Monday, 14 March 2016

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला

न्यायालय- विशेष न्यायाधीश, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
(पीठासीन न्यायाधीश राजेश श्रीवास्तव)
विशेष प्रकरण क्रमांक 25/2005 एवं 47/2005
सी.आई.एस.नं. 0000050/05 एवं 0000049/2005
संस्थित दिनांक - 2/6/2005 एवं 08/8/2005

छत्तीसगढ़ शासन,
द्वारा आरक्षी केन्द्र सुपेला
जिला दुर्ग ।                                                                                      .............अभियोजन

//विरूद्ध//

1- अनिल शुक्ला उर्फ बबलू आ0 रमेशचन्द्र शुक्ला,
उम्र 28 वर्ष, साकिन - रावणभाठा जामुल, शुक्ला
लकड़ी टॉल के पास भिलाई जिला दुर्ग छ0ग0
2- संतोष साहू आत्मज गणेश साहू,
उम्र 26 साल, साकिन - सेक्टर 6 सड़क 31,
र्क्वाटर 4 एफ भिलाई नगर जिला दुर्ग छ0ग0
3- शैलेष सिंह आत्मज सी.एस.सिंह,
उम्र 33 वर्ष, साकिन - 46/7, नेहरू नगर,
सुपेला थाना सुपेला भिलाई जिला दुर्ग छ0ग0
4- एस.सैथिल्य आ0 एल. सैथिल्य,
उम्र- 28 वर्ष साकिन - सेक्टर 10,
शॉप नम्बर 72, ए मार्केट देहली टेलर्स,
भिलाई थाना भिलाई नगर
5- पंकज सिंह आत्मज रविशंकर सिंह,
उम्र 21 वर्ष, साकिन - सेक्टर 5 मार्केट शॉप
नम्बर 57 भिलाई नगर जिला दुर्ग छ0ग0
6- नरेन्द्र दुबे आत्मज आ0 धनुषधारी दुबे,
उम्र 36 वर्ष, साकिन - 160 सी सुभाष चौक,
केम्प 1 थाना छावनी जिला दुर्ग छ0ग0
7- मुजीबुद्दीन खान उर्फ मुजीब आत्मज अमीरूद्दीन मुसलमान,
उम्र 43 वर्ष, साकिन रसौल (कमराहा मोहल्ला),
हाल मुकाम - सेक्टर 6 सड़क 51 र्क्वाटर नं0 3 ए,
थाना भिलाई नगर जिला दुर्ग छ0ग0
8- राजू खंजर आत्मज जयराम धारीकर,
उम्र 32 वर्ष, साकिन - केम्प 1 संग्राम चौक,
थाना छावनी जिला दुर्ग छ0ग0
9- चिमन उर्फ चुम्मन आ0 लालसिंह देशमुख,
उम्र 25 वर्ष, साकिन - 249/बी,
रिसाली सेक्टर थाना नेवई स्थायी पता -
ग्राम कचांदुर थाना गुण्डरदेही जिला दुर्ग
10- बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी आ0 एम.आर.चौधरी,
उम्र 34 वर्ष, साकिन -हाउसिंग बोर्ड जामुल,
थाना जामुल जिला दुर्ग छ0ग0
11- पिताम्बर साहू आत्मज वृन्दावन साहू,
उम्र 21 वर्ष साकिन - विनोद किराना स्टोर्स,
प्रियदर्शिनी मार्केट खुर्सीपार थाना छावनी
जिला दुर्ग छ0ग0
12- छोटू उर्फ कृष्णा आत्मज जंग बहादुर राजपूत,
उम्र 27 वर्ष साकिन - केम्प 1 संग्राम चौक,
थाना छावनी जिला दुर्ग छ0ग0
13- बलविंदर सिंह उर्फ बॉबी भाटिया आ0 रघुवीर सिंह,
उम्र 31 वर्ष साकिन - सेक्टर 6, सड़क एवेन्यु,
क्वार्टर नम्बर 31/ए भिलाई नगर
14- रंजीत सिंह आत्मज निर्मल सिंह,
उम्र 32 वर्ष, साकिन पांच रास्ता
सुपेला पूजा टेंडर्स के पास थाना
सुपेला जिला दुर्ग छ0ग0
15- प्रताप सिंह शर्मा आत्मज फूलसिंह शर्मा,
उम्र 38 वर्ष, साकिन आजाद मार्केट, डॉ0 तालेकर
लाईन रिसाली थाना नेवई जिला दुर्ग छ0ग0
16- सुशील राठी आत्मज गोविन्द राम चांडक,
उम्र 26 वर्ष, साकिन - महेश कालोनी,
क्वार्टर 6-9 थाना पुलगांव जिला दुर्ग छ0ग0
17- विनोद सिंह उर्फ विनोद बिहारी आ0 राजवल्लभ सिंह,
उम्र 35 साल साकिन दीपक नगर,
थाना मोहन नगर जिला दुर्ग छ0ग0
18- सत्येन माधवन आत्मज डी0एच0माधवन,
उम्र 36 वर्ष, साकिन - सेक्टर 6 ब्लाक 2,
र्क्वाटर 2/जी. भिलाई नगर जिला दुर्ग छ0ग0
19- प्रभाष सिंह आत्मज सदानंद सिंह भदौरिया,
