरान कहा गया है कि उन्होंने उनका मामला साबित किया है । दूसरी ओर अभियुक्त के विव्दान अधिवक्ता ने लिखित तर्क पेश कर कहा है कि इस प्रकरण में प्रत्यक्षदर्शी साक्षी कोई नहीं है और जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य अभियोजन ने पेश किये हैं, वह ग्राह्य किए जाने योग्य नहीं हैं, पूरा मामला शंका पर आधारित है, इसलिए अभियुक्त को दोषमुक्त किया जाना चाहिए ।
10. अभिलेख में जितने भी साक्षी उपलब्ध हैं, उसमें महत्वपूर्ण साक्षी अभियुक्त की पत्नी सुनीता दास गुप्ता (अ.सा.नं.3) ने उसके कथन में कही है कि घटना के समय के कुछ दिन पूर्व 16 जुलाई को उसने आरोपी के विरुध्द शिकायत की थी जिससे आरोपी उसके साथ मारपीट करता था, उसे जान से मारने की धमकी देता था । फिर उसने इस बात की थाने में रिपोर्ट लिखायी थी और उसके बाद वे लोग अलग रहने लगे थे । इस साक्षी ने उसके कथन में आगे कहा है कि अभियुक्त, उसकी मां (मृतका) के साथ भी मारपीट करता था । घटना दिनांक 29-09-2013 को वह, श्री श्री रविशंकर जी के कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए राजनांदगांव गई थी, तब करीब 04.30 बजे वर्षा  गोस्वामी (अ.सा.नं.4), जो उसकी पड़ोसन है, का फोन आया था कि उसकी मां अंजलि पाल पलंग से गिर गयी है और खून से लथपथ पड़ी है । वह आकर देखी तो उसकी मां गिरी पड़ी थी, सिर में चोट थी और किसी ने उसकी हत्या कर दी थी। यह साक्षी आगे कहती है कि अभियुक्त, उससे पैसे की मांग करता था, तंग करता था और अभियुक्त ने एक-दो बार उसकी मां के साथ भी मारपीट किया था । अभियुक्त ने उसकी मां की हत्या कर दी ऐसी उसे शंका थी, इसलिए उसने थाने में लिखित रिपोर्ट प्रदर्श पी-05 लिखायी थी, जिसके आधार पर थाने में प्रदर्श पी-06 की रिपोर्ट लेखबध्द की गई थी और सुनीता दास गुप्ता की मर्ग सूचना के आधार पर प्रदर्श पी-07 का मर्ग सूचना पंजीबध्द किया गया था ।
11. विवेचक एम.बी.पटेल (अ.सा.नं.12) ने उसके कथन में कहा है कि उसने दिनांक 29-09-2013 को प्रार्थिया सुनीता दास गुप्ता की लिखित सूचना प्रदर्श  पी-05 पर से आरोपी अभिजीत दास गुप्ता के विरुध्द धारा 302 भारतीय दण्ड संहिता का अपराध पंजीबध्द कर प्रथम सूचना प्रतिवेदन प्रदर्श पी-06 और मर्ग इंटीमेशन प्रदर्श पी-07 लेखबध्द किया था ।
12. प्रदर्श पी-05, 06 और 07 का अवलोकन किया गया और अभिलेख में जितने भी साक्ष्य हैं, उनका सूक्ष्मता से अध्ययन किया गया, जिससे यह पाया जाता है कि इस प्रकरण में किसी भी साक्षी ने यह नहीं कहा है कि उन्होंने अभियुक्त को घटना कारित करते देखा हो तथा सुनीता दास गुप्ता ने शंका के आधार पर रिपोर्ट लिखाना व्यक्त की है। ऐसी दशा में अब इस प्रकरण में जो परिस्थितिजन्य साक्ष्य है, उस पर विस्तृत रुप से विवेचन करेंगे ।
