Saturday, 15 October 2016

उच्चतम न्यायालय के गिरफ्तारी, हिरासत पूछताछ संबंधित

11 सूत्रीय दिशा निर्देश
डी.के. बसु बनाम स्टेट बैंक ऑफ वेस्ट बंगाल (1197) 1 एस.सी.सी.-216) भारत का संविधान देश का मूल कानून है। इसमें हर व्यक्ति को पुलिस व अन्य शासकीय अभिकरणों द्वारा दुर्व्यवहार से सुरक्षा दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 2 में जीवन के निजी स्वतंत्रता का अधिकार सुरक्षित है।
संविधान के अनुच्छेद 22 में गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित अधिकार सुरक्षित हैं।
इन अधिकारों की सुरक्षा के लिए सीधे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में जा सकते हैं।
1- बंदी बनाने और पूछताछ का काम करने वाले पुलिस कर्मी के नाम और पद की घोषणा करने वाली पट्टी (टेप) स्पष्ट नजर आनी चाहिए।
2- गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार करना जरूरी है, जिस पर गिरफ्तारी का समय व दिनांक अंकित किया जावे। इस मेमो पर कम से कम ऐसे गवाह का दस्तखत कराया जाये जो या तो उस क्षेत्र का प्रतिष्ठित नागरिक हो या हिरासत में लिए जा रहे व्यक्ति का हितैषी मित्र अथवा परिजन हो।
3- ऐसे प्रत्येक बंदी को यह अधिकार है कि वह अपनी स्थिति की सूचना अपने मनपसंद शुभचिंतक को (चाहे व कहीं भी रहता हो, पुलिस के जरिये भिजवा दे, अर्थात् बंदी बनाने के समय तैयार किए गए मेमो में गवाह के अलावा भी किसी एक शुभचिंतक को बंदी व्यक्ति को सूचना देना चाहे तो ऐसा कर सकता है।
4- पुलिस द्वारा पकड़ा गया व्यक्ति जिस शुभचिंतक को सूचना देना चाहे वह अगर किसी दूरस्थ नगर या जिले में हो उस संबंधित व्यक्ति की गिरफ्तारी के समय और उसे रखे जाने के जगह की सूचना जिले के विधिक सहायता संगठन और संबंधित क्षेत्र के पुलिस स्टेशन के जरिए, गिरफ्तारी के आठ से बारह घंटे के अंदर, तार से देना (पुलिस के जरिए) जरूरी है।
5-बंदी बनाए गए व्यक्ति को उसके अधिकार का आवश्यक रूप से ज्ञान कराया जाना जरूरी है कि वह अपने शुभचिंतक को (क्र. 3 व 4 के अनुसार) सूचना पहुंचा सकता है।
6-बंदी रखे रखे जाने के स्थान पर केस डायरी में यह दर्ज करना जरूरी है कि बंदी द्वारा बताए गए किस व्यक्ति को उसकी सूचना दी गई और बंदी को किन पुलिस अफसरों की कस्टडी में रखा गया है।
7-अगर व्यक्ति आग्रह करे तो गिरफ्तारी के समय उसका शारीरिक परीक्षण कराया जाना चाहिए, उस समय यदि उसके शरीर पर कोई छोटे या बड़े चोट के निशान हो तो उसका विवरण दर्ज करना जरूरी है, ऐसे निरीक्षण प्रपत्रों (इंस्पेक्शन मेमो) पर पुलिस अधिकारी के साथ बंदी व्यक्ति का भी हस्ताक्षर जरूरी है और उसकी प्रतिलिपि बंदी को भी जाए।
8-पुलिस कस्टडी में रखे गए बंदी का प्रत्येक 48 घंटों में एक बार ऐसे प्राधिकृत डाक्टरी जांच के लिए प्रस्तुत करना जरूरी है, जिसकी स्थापना प्रदेश के स्वास्थ्य लोक सेवा संचालक द्वारा तदाशय के संदर्भ में की गई हो।
9-गिरफ्तारी के मेमो सहित सभी संबंधित प्रपत्रों की प्रतिलिपियां इलाके के दंडाधिकारी के पास (इसके रिकार्ड के लिए) भेजी जानी चाहिए।
10-पूछताछ के दौरान बंदी व्यक्ति को अपने वकील से मिलने की अनुमति देना जरूरी है, हालांकि समूची पूछताछ के दौरान वकील को बैठाए जाने की अनुमति से इसका आशय नहीं है।
11-पुलिस के समस्त जिला व प्रदेश मुख्यालयों में एक ऐसा पुलिस कंट्रोल रूम होना वांछित है, जहां प्रत्येक गिरफ्तारी की सूचना में रखे जाने के स्थान की जानकारी 12 घंटे के अंदर एक ऐसे नोटिस बार्ड पर अंकित की जाए, जिसे कोई भी आसानी से व स्पष्ट रूप से देख सके।  उक्त निर्देश प्रत्येक थाने में स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना अनिवार्य है।  इन निर्देशों का पालन न करने पर संबंधित अधिकारी पर विभागीय कार्यवाही होगी। इनका
पालन न करना उच्चतम न्यायालय की अवमानना होगी, जो कि एक गंभीर अपराध है, जिसके लिए कैद और जुर्माना हो सकता है। शिकायत करने वाले व्यक्ति अवमानना की अर्जी अपने राज्य के उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) में दे सकते हैं।
ऊपर दी गई बातें गिरफ्तार व्यक्ति के अन्य अधिकारों के साथ-साथ होनी चाहिए, जैसे-
1-गिरफ्तारी के समय अपराध बताना जरूरी होगा।
2-गिरफ्तारी के समय जोर जबरदस्ती की मनाही है।
3-गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के आगे पेश करना जरूरी है।
4-हिरासत में किसी भी बुरे सुलूक की मनाही है।
5-हिरासत में जुर्म कबूल करने के लिए दिया गया बयान अमान्य है।
6-महिला और 15 वर्ष से कम उम्र के बालक को केवल पूछताछ के लिए थाने में नहीं ले जाया जा सकता है। हिरासत में हिंसा, जिसमें मृत्यु भी शामिल है, कानून के शासन को गहरा आघात पहुंचा सकती है।

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