उम्र 32 वर्ष, साकिन - लल्लू होटल के बाजू
कांट्रेक्टर कालोनी सुपेला जिला दुर्ग छ0ग0
20- तपन सरकार उर्फ अमिताभ आत्मज रविन्द्र नाथ सरकार,
उम्र 33 वर्ष, साकिन - प्रेमनगर सिकोलाभाठा
थाना मोहन नगर जिला दुर्ग छ0ग0
21- जयदीप सिंह आत्मज आर.पी.सिंह,
उम्र 33 वर्ष, साकिन - प्रगति नगर क्वार्टर नं0 6,
रिसाली थाना नेवई जिला दुर्ग छ0ग0
22- गुल्लू उर्फ अरविंद कुमार आ0 रामाश्रयलाल श्रीवास्तव,
उम्र 33 वर्ष, साकिन - सेक्टर 9 सड़क 8, र्क्वाटर
19 1 ए भिलाई नगर
23- मंगल सिंह आत्मज धरम सिंह,
उम्र 36 वर्ष साकिन - केम्प 1 स्टील नगर, सुलभ
काम्पलेक्स के पास थाना छावनी जिला दुर्ग छ0ग0
24- बच्चा उर्फ अब्दुल जायद उर्फ अशरफ आत्मज बाकर अली,
उम्र 27 साल साकिन - नूरी मस्जिद के पास
फरीद नगर सुपेला भिलाई जिला दुर्ग छ0ग0
25- शैलेन्द्र ठाकुर आत्मज सूर्यनारायण सिंह,
उम्र 36 वर्ष, साकिन - क्रास स्टंीट 3,
ब्लाक 6/बी सेक्टर 6 भिलाई नगर जिला दुर्ग
26- महेश उर्फ बिज्जू आत्मज अम्बिका प्रसाद यदू,
उम्र 28 वर्ष, साकिन - प्रेमनगर सिकोलाभाठा,
थाना मोहन नगर जिला दुर्ग छ0ग0
27- रविन्द्र सिंह आत्मज अमर सिंह ठाकुर,
उम्र 32 वर्ष साकिन - प्रगति नगर, आशिया
मेडिकल के पीछे थाना नेवई जिला दुर्ग छ0ग0
28- तोरई पांडियन आत्मज डी.धन्नासिंह राजपूत,
उम्र 30 वर्ष, साकिन - शक्तिबिहार रिसाली,
मकान नं0 16-17 थाना नेवई
हाल मुकाम - सेक्टर 6 बी मार्केट बर्तन
दुकान भिलाई नगर जिला दुर्ग छ0ग0
29- जे0जे0राव आत्मज गंगैय्या तेलगू,
उम्र 33 वर्ष, साकिन शांति पारा,
केम्प नं0 2 थाना छावनी जिला दुर्ग
30- जसपाल सिंह उर्फ गोल्डी आ0 बीरसिंह,
उम्र 28 वर्ष, साकिन - सेक्टर 10,
सड़क 13,क्वा0नं0 4/बी थाना भिलाईनगर
31- फरहान उर्फ इरफान उर्फ पप्पूजी आ0 मजलूद्दीन,
उम्र 28 वर्ष, साकिन - मकान नं0 50 अशरफी रोड,
फरीद नगर थाना सुपेला भिलाई जिला दुर्ग छ0ग0
32- रज्जन मियां आ0 हकीम खान,
उम्र 24 वर्ष, साकिन - साकेत नगर,
कातुलबोर्ड थाना मोहन नगर जिला दुर्ग
33- संजय सिंह आ0 जोगेन्दर सिंह,
उम्र 30 वर्ष, साकिन - न्यू पुलिस लाईन
दुर्ग थाना दुर्ग जिला दुर्ग छ0ग0                   ............अभियुक्तगण
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न्यायालय- श्री अब्दुल जाहिद कुरैशी, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग द्वारा दं.प्र.क्र. 397/05 शासन वि0 अनिल शुक्ला वगैरह धारा 302, 307, 120 बी, 147, 148, 149, 212, 216 भा.दं.सं. एवं 25-27 आयुध अधिनियम तथा धारा 3 (2)(5) एस0सी0एस0टी0 एक्ट में पारित उपार्पण आदेश दिनांक 19/5/2005 से उद्भुत सत्र प्रकरण।
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राज्य की ओर से श्री सुरेश प्रसाद शर्मा, विशेष लोक अभियोजक। आरोपीगण की ओर से श्री टी0सी0पण्ड्या, श्री अशोक यादव, श्री राजकुमार तिवारी, श्री गणेश शुक्ला, श्री शम्सुद्दीन मिर्जा, श्री ललित तिवारी, श्री मनोज मिश्रा, श्री दुष्यंत देवांगन, श्री अमर जैन एवं श्री हरेन्द्र बंजारे अधिवक्तागण उपस्थित।
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//नि र्ण य //
(आज दिनांक 13/03/2015 को घोषित)