13. पारिस्थितिक साक्ष्य के संबंध में न्याय दृष्टान्त (सुजय सेन विरुध्द वेस्ट बंगाल राज्य), 2007 (2) एम.पी.वीकली नोट्स (89) सु.को. तथा (मुल्कराज एवं अन्य विरुध्द हरियाणा राज्य), ए.आईआर. 1996 सु.को. 2868 तथा (मध्यप्रदेश राज्य विरुध्द संजय राय), 2005 (1) जे.एल.जे. 411 (सु.को.) तथा (श्रीमती रत्तानी विरुध्द हिमाचल प्रदेश राज्य), 1993 (2) एम. पी. वीकली नोट्स (109) सु.को. के न्यायिक निर्णय अवलोकनीय हैं । पारिस्थितिक साक्ष्य के संबंध में उपरोक्त उल्लिखित न्याय दृष्टान्त के न्यायिक निर्ण यों में यह अभिनिश्चय लिया गया है कि, पारिस्थितिक साक्ष्य पर आधारित प्रकरण में अभियोजन को जिन परिस्थितियों की ऋंखला, जिनके आधार पर आरोपी को आरोपित अपराध की संलिप्तता में अनिवार्यतः सम्बध्द करती हों, को सिध्द किया जाना आवश्यक है और यह निश्चयात्मक होना चाहिए।  ऋंखलापूर्ण और अभियुक्त की दोषिता की प्रकल्पना से भिन्न किसी प्रकल्पना के स्पष्टीकरण के अयोग्य होना चाहिए ।
14. परिस्थितियों की एक कड़ी में यदि अभियुक्त की पत्नी सुनीता दास गुप्ता (अ.सा.नं.3) के कथन पर गौर किया जाए तो अभियुक्त और उसके बीच विवाद था, अभियुक्त उसकी मां के साथ मारपीट करता था, इसलिए अभियुक्त का उसकी मां को मारने का एक हेतुक था ।
15. अब परिस्थितियों की एक अन्य कड़ी, कि क्या अभियुक्त को मृतका के घर उसकी मृत्यु के पूर्व आखिरी बार जाते हुए देखा गया ? 
इस बिन्दु पर अभियोजन ने जो साक्ष्य पेश किया है, उस पर विवेचन करेगे ।
16. वर्षा गोस्वामी (अ.सा.नं.4) ने उसके कथन में कहा है कि वह घटना दिनांक को मृतका की पुत्री के कहने पर चूंकि मृतका घर में अकेली थी, दोपहर को 02 बजकर 10 मिनट पर मृतका को खाना देकर आई थी । उस वक्त मृतका स्वस्थ थी । बाद में साढे चार बजे जब वह चाय लेकर गई उस वक्त अंजलि पाल पलंग पर नहीं थी जमीन पर लेटी थी और खून से लथपथ थी, जिसे देखकर वह घबरा गई थी, फिर वह बाहर आ गई और पड़ोस के लोगों को घटना के बारे  में बतायी थी और सुनीता को फोन की थी । 
17. गणेश प्रसाद तिवारी (अ.सा.नं.6), जिसे अभियोजन ने पक्षविद्रोही साक्षी घोषित कर विस्तारपूर्वक प्रश्न किये हैं, ने उसके कथन की कंडिका-04 और 05 में कहा है कि वह घटना दिनांक को उसके घर के पास दुकान में बैठा था, तब दोपहर लगभग 03 बजे अभियुक्त अभिजीत दास, अंजलि पाल जिस मकान में मरी थी उस मकान में गया था । यह साक्षी फिर मुख्य परीक्षण की कंडिका-04 में यह कहा है कि उसने पुलिस को कोई बयान नहीं दिया था और पुलिस वाले उसका बयान लिख लिये थे। फिर यही साक्षी कंडिका-06 में यह कहता है कि अभिजीत दास के अलावा मृतका के घर में कौन-का ैन गये थे, उसे नहीं मालूम और वह नहीं बता सकता कि अभियुक्त के अलावा भी अन्य कोई व्यक्ति गया था या नहीं । फिर यह साक्षी प्रतिपरीक्षण में अपने पूर्व में दिये गये कथन को बदलते हुए यह कहा है कि ‘‘ यह बात सही है कि उसने अभियुक्त को अंजलि पाल के घर जाते हुए नहीं देखा ‘‘ । इस साक्षी के पूरे  कथन को पढ़ने से ऐसा पता चलता है कि यह साक्षी बदल-बदल कर कथन किया है, पुलिस को कथन नहीं देना व्यक्त किया है और इस साक्षी के उक्त कथन का किसी भी साक्षी ने उक्त बिन्दु पर समर्थन नहीं किया है । इसलिए इस साक्षी का यह कथन कि वह अभियुक्त को घटना दिनांक को 03 बजे मृतका के घर जाते हुए देखा था, कतई विश्वसनीय नहीं माना जा सकता ।
18. अब परिस्थिति की एक अन्य कड़ी में अभियुक्त के मेमोरेण्डम बयान के आधार पर चाकू की जब्ती के संबंध में जो साक्ष्य उपलब्ध है, उस पर विवेचन करेंगे ।
19. विवेचक एम.बी.पटेल (अ.सा.नं.12) ने उसके कथन में कहा है कि उसने दिनांक 30-09-2013 को आरोपी अभिजीत दास गुप्ता को अपनी अभिरक्षा में लेकर साक्षियों की उपस्थिति में उससे पूछताछ कर उसका म ेमोर ेण्डम कथन प्रदर्श पी-12 लेखबध्द किया था तब उसने घटना में प्रयुक्त डंडे को घटनास्थल के किचन में छुपाकर रखने तथा बरामद करा देने की बात बतायी थी । फिर अभियुक्त की निशानदेही पर साक्षियों के समक्ष एक बेत का डंडा जब्तीपत्र प्रदर्श पी-13 के अनुसार जब्त किया था । इस साक्षी के उक्त कथन का मुख्य रुप से समर्थन मेमोर ेण्डम और जब्ती के साक्षी किरण कुमार साहू (अ.सा.नं.5) ने किया है और पैरा 06 में कहा है कि अभियुक्त से पुलिस वालों ने पूछताछ की थी तब अभियुक्त की निशानदेही पर डंडा बरामद किया गया था ।
20. विवेचक के अनुसार उसने उक्त डंडे को डॅाक्टर के पास क्वेरी के लिए भेजा था, तब डॅाक्टर ने डंडे में जो रक्त जैसे धब्बे थे उसकी जांच हेतु रासायनिक परीक्षण की सलाह दी थी । इस आधार पर डंडे को रासायनिक परीक्षण हेतु भेजा गया था । रासायनिक परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श  पी-20 में डंडा जिस पर आर्टिकल ‘‘ डी ‘‘ मार्क किया गया है, उसमें मानव रक्त नहीं पाये गये तथा अभियोजन की जैसी कहानी है उसके अनुसार डॅाक्टर विपिन जैन (अ.सा.नं.1) के कथन के अनुसार मृतका को जो चोर्टें आइ  थीं उसमें से चोट क्रमांक 01 से 06 इन्साइज्ड वूण्ड थे, जो सिर पर पेराइटल बोन पर, खोपड़ी पर तथा शरीर के महत्वपूर्ण भाग पर पाये गये थे और इसके अलावा शव के पूरी दाहिनी भुजा एवं अग्र भुजा पर अनेकों स्थान पर कन्ट्यूजन मार्क था और दाढ ़ी पर भी कन्ट्यूजन मार्क  था । इस आधार पर डॅाक्टर ने मृतका को आई चोटें किसी कड़े, भोथरे  एवं धारदार वस्तु से आना बताया था और इस साक्षी ने प्रतिपरीक्षण की कंडिका-15 में यह स्पष्ट रुप से कहा है कि सिर पर आई चोट क्रमांक 01 से 06 किसी धारदार वस्तु से पहुंचाई गई थी और यह साक्षी मुख्य परीक्षण की कंडिका-14 में यह कहता है कि मृतक का शव परीक्षण उसने किया था, मृतका को परीक्षण हेतु भेजे गये डंडे से सिर में आई चोट नहीं आ सकती थी । ऐसी दशा में यदि तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए कि अभियुक्त की निशानदेही पर डंडा की