It is necessary to remember that a judge does not preside over a criminal trial mearly to see that no innocent man is punished. A judge also prisides to see that a guilty man does not escape. One is as important as the other. Both are the public duties which the judge has to perform.

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 215 से 219)

215- आरोपीगण को दण्ड के प्रश्न पर सुना गया। आरोपीगण ने व्यक्त किया कि उन्हें न्युनतम से न्युनतम दण्ड दिया जावे। अभियोजन की ओर से उपस्थित होने वाले विशेष लोक अभियोजक ने आरोपीगण को प्रावधानित अधिकतम दण्ड दिये जाने का निवेदन किया है। भा0दं0सं0 की धारा 302 में अधिकतम दण्ड मृत्युदण्ड है, जबकि न्युनतम दण्ड आजीवन कारावास है। आजीवन कारावास का तात्पर्य सम्पूर्ण जीवन से होता है, अर्थात् आरोपी जब तक जीवित होते हैं, तब तक वे आजीवन कारावास का दण्ड भुगतते हैं। भा0दं0सं0 की धारा 302 के तहत अधिकतम दण्ड दिये जाने के लिये यह स्थापित विधि है कि ‘‘आरोपीगण का अपराध विरलतम से विरलतम श्रेणी का होना चाहिये‘‘ लेकिन इस प्रकरण में आरोपीगण के अपराध को विरलतम से विरलतम श्रेणी का नही माना जा सकता है। मृत्युदण्ड के लिये दं0प्र0सं0 की धारा 354 (3) के तहत विशेष कारण अभिलिखित किये जाने चाहिये। जबकि इस प्रकरण में मृत्युदण्ड अधिरोपित किये जाने संबंधी कोई विशेष कारण दर्शित नही होते हैं। अतः आरोपी तपन सरकार, सत्येन माधवन, बॉबी उर्फ विद्युत चौधरी, मंगल सिंह, अनिल शुक्ला, राजू खंजर, पिताम्बर साहू, छोटू उर्फ कृष्णा, रंजीत सिंह, बिज्जु उर्फ महेश यादव, शैलेन्द्र ठाकुर, अब्दुल जायद उर्फ बच्चा एवं आरोपी प्रभाष सिंह को भा0दं0सं0 की धारा 302 सहपठित धारा 149 के आरोप में क्रमशः आजीवन कारावास एवं तीस-तीस हजार रूपये के अर्थदण्ड, अर्थदण्ड नही पटाने पर दो-दो वर्ष का सश्रम कारावास, धारा 148 के तहत तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास एवं दस-दस हजार रूपये के अर्थदण्ड, अर्थदण्ड न दिये जाने की अवस्था में आठ-आठ माह के सश्रम कारावास एवं आरोपी तपन सरकार, सत्येन माधवन, प्रभाष सिंह, शैलेन्द्र सिंह ठाकुर एवं मंगल सिंह को आयुध अधिनियम की धारा 25 (1B) (a) के तहत तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास एवं दस-दस हजार रूपये के अर्थदण्ड तथा धारा 27 (1) के तहत पांच-पांच वर्ष के सश्रम कारावास एवं दस-दस हजार रूपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया जाता है। दस-दस हजार रूपये का अर्थदण्ड न दिये जाने की अवस्था में आरोपियों को प्रत्येक धारा के लिये आठ-आठ माह का सश्रम कारावास अतिरिक्त रूप से भुगताया जावे। सभी सजाऐं साथ-साथ चलेंगी। 
216- आरोपीगण न्यायिक अभिरक्षा में भी रहे हैं, अतः उनकी न्यायिक अभिरक्षा की अवधि दं0प्र0सं0 की धारा 428 के तहत समायोजित की जावे। 
217- आरोपी पिताम्बर साहू, छोटू उर्फ कृष्णा, रंजीत सिंह, बिज्जु उर्फ महेश यादव एवं आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर जमानत पर स्वतंत्र हैं, उन्हें तत्काल अभिरक्षा मे लिया जावे एवं उक्तानुसार सजा भुगतने हेतु जेल भेजा जावे। आरोपी जयदीप, गुल्लू उर्फ अरविंद श्रीवास्तव, विनोद सिंह केन्द्रीय जेल दुर्ग में निरूद्ध हैं, उन्हें यदि अन्य प्रकरण में आवश्यकता न हो तो तत्काल मुक्त करने का आदेश जारी हो। लेकिन उनसे दं0प्र0सं0 की धारा 437 ए के तहत पचास-पचास हजार रूपये का बंधपत्र छः माह के लिये इस आशय का निष्पादित करवाया जावे कि यदि अभियोजन द्वारा इस निर्णय के विरूद्ध अपील होती है तो वे माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष उपस्थित होंगे। 
218- शेष आरोपीगण जो जमानत पर मुक्त हैं, उनके जमानत एवं बंधपत्र दं0प्र0सं0 की धारा 437 ए के तहत आगामी छः माह तक प्रभावशील रहेंगे। 
219- जप्तशुदा सम्पत्ति के संबंध में कोई आदेश नही किया जा रहा है, क्योंकि इस प्रकरण के शेष आरोपी शहजाद, पी. प्रीतिश एवं गया उड़िया उर्फ जयचंद प्रधान अभी भी फरार हैं।

 दुर्ग, दिनांक-13/03/2015
मेरे निर्देशानुसार टंकित किया गया ।

(राजेश श्रीवास्तव)
विशेष न्यायाधीश, दुर्ग (छ.ग.)
मूल न्‍याय निर्णय दुर्ग न्‍यायालय के न्‍यायनिर्णय वेब साईट से पीडीएफ फारमेट में प्राप्‍त की जा सकती है.

Sunday, 13 March 2016

गैंगस्टर महादेव महार हत्याकांड फैसला (क्र. 199 से 209)

दाण्डिक विचारण एवं साक्ष्य की विवेचना के संबंध में:-
199- माननीय उच्च न्यायालय के न्यायदृष्टांत:- क्ष्1द्व 1998 (2) एमपीडब्ल्यूएन नोट नम्बर 58, (2) 1998 (1) एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 19, (3) 1998 (2) एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 219, (4) 1978 (2) एमपीडब्ल्युएन प्रताप सिंह (5) 1993 (1) एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 174 (5) 1997 (2)एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 146, (6)
1997 (2) एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 5, (7) 1981 (2) एमपीडब्ल्युएन नोट क्रमांक 218, (8) 1992 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्रमांक 1150, (9) 1990 जे.एल.जे. पेज क्रमांक 572, क्ष्10द्व 2009 (1) एमपीडब्ल्युएन नोट  क्रमांक 8, (11) 1982 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज क्रमांक 106, (12) 1995 क्रिमनल लॉ जर्नल ज्योतिलाल चक्रवर्ती बनाम दीपक दत्ता एवं अन्य, (13) 1998 (2) एमपीजेआर शार्ट नोट 23 है।
200- माननीय उच्च न्यायालय (माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय नही) के उक्त न्यायदृष्टांतों का सुक्ष्मता से अवलोकन किया गया। यह स्थापित विधि है कि यदि प्रस्तुत साक्ष्य से दो अभिमत संभव हो तो न्यायालयों को वह अभिमत अपनाना चाहिये जो आरोपी के पक्ष का हो। लेकिन इस प्रकरण में अभियोजन के साक्ष्य से दो दृष्टिकोण संभव नही है, बल्कि इस न्यायालय द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेक न्यायदृष्टांतों का अवलम्ब लिया गया है, जिसमें साक्षी पक्षद्रोही हुये हैं,  तब भी माननीय उच्चतम न्यायालय ने पक्षद्रोही साक्षी के साक्ष्य में किये गये उस कथन का अवलम्ब लिया है जो अभियोजन के मामले का समर्थन करता है। जहां तक घटना के समय का प्रश्न है तो इस संबंध में भी इस न्यायालय द्वारा प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य पर विश्वास किया गया है। इस प्रकरण में ऐसा भी नही है कि चांवल को भूसे से अलग नही किया जा सकता है, बल्कि इस न्यायालय द्वारा अभियोजन द्वारा प्रस्तुत किये गये साक्ष्य की सुक्ष्मता से एवं सावधानीपूर्वक विवेचना की गयी है और अ0सा01 तारकेश्वर सिंह और अ0सा07 चंदन साव के मुख्य परीक्षण में किये गये