जब्ती हुई थी तो उस डंडे में ऐसा मानव रक्त या ब्लड गु्रप नहीं पाया गया है, जो मृतक के ब्लड गु्रप से मेल खाता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर पर्र आइ  चोट के कारण ही मृतका की मृत्यु हुई और डॉक्टर ने सिर पर आई चोट को इन्साइज्ड वूण्ड अर्थात् धारदार हथियार से आना बताया है, तथा डंडा एक धारदार हथियार नहीं है और अभियोजन ने धारदार हथियार अभियुक्त की निशानदेही पर न तो जब्त किया है और न ही यह बताया है कि किस धारदार हथियार से मृतका को चोट पहुंचाई गई थी और उक्त धारदार हथियार को अभियुक्त ने किसी अन्य तरीके से नष्ट कर दिया। ऐसी दशा में अभियोजन की जो एक महत्वपूर्ण  कड़ी है कि डंडे से आई चोट से मृतका की मृत्यु हुई, इस कड़ी को साबित करने में अभियोजन पूरी तरह से असफल रहा है । इस संबंध में न्याय दृष्टान्त अमर लाल बनाम मध्यप्रदेश राज्य, 2007 (1) ए एन जे (एम.पी.) 274, दुकालू एवं अन्य बनाम मध्यप्रदेश राज्य (अब छत्तीसगढ़), 2012 (2) सी.जी.एल.जे. 615 (डी.बी.) और चमार सिंह एवं अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य, 2012 (1) सी.जी.एल.जे. 126 (डी.बी.) अवलोकनीय हैं ।
21. परिस्थिति की एक अन्य कड़ी में अभियोजन ने अभियुक्त के कपड़े पर जो रक्त पाये गये हैं, उसके संबंध में जो साक्ष्य पेश किया है, उस पर विवेचन कर ेंगे । विवेचक एम.बी.पटेल (अ.सा.नं.12) ने उसके कथन के पैरा 09 में कहा है कि उसने अभिजीत दास गुप्ता से घटना के समय पहने एक मटमैला रंग का फुलपेंट साक्षियों की उपस्थिति में जब्ती पत्र प्रदर्श पी-14 के अनुसार जब्त किया था और उक्त कपड़े को डॅाक्टर की सलाह पर रासायनिक परीक्षण हेतु भेजा गया था । रासायनिक परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श  पी-20 में आरोपी के फुलपेंट आर्टिकल ‘‘ सी ‘‘ पर रक्त पाया गया है, किन्तु रक्त का गु्रप क्या था, यह अभियोजन ने साबित नहीं किया है और न ही यह साबित किया है कि कपड़े में जो रक्त गु्रप था वह मृतका के रक्त गु्रप से मेल खाता था । इसलिए मात्र कपड़े पर रक्त पाये जाने के आधार पर ही अभियुक्त को दोषी करार नहीं दिया जा सकता ।
22. पूर्व में की गई विस्तृत विवेचन से अभियोजन ने यह तो साबित किया है कि श्रीमती अंजली पाल की हत्यात्मक मृत्यु हुई थी, किन्तु इस प्रकरण में अभियुक्त के विरुध्द ऐसा कोई भी प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं है, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि अभियुक्त ने ही साशय अथवा जानते हुए मृतका श्रीमती अंजली पाल को डंडा से मारकर उसकी मृत्यु कारित कर हत्या किया ।
23. फलस्वरुप अभियोजन, अभियुक्त के विरुध्द भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के अपराध के आरोप को प्रमाणित करने में पूर्ण तः असफल रहा है, अतः अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के अपराध के आरोप से संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त किया जाता है ।