कथनों को विश्वास के योग्य माना गया है। इस प्रकरण में इस न्यायालय द्वारा दं0प्र0सं0 की धारा 164 के तहत अभिलिखित किये गये कथनों में से केवल अ0सा07 चंदन साव के कथनों का उपयोग केवल अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य में किये गये कथनों के समर्थन में किया गया है, जैसी विधि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित की गयी है। अतः स्पष्ट है कि माननीय उच्चतम न्यायालय के उक्त न्यायदृष्टांतों के तथ्य एवं इस प्रकरण के तथ्य और परिस्थितियों में भिन्नता है।
201- माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत:- क्ष्1द्व एआईआर 2010 सुप्रीम कोर्ट 3398, क्ष्2द्व एआईआर 2010 सुप्रीम कोर्ट 262, क्ष्3द्वएआईआर 2011 सुप्रीम कोर्ट 2545, क्ष्4द्व 1996 क्रिमनल लॉ जर्नल (3) 3199 क्ष्5द्व एआईआर 1990 एस0सी0 1185. इस प्रकरण में अ0सा01 तारकेश्वर सिंह एवं अ0सा07 चंदन साव का साक्ष्य पूर्णतया विश्वसनीय है एवं उनके साक्ष्य की आंशिक रूप से पुष्टि अ0सा02 केशवप्रसाद चौबे, अ0सा05 लिंगाराजू, अ0सा06 मुरली, अ0सा08 प्रशांत उर्फ गुड्डा उर्फ संतोष शर्मा एवं अ0सा09 गिरवर साहू ने अपने-अपने साक्ष्य में की है। अभियोजन साक्षी घटनास्थल पर घटना के तुरन्त बाद आये हैं, और उन्होंने घटनास्थल पर अन्य साक्षियों के उपस्थित होने की भी पुष्टि की है। जहां तक माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत एआईआर 2011 सुप्रीम कोर्ट 2545 का प्रश्न है तो इस न्यायदृष्टांत में भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के मुख्यपरीक्षण एवं प्रतिपरीक्षण में घोर विरोधाभाष था। लेकिन इस न्यायदृष्टांत के पैरा 19 में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यही माना था, कि उनके मुख्यपरीक्षण और प्रतिपरीक्षण में जो अंतर आया है, वह इस कारण आया है, क्योंकि उनका मुख्य परीक्षण 14 जनवरी 2003 को किया गया है और प्रतिपरीक्षण 08 अप्रेल 2003 को किया गया है, इस बीच वे एक या दूसरे के प्रभाव में आ गये और एक या दूसरे को उपकृत किये हैं। इस प्रकरण में भी इस न्यायालय द्वारा अ0सा01 तारकेश्वर सिंह और अ0सा07 चंदन साव के साक्ष्य पर इसलिये ही विश्वास किया गया है, क्योंकि उनके मुख्यपरीक्षण और प्रतिपरीक्षण के मध्य समय का लम्बा अंतर होने के कारण उन्हें आरोपीगण द्वारा या तो डराया गया या प्रलोभित किया गया है। इस प्रकरण में घटना का समय शव परीक्षण पर आधारित नही है, बल्कि प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के साक्ष्य से समर्थित है।
मेमोरण्डम एवं जप्ती के संबंध में 
202- माननीय उच्च न्यायालय (माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय को छोड़कर) के न्यायदृष्टांत:- {1} 1997 (1) एमपीडब्ल्युएन नोट नम्बर 57, {2} 1978 (1) एमपीडब्ल्युएन 264, {3} 2014 (1) क्रिमनल लॉ जर्नल 142, क्ष्4द्व 1998 क्रिमनल लॉ रिपोर्टर (एमपी) क्ष्5द्व 1996 (3) क्रिमनल लॉ जर्नल 3147, {4} 1995 क्रिमनल लॉ जर्नल 3992, {7} 1997(1) क्रिमनल लॉ जर्नल 454 बाम्बे, {8} 1991 क्रिमनल लॉ रिपोर्टर नोट्स 428, {9} 1998 क्रिमनल लॉ रिपोर्टर एम.पी पेज 122, {10} 1993 (1) एमपीडब्ल्यूएन नोट क्रमांक 174. उक्त सभी न्यायदृष्टांतों का सुक्ष्मता से अवलोकन किया गया, जिसमें मुख्यतः यही अवलोकित किया गया है कि मेमोरेण्डम एवं जप्ती के स्वतंत्र गवाहों द्वारा समर्थन नही किये जाने पर विवेचना अधिकारी के साक्ष्य के आधार पर मेमोरेण्डम एवं जप्ती को प्रमाणित नही माना जा सकता है। उक्त सभी न्यायदृष्टांतों का लाभ आरोपीगण को नही दिये जाने का प्रथम कारण तो यह है कि इस न्यायालय द्वारा इस निर्णय की कण्डिका 164 में माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेक न्यायदृष्टांतों का अवलम्ब लेकर विवेचना अधिकारी के साक्ष्य पर मेमोरेण्डम एवं जप्ती के संबंध में विश्वास किया गया है। जहां तक बरामद की गयी वस्तुओं पर मौके पर सीलबंद करने और उसे सुरक्षित रखे जाने का प्रश्न है तो इस संबंध में इस न्यायालय द्वारा इस निर्णय की उपर की कण्डिकाओं में विस्तार से विवेचना की जा चुकी है। माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय का न्यायदृष्टांत:- 2014 क्रिमनल लॉ जर्नल पेज 4312 , प्रथमतः यह न्यायदृष्टांत आयुध अधिनियम 1959 की धारा 25 से संबंधित है, जिसमें कोई भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नही थे। तब माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय ने गंडासे की जप्ती के दो गवाहों के द्वारा समर्थन नही करने पर यह माना था कि अभियोजन आरोपी से गंडासे की जप्ती को प्रमाणित नही कर पाया है। अतः स्पष्ट है कि माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय में उक्त उल्लेखित न्यायदृष्टांतों के तथ्य और परिस्थितियां इस प्रकरण के तथ्य और परिस्थितियों से बिलकुल भिन्न है।
विपरीत अनुमान अंतर्गत धारा 114 से संबधित
203- माननीय उच्च न्यायालय (माननीय छ0ग0 उच्च न्यायालय को छोड़कर) के न्यायदृष्टांत:- क्ष्1द्व 2010 क्रिमनल लॉ जर्नल 2505 उड़ीसा, क्ष्2द्व 2008 क्रिमनल लॉ जर्नल एनओसी 514 (ए.पी.) । यह स्थापित विधि है कि यदि किसी पक्ष द्वारा किसी महत्वपूर्ण साक्षी का परीक्षण नही कराया गया है तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत उस पक्ष के विरूद्ध प्रतिकुल उपधारणा की जा सकती है। लेकिन इस प्रकरण में कुल 77 साक्षियों का परीक्षण किया गया है और ऐसा कोई महत्वपूर्ण साक्षी नही है, जिसका कथन अभियोजन द्वारा प्रस्तुत नही किया गया है। यदि कोई साक्षी अपरीक्षित रहा है तो उक्त तथ्यों के संबंध में दूसरे साक्षी का परीक्षण किया गया है। माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत:-
2009 क्रिमनल लॉ जर्नल 3012 एस.सी.। इस न्यायदृष्टांत के तथ्य और परिस्थितियां पूर्णतया भिन्न है। यह न्यायदृष्टांत मेडिकल निगलीजेन्सी से संबंधित है।
भा0दं0सं0 की धारा 149 के संबध में 
204- भा0दं0सं0 की धारा 149 के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय का न्यायदृष्टांत 2011 (2) सीसीएससी 1010 (एससी) एवं 1991 मनिसा पेज क्रमांक 35 को आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर की ओर से 202 प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकरण में आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर का नाम दं0प्र0सं0 की धारा 164 के कथन व अ0सा07 चंदन साव और अ0सा01 तारकेश्वर सिंह के साक्ष्य में भी है। अभियोजन के साक्ष्य से आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर का (Over Act) भी दर्शित होता है। जबकि प्रस्तुत न्यायदृष्टांत में साक्षी ने आरोपी क्रमांक 1 के अतिरिक्त अन्य अभियुक्तों की संलिप्तता का विवरण ही नही दिया था। अतः प्रस्तुत न्यायदृष्टांतों का कोई लाभ इस प्रकरण के तथ्य और परिस्थितियों के अनुसार आरोपी शैलेन्द्र ठाकुर को नही दिया जा रहा है।