24. अभियुक्त अभिरक्षा में है । यदि अन्य किसी प्रकरण में उसकी आवश्यकता न हो तो उसे इस प्रकरण में तत्काल रिहा किए जाने की टीप उसके जेल वारंट में अंकित की जावे ।
25. अभियुक्त व्दारा अभिरक्षा में बितायी गई अवधि का गणना-पत्रक तैयार कर प्रकरण में संलग्न किया जावे ।
26. प्रकरण में जब्तशुदा सम्पत्तियां- खून आलूदा मिट्टी (सीमेंट रेत), सादी मिट्टी (सीमेंट रेत), मटमैला रंग का एक फुलपेंट, एक बेत का डंडा, एक सफेद रंग की साड़ी, पीला रंग का ब्लाऊज, सफेद रंग का पेटीकोट मूल्यहीन होने से, अपील न होने की दशा में अपील अवधि बाद नष्ट कर दी जॉंए । अपील होने पर माननीय अपीलीय न्यायालय के आदेशानुसार उनका निराकरण किया जा सकेगा । 
27. इस प्रकरण में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357-क (3) एवं छत्तीसगढ़ शासन व्दारा जो ‘‘ पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना-2011 ‘‘ लागू किया गया है, वह छत्तीसगढ़ राजपत्र असाधारण दिनांक 03 अगस्त 2011 में प्रकाशित हुआ है, के प्रावधान के तहत पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति दिलाया जाना है, किन्तु इस प्रकरण के तथ्य एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए किसी व्यक्ति को किसी प्रकार की कोई क्षतिपूर्ति नहीं दिलाई जा रही है ।
28. निर्णय की एक-एक सत्य प्रतिलिपि जिला दण्डाधिकारी, दुर्ग और लोक अभियोजक, दुर्ग को सूचनार्थ प्रदान की जावे ।
दुर्ग, दिनांक 11-03-2015.
सही/-
(नीलम चंद सांखला)
सत्र न्यायाधीश, दुर्ग
 (छत्तीसगढ)

न्यायालयः सत्र न्यायाधीश, दुर्ग (छत्तीसगढ़)

 (पीठासीन न्यायाधीश: नीलम चंद सांखला )
 सत्र प्रकरण क्रमांक 07/2014.
छत्तीसगढ़ राज्य बनाम अभिजीत दास गुप्ता.
 अभिरक्षा अवधि का गणना-पत्रक

01. अभियुक्त का नाम: अभिजीत दास गुप्ता
02. पिता का नाम: परिमल दास गुप्ता,
03. जाति: ......
04. उम्र: लगभग 45 वर्ष
05. पता: साकिन-सेक्टर-06, सड़क  नंबर 79, मकान नम्‍बर 1-बी,  भिलाईनगर, जिला दुर्ग  (छत्तीसगढ )
06. अभियुक्त की गिरफ्तारी दिनांक 30-09-2013 की शाम का दिनांक 17.45 बजे
07. पुलिस अभिरक्षा की अवधि: दिनांक 30-09-2013 की शाम 17.45 बजे पुलिस व्दारा गिरफ्तार करने से लेकर दिनांक 01-10-2013 को न्यायालय में न्यायिक रिमाण्ड हेतु पेश करने तक, 01 दिन
08. न्यायिक अभिरक्षा की अवधि: दिनांक 01-10-2013 से दिनांक 11-03-2015 तक, 526 दिन ( 01 वर्ष, 05
माह, 10 दिन)
09. कुल अभिरक्षा अवधि: 01$ 526 दिन त्र 527 दिन ( 01 वर्ष, 05 माह, 11 दिन)
स्थानः दुर्ग (छ.ग.) दिनांक 11-03-2015.
सही/-
(नीलम चंद सांखला)
 सत्र न्यायाधीश, दुर्ग
 (छत्तीसगढ)
न्‍याय निर्णय ई कोर्ट्स से प्राप्‍त 

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