205- इस प्रकरण में अभियोजन द्वारा कुल 77 साक्षियों का साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है, जिसमें अधिकांश साक्षी पक्षद्रोही हुये हैं, लेकिन पक्षद्रोही साक्षियों के साक्ष्य में किये गये विश्वसनीय कथन का अवलम्ब इस न्यायालय द्वारा इस निर्णय की उपर की कण्डिकाओं में लिया गया है। लेकिन इस प्रकरण के अनेक साक्षी पूर्णतः पक्षद्रोही हुये है और उन्होंने अभियोजन के किसी भी तथ्य को प्रमाणित नही किया है, वे साक्षी हैं, अ0सा04 शिव साहू (प्रदर्श पी 9 एवं 10), अ0सा011 अशोक कुमार (प्रदर्श पी 38), अ0सा012 मोहन निषाद(प्रदर्श पी 39), अ0सा014 मनोज साहू (प्रदर्श पी 40,41,42,43,44,45,46), अ0सा016 प्रदीप ताम्रकार (प्रदर्श पी 48,49), अ0सा018 राजेश कुमार (प्रदर्श पी 59,60,61,62,63,64,65,66,67,68,69), अ0सा019 आनंद दास (प्रदर्श पी 9), अ0सा020 पी0राजकुमार (प्रदर्श पी 70 का पुलिस बयान), अ0सा023 राजेन्द्र सिंह (प्रदर्श पी 38), अ0सा026 दीपक (प्रदर्श पी 89, 90, 91), अ0सा030 राजकुमार (प्रदर्श पी 48 एवं 49), अ0सा033 मंगलदास (प्रदर्श पी 98,99), अ0सा034 तारकेश्वर (प्रदर्श पी 98), अ0सा036 गोपी (प्रदर्श पी 100 से 105 तक), अ0सा038 विद्यापति यादव (प्रदर्श पी 107 एवं 108), अ0सा039 प्रेम (प्रदर्श पी 100 से 105 तक), अ0सा040 मनोज थॉमस (प्रदर्श पी 109 का पुलिस बयान), अ0सा043 अजयसिंह भदोरिया (प्रदर्श पी 46), अ0सा047 विमलेश कुमार (प्रदर्श पी 116, 117), अ0सा051 मनीष कुमार (प्रदर्श पी 116,117), अ0सा053 रामदास (प्रदर्श पी 119), अ0सा055 प्रीतम निर्मलकर (प्रदर्श पी 41), अ0सा056 अशोक कुमार निर्मलकर (प्रदर्श पी 121, 122), अ0सा064 दलवीर सिंह (प्रदर्श पी 136, 137) की कार्यवाही को प्रमाणित नही किये हैं। उक्त सभी साक्षी पूर्णतः पक्षद्रोही हुये है और उन्होंने अपने-अपने साक्ष्य में उनके नाम के आगे कोष्ठक के अंदर लिखे गये प्रदर्श की कार्यवाही की पुष्टि नही किये हैं।
206- इस प्रकरण में स्कार्पियों वाहन क्रमांक सी.जी.12 डी/0189 की जप्ती भी हुई है, जिसके संबंध में अ0सा032 नरेश वर्मा व अ0सा022 नूर मोहम्मद एवं अ0सा037 अतुल बोरकर ने साक्ष्य प्रस्तुत किया है। इस स्कार्पियों को खरीदने हेतु आरोपी सैंथिल्य के साथ आरोपी अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव भी गये थे, लेकिन उक्त तीनों साक्षियों में से किसी भी साक्षी ने आरोपी अरविंद श्रीवास्तव उर्फ गुल्लू श्रीवास्तव के साथ जाने के तथ्य की पुष्टि नही की है। उक्त तीनों साक्षियों के साक्ष्य से केवल यही तथ्य प्रमाणित होता है कि अ0सा037 अतुल बोरकर ने कोरबा के जयसिंग अग्रवाल नामक व्यक्ति से उक्त स्कार्पियों वाहन क्रमांक सी.जी.12 डी/0189 अ0सा022 नूर मोहम्मद के माध्यम से खरीदी थी, जिसकी बिक्री रसीद प्रदर्श पी 97 है और छाया प्रति प्रदर्श पी 97 ए है। लेकिन इस स्कार्पियों वाहन की खरीदी-बिक्री प्रमाणित होने पर भी अभियोजन को कोई लाभ नही होता है।
207- इस प्रकरण में अभियोजन के अनुसार मृतक की हत्या के पश्चात आरोपी सुशील राठी ने आरोपी पंकज और और आरोपी सैथिल्य को क्वालिस वाहन क्रमांक सी.जी.07/2393 में बैठाकर कोरबा ले गया था, जहां पर आरोपी तपन सरकार पहले से ही था। तब उक्त आरोपीगण ने आरोपी तपन सरकार का कपड़ा कोरबा स्थित काफी हाउस के सामने उसे दिया था। इस पूरे सम्पूर्ण कार्यवाही को प्रमाणित करने हेतु अभियोजन द्वारा अ0सा027 श्याम कुमार साहू, अ0सा028 लव कुमार कौशिक, अ0सा040 मनोज थॉमस का साक्ष्य प्रस्तुत किया है। अ0सा027 श्याम कुमार साहू, अ0सा028 लवकुमार कौशिक ने छेर्रानाला टोलटैक्स कोरबा रोड बेरियर में जप्त प्रदर्श पी 92 की रसीद जो प्रदर्श पी 93 के अनुसार जप्त की गयी थी, की कार्यवाही की पुष्टि की है। लेकिन उक्त जप्ती की कार्यवाही से भी अभियोजन को कोई लाभ नही होता है।
208- इस प्रकरण में आरोपीगण ने एक मिनीडोर क्रमांक सी.जी. 07टी./0736 में बैठकर घटनास्थल पर आये थे। इस मिनीडोर को अ0सा050 शेख हफीज ने आरोपी शहजाद को विक्रय किया था, उसके पहले इसी मिनीडोर को अ0सा049 मोह0 फारूख ने हफीज खान को विक्रय किया था। उक्त दोनों साक्षियों ने अपने-अपने साक्ष्य में उक्त मिनीडोर के विक्रय की पुष्टि की है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि घटना के समय उक्त मिनीडोर क्रमांक सी.जी.07 टी./0736 का स्वामी आरोपी शहजाद था। इस मिनीडोर को विवेचक द्वारा अ0सा014 मनोज साहू व अ0सा043 अजय सिंह भदौरिया के समक्ष जप्त किये थे। लेकिन उक्त दोनों साक्षियों ने मिनीडोर की जप्ती की कार्यवाही को प्रमाणित नही किये हैं। इस मिनीडोर की जप्ती प्रदर्श पी 46 के अनुसार आरोपी शहजाद के पिता इदरीश के मकान के सामने से जप्त किया गया था। यद्यपि अभियोजन प्रदर्श पी 46 की जप्ती की कार्यवाही को प्रमाणित नही कर पाया है, तथापि उक्त साक्षियों के साक्ष्य से यह तथ्य तो प्रमाणित होता है कि घटना के समय घटनास्थल पर आने के लिये
आरोपीगण ने आरोपी शहजाद की मिनीडोर वाहन क्रमांक सी.जी.07 टी./0736 का उपयोग किया था।
209- उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अभियोजन इस प्रकरण में यह प्रमाणित करने में सफल हुआ है कि घटना समय 6.28 बजे के तत्काल बाद 6-35 बजे रोजनामचा सान्हा दर्ज किया गया, जिसमें आरोपी तपन सरकार एवं उसके साथियों का उल्लेख है, पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर तत्काल पहुंचे और 6.50 बजे देहाती नालिशी दर्ज की गयी, जिसमें आरोपियों के नाम एवं प्रत्यक्षदशी साक्षियों के नाम भी उल्लेखित है। यद्यपि घटना का प्रथम सूचना पत्र 10.10 बजे दर्ज किया गया है, तथापि उसका स्पष्टीकरण भी यह दिया गया कि कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गयी थी। प्रथम सूचना पत्र की प्रति घटना के दूसरे दिन 12/2/2005 को न्यायिक मजिस्टेंट को प्रेषित की गयी। इस विलम्ब का भी यही कारण दर्शित होता है कि उस दिन कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गयी थी। इसके अतिरिक्त इस प्रकरण में जप्त सभी आयुधों को न्यायालय में प्रस्तुत करके संबंधित साक्षी अ0सा076 आर0के0राय एवं अ0सा077 राकेश भट्ठ द्वारा आर्टिकल भी अंकित किया गया है।

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149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी