Thursday, 3 November 2016

छ.ग. राज्य विरूद्ध श्रीमती शान्ति सिन्हा

न्यायालयः-विशेष न्यायाधीश,(पी.सी.एक्ट) एवं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश,
 बलौदाबाजार ,जिला-बलौदाबाजार,छ.ग.
( पीठासीन अधिकारी- बृजेन्द्र कुमार शास्त्री)
 विशेष सत्र प्रकरण (ए.सी.बी.) क्रं0 01/2015
 संस्थित दिनांक 08.04.2015
 C.I.S.17/2015

छ.ग. राज्य
द्वारा भ्रष्टाचार निवारण शाखा, रायपुर
केम्प बलौदाबाजार,जिला-रायपुर (छ0ग0)--                                 ---------अभियोजन
-:विरूद्ध:-
श्रीमती शान्ति सिन्हा पति योगेश कुमार सिन्हा, उम्र 35 वर्ष
पटवारी हल्का नम्बर-09,ग्राम चौरेंगा, तहसील सिमगा,
जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा (छ0ग0)- -                                      --------- अभियुक्ता
---------------------------------------
राज्य द्वारा श्री अमिय अग्रवाल अतिरिक्त लोक अभियोजक।
आरोपिया की से श्री रूपेश त्रिवेदी अधिवक्ता।
--------------------------------------
 // नि र्ण  य //
 {आज दिनांक 24/अगस्त/2016 का घोषित}
01/ आरोपिया श्रीमती शान्ति सिन्हा जो कि एक लोक सेवक के पद पर पदस्थ रहते हुए शासकीय कार्य हेतु वैध पारिश्रमिक से भिन्न रिश्वत के रूप में 3000/-रूपये(तीन हजार रूपये) मांग कर आपराधिक कदाचार किया। इस प्रकार आरोपिया के द्वारा अन्तर्गत धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दण्डनीय अपराध कारित करने का आरोप है।
02/- आरोपिया के द्वारा यह स्वीकृत है कि वह पटवारी हल्का नम्बर-09 ग्राम चौरेंगा, तहसील सिमगा में पटवारी के पद पर पदस्थ रहते हुए एक लोक सेवक है।
03/- अभियोजन का मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि, प्रार्थी लोभन वर्मा अपने पिता के मृत्यु होने के कारण पिता के नाम की भूमि का फौती चढाने के लिए पटवारी हल्का नंम्बर- 09 के पटवारी श्रीमती शांति सिन्हा को एक माह पहले आवेदन किया था, उसके दोनो बहनो ने भी स्टाम्प पेपर में लिखकर दिया था कि पूरी जमीन लोभन वर्मा के नाम कर दिया जावे। पटवारी श्रीमती शान्ति सिन्हा ने फौती चढाने के एवज में प्रार्थी से 3000/-रूपये(तीन हजार रूपये) रिश्वत की मांग किया वह रिश्वत नही देना चाहता था इसलिए उसने एन्टी करप्शन व्‍यूरो रायपुर से सम्पर्क किया जहां एन्टी करप्शन ब्यूरो के द्वारा प्रार्थी की शिकायत का सत्यापन एक डिजिटल वाईस रिकार्डर देकर कराया गया ।
प्रार्थी लोभन वर्मा ने डिजिटल वाईस रिकार्डर को आरोपिया शान्ति सिन्हा से सिमगा जाकर रिश्वत की मांग की वार्तालाप को रिकार्ड किया जिसके आधार पर एन्टी करप्शन व्‍यूरो के द्वारा योजना तैयार कर दिनांक 09.05.2014 को ट्रेप दल पंच साक्षियो सहित रायपुर से सिमगा पहुंचा,प्रार्थी से द्वितीय शिकायत पत्र प्राप्त कर रिश्वत पूर्व बातचीत का वाईस रिकार्डर पंचसाक्षियो को सुनाया गया, पंचसाक्षियों के द्वारा आवेदन पत्र पर कार्यवाही कार्यवाही किये जाने की टीप अंकित किया गया उसके पश्चात् आरोपिया के विरूद्ध प्रथम दृष्टया धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत अपराध पाये जाने पर नम्बरी अपराध पंजीबद्ध किया गया और औपचारिकताएं पूर्ण करते हुए आरोपिया के टेबल से रिश्वती रकम बरामद किया उसके पश्चात् आवश्यक कार्यवाही पूर्ण कर अभियोजन की स्वीकृति शासन से प्राप्त कर अभियोगपत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया ।
04/ अभियोगपत्र प्रस्तुत होने पर आरोपिया के विरूद्ध प्रथम दृष्टया मामला पाये जाने पर अन्तर्गत धारा 7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप विरचित किया गया आरोपिया का अभिवाक लिया गया, आरोपिया के द्वारा अपराध अस्वीकार किया गया एवं विचारण चाहा गया ।
05/- न्यायालय के समक्ष निम्न विचारणीय प्रश्न है:-
(1) क्या आरोपिया शान्ति सिन्हा के द्वारा लोक सेवक पटवारी के पद पर रहते हुए प्रार्थी  लोभन वर्मा  से 3000/- रूपये (तीन हजार रूपये) रिश्वत के रूप में फौती दर्ज  कराने के लिए मांग की गयी ?
(2) क्या आरोपिया शान्ति सिन्हा के द्वारा फौती दर्ज किये जाने हेतु रिश्वत के रूप में 3000/-रूपये (तीन हजार रूपये) प्राप्त की गयी ?
(3) दोषसिद्धि अ थवा दोषमुक्ति ?
 -:सकारण निष्कर्ष :-
विचारणीय प्रश्‍न क्रमांक 01 एवं 02:- साक्ष्य की पुनरावृत्ति से बचने के लिए विचारणीय प्रश्न क्रमांंक 01 एवं 02 का निराकरण एक साथ किया जा रहा है।
06/- आरोपिया के विरूद्ध, प्रार्थी के पिता के मृत्यु पश्चात् प्रार्थी का नाम राजस्व अभिलेखों पर दर्ज किये जाने हेतु फौती दर्ज कराने के लिए 3000/-रूपये(तीन हजार रूपये) की रिश्वत मांगने का आरोप है ? यह अविवादित है कि, आरोपिया पटवारी है।
07/- अभियोजन साक्षी सुन्दरलाल धृतलहरे (अ0सा006) के द्वारा अपने अभिसाक्ष्य में यह बताया गया है कि, आरोपिया शान्ति सिन्हा के शासकीय सेवा में प्रथम नियुक्ति आदेश एवं सेवा निवृत्ति एवं सेवा से पृथक करना एवं सक्षम अधिकारी का पद नाम एवं पदस्थापना आदेश एवं सेवा पुस्तिका का प्रमाणित प्रतिलिपि ए.सी.बी. को दिया था जो कि, क्रमशः प्रदर्श पी0 12, 13 एवं 14 है । प्रदर्श पी-12 के अनुसार श्रीमती शान्ति सिन्हा की शासकीय सेवा में प्रथम नियुक्ति दिनांक 13.2.2007 को होना एवं सेवा से निवृत्ति दिनांक 13.02.2041 को है। पटवारी की नियुक्ति का अधिकार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को है। इस साक्षी के द्वारा श्रीमती शान्ति सिन्हा पटवारी की पदस्थाना एवं सेवा पुस्तिका की प्रतिलिपि संलग्न की गयी है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि,
आरोपिया पटवारी के पद पर होते हुए एक लोक सेवक है।
08/- आरोपिया के द्वारा यह स्वीकृत भी है कि, ग्राम चौरेंगा पटवारी हल्का नम्बर-09 तहसील सिमगा जिला बलौदाबाजार में पटवारी के पद पर कार्यरत थी।
09/- अब प्रश्न यह है कि, क्या आरोपिया ने प्रार्थी लोभन वर्मा से फौती चढाये जाने हेतु 3000/-रूपये (तीन हजार रूपये) रिश्वत के रूप में मांग की थी ?
10/- अभियोजन साक्षी एस.के.सेन ( अ0सा009) ने अपने साक्ष्य में बताया है कि प्रार्थी लोभन वर्मा निवासी ग्राम चौरेगा ने दिनांक 06.05.2014 को कार्यालय में आकर पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत पेश किया था जिसमें यह बताया गया था कि उसके पिता की फौत होने से जमीन पर उसका नाम दर्ज करने के लिए पटवारी हल्का नं. 09 की पटवारी श्रीमती शांति सिन्हा ने 3000/-रूपये रिश्वत की मांग किया है जिसे वह देना नहीं चाहता है और रंगे हाथों पकडाना चाहता है। पुलिस अधीक्षक आर.पी.साय के द्वारा कार्यवाही करने हेतु निर्देशित किया और आवेदन उसे सौंपा गया तब इस साक्षी के द्वारा शिकायत का सत्यापन डिजिटल वायस रिकार्डर से करने के पश्चात् ट्रेप दल का गठन किया और फिर योजना बद्ध तरीके से औपचारिक कार्यवाहियों को पूर्ण करते हुए दिनांक 09.05.2014 को सिमगा बस स्टेण्ड पहुंचा था ट्रेप दल में दो पंच साक्षी कलेक्टर रायपुर को पत्र भेजकर बुलाये गये थे सिमगा बस स्टेंड पर दिनांक 09.05.2014 प्रार्थी लोभन वर्मा मिला था जिसने रिकाडेर्ट
वार्तालाप वायस रिकार्डर तथा द्वितीय शिकायत आवेदन पेश किया था द्वितीय शिकायत आवेदनपत्र को पंच साक्षियों द्वारा पढकर कर कार्यवाही करने हेतु टीप लिखा गया था एवं रिकार्डट वार्तालाप को पंच साक्षियों को भी सुनाया गया था और उसका लिप्यांतरण प्रार्थी के बताये अनुसार पंच साक्षियों के समक्ष किया गया था और उसकी आवाज की सी.डी. भी तैयार की गयी थी। प्रार्थी लोभन वर्मा के द्वारा रिश्वत के रूप में दी जाने वाली रकम पॉच पॉच सौ रूपये के 6 नोट कुल तीन हजार पेश किया गया था जिसे पंच साक्षी एस.के.लाल के हाथों में दिया गया और उनके द्वारा नोटों के नम्बर को बोलकर नोट करवाया गया था जो प्रारंभिक पंचनामा में नोट किया गया था उसके पश्चात् उन नोटों पर फिनाफ्थलीन पावडर लगाने के लिए आरक्षक रामप्रवेश मिश्रा को दिया गया था रामप्रवेश मिश्रा ने नोटों पर फिनाफ्थलीन पावडर की हल्की परत लगा कर प्रार्थी की जमा तलाशी के पश्चात उसके पेंट की जेब में रख दिया गया था और उसे समझाईस भी दिया गया था कि इन नोटों को बार-बार नहीं छुऐगा। आरोपी के द्वारा मांगे जाने पर उसे देगा और फिर यह भी ध्यान रखेगा कि इन नोटों को कहां रखेगा। उसके पश्चात् प्रदर्शन घोल की कार्यवाही की गयी थी। प्रार्थी लोभन वर्मा को एक डिजिटल वायस रिकार्डर दिया गया था और उसे समझाया गया था कि रिश्वत देते समय के बातचीत को रिकार्ड करेगा। प्रार्थी को छाया साक्षी एस.के.लाल के साथ आरोपी के कार्यालय में भेजा गया, प्रार्थी आरोपी के कक्ष में गया और थोडी देर बाद बाहर निकाल कर ईशारा किया तो सभी सदस्य पटवारी के कक्ष में गये तथा महिला आरक्षक रोजलीन ने आरोपी के हाथ को पकडा था और नाम पूछने पर उसने अपना नाम शांति सिन्हा और पटवारी होना बताया था। रिश्वत के बारे में पूछताछ करने पर आरोपी ने रिश्वत लेने से मना किया, तब शिवशरण साहू से सोडियम कार्बोनेट का घोल बनाने के लिए कहा गया और उसमें प्रार्थी और आरोपी को छोड करके शेष सदस्यों का हाथ धुलवाया गया तो घोल का रंग नहीं बदला पुनः सोडियम कार्बोनट का घोल तैयार कर आरोपिया का हाथ धुलाया गया तब भी घोल का रंग परिवर्तित नहीं हुआ तब प्रार्थी से पूछा गया कि रिश्वत की रकम को आरोपी कहा रखा है तब प्रार्थी ने बताया था कि उसने नोट हाथ में नहीं लिया था टेबल पर रखे रजिस्टर में रखने को कहा था तब रजिस्टर पर रख दिया था। वहांं पर बैठे एक अन्य व्यक्ति झम्मन वर्मा ने बताया कि आरोपिया के कहने पर प्रार्थी ने यह नोट टेबल पर रखा था। प्रार्थी बार-बार गिनने के लिए बोल रहा था लेकिन आरोपी नहीं गिन रखी थी तब झम्मन वर्मा ने नोटों को गिना था। पुनः सोडियम कार्बोनेट का घोल तैयार कराकर झम्मन वर्मा का हाथ धुलवायागया था तो घोल का रंग गुलाबी हो गया था और रजिस्टर को भी जहां पर नोट रखे हुए थे साफ कागज से पोछकर सोडियम कार्बोनेट के घोल में डुबोया गया था तो घोल का रंग गुलाबी हो गया था।
11/- प्रार्थी को दिया गया दूसरा वायस रिकार्डर जिसमें रिश्वत देते समय की बातचीत रिकार्ड करने के लिए दिया था उसे प्रार्थी द्वारा प्रस्तुत किया गया जिसे सुनने का प्रयास किया गया किन्तु उसमें बहुत से आवाजे थी इसलिए स्पष्ट नहीं हो रहा था कि कौन क्या बोल रहा था।
12/- अभियोजन साक्षी लोभन राम (अ0सा0 01) के द्वारा अपने अभिसाक्ष्य में बताया गय है कि, उसके पिता जी की मृत्यु हो गयी थी तो उसकी फौती उठाने के लिए एक माह तक उसे घुमायी थी। आरोपिया ने उससे पैसा की मांग नहीं की थी गांव वालों ने कहा था कि जबतक पैसा नहीं दोगे तब तक कोई काम नहीं होगा तब वह रायपुर ए0सी0बी0 गया था और वह रायपुर ए0सी0बी0 इसलिए गया था क्योंंकि वह काम नहीं कर रही थी उसे गांव का रविदास लेकर गया था उसने लिखित में शिकायत दिया था और उस शिकायत को रविदास ने लिखा था शिकायत पत्र प्र0पी0 01 है । इस साक्षी के द्वारा यह भी बताया गया है कि, वहां उसे एक टेप रिकार्ड दिया गया था जिसे रविदास ने रख लिया था जिसमें क्या टेप किया गया था उसे नहीं मालूम है उसके बाद पुनः वह रायपुर शिकायत करने के लिए गया था दूसरा शिकायत पत्र प्र0पी0 02 है । इस साक्षी के द्वारा यह बताया गया है कि, वहांं लिखापढी हुई थी लेकिन क्या हुई थी उसे नहीं मालूम है। टेपरिकार्ड का लिप्यांंतरण किया गया था और टेप रिकार्ड उससे जप्त किया गया था, उसके पश्चात् आठ-नौ तारीख को ए0सी0बी0वाले उसे बुलाये थे। अभियोजन पक्ष के द्वारा पक्षद्रोही घोषित कराये जाने के पश्चात् पूछे गये सूचक प्रश्न के अन्तर्गत इस सुझाव को गलत बताया है कि, पटवारी ने फौती दर्ज कराने के नाम पर 3000/-रूपये(तीन हजार रूपये) रिश्वत की मांग की थी तथा इस साक्षी ने यह भी बताया है कि, ए0सी0बी0 कार्यालय में जाकर उसने शिकायत रविदास के कहने पर किया था । आरोपी से पैसे की लेन-देन की बात की टेप हुआ था या नहीं उसे नहीं मालूम यह बात रविदास बता सकता है।
13/- इस साक्षी के साक्ष्य से स्पष्ट होता है कि, आरोपिया के द्वारा प्रार्थी से सीधे रिश्वत की कोई मांग नहीं की गयी थी। प्रार्थी गांंव वालोंं के यह कहने पर कि जब तक पैसा नहीं दोगे काम नहीं होगा, रिश्वत देने में काम होता है। ए0सी0बी0कार्यालय में शिकायत के सत्यापन के लिए टेप दिया था वह भी प्रार्थी द्वारा अपने पास नहीं रखा गया था एक अन्य व्यक्ति रविदास के द्वारा उस टेप को रखा गया था। इसके अतिरिक्त प्रार्थी का यह भी कहना है कि शिकायत करने के लिए ए0सी0बी0 कार्यालय रविदास के कहने से गया था।
14/- प्रार्थी लोभन वर्मा के द्वारा अभियोजन साक्षी एस.के.सेन निरीक्षक के कथनोंं का समर्थन नहीं किया गया है। प्रार्थी लोभन वर्मा के द्वारा स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि आरोपिया के द्वारा उससे रिश्वत की कोई मांग नहीं की गयी थी गांंव वालोंं ने कहा था कि जबतक रिश्वत नहीं दोगे तब तक काम नहीं होगा साथ ही यह भी बताता है कि, रविदास ने उसे ए.सी.बी. कार्यालय लेकर गया था और उसने ही शिकायत पत्र लिखा था और यह भी बताता है कि टेप रिकार्डर को रविदास अपने पास रखा उसके द्वारा टेप रिकार्डर को अपने पास नहीं रखा था। साथ ही प्रार्थी यह भी बताता है कि वह इस बात की शिकायत करने गया था कि, आरोपिया पटवारी उसका काम नहीं कर रही है। 
15/- अभियोजन साक्षी निरीक्षक एस.के.सेन एवं पंच साक्षियों के साक्ष्य से भी यह स्पष्ट होता है कि आरोपिया के द्वारा रिश्वत की रकम अपने हाथ में नहीं ली गयी थी, रिश्वत की रकम टेबल पर पायी गयी थी। प्रार्थी के द्वारा जो रकम रिश्वत के रूप में पटवारी को रंगे हाथ पकडे जाने हेतु दिया गया था, वह रकम प्रार्थी के हाथ से लिया जाना प्रमाणित नहीं है हालांकि यह प्रमाणित है कि आरोपिया के रजिस्टर पर रखा गया था, और वह वही नोट थे जो कि फिनाफथलीन पावडर लगाकर आरोपी को दिये जाने के लिए दिया गया था। प्रमुख तथ्य यह है कि क्या आरोपिया के द्वारा रिश्वत की मांग की गयी थी ?
16/- आरोपिया की ओर तर्क दिया गया है कि , आरोपिया के द्वारा रिश्वत की कोई मांग नहीं की गयी थी क्योंकि प्रार्थी लोभन वर्मा के द्वारा रिश्वत के मांग के संबंध में क्लेशमात्र भी कथन नहीं किया गया है और जब मांग के सबंध में सारवान साक्ष्य का अभाव है तो मात्र दुषित धन की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता जिसके समर्थन न्याय निर्णय N.Sunkanna v. State of Andhra Pradesh. AIR. 2015 SC (Criminal) 1943  जिसमें यह अभिनिर्धा रित किया गया है कि, Accused alleged to have demanded and
accepted bribe of Rs. 300/- from complainant, a fair price shop dealer by threatening to seize stocks and foist a false case against him- Complainant himself had disowned his complaint and has turned
hostile- There is no other evidence to prove that the accused had made any demand--
Mere possession and recovery of currency notes from accused without proof of demand would not constitute offence under S.7-- 
Unless there is proof of demand of illegal gratification proof of acceptance will not follow--Legal presumption under S. 20 hence cannot be drawn--Accused acquitted.
अवलंबित एक अन्‍य न्‍याय निर्णय M.R. Purushotham v. State of Karnataka Pradesh. AIR. 2015 SC (Criminal) 139 का अवलंब लिया गया है जिसमें यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ProofAllegations
that accused working as Second Division Survey or demanded and accepted Rs. 500/- from complainant for issuance of survey sketch --Complainant himself not supporting prosecution case insofar as demand by accused is concerned--Mere possession and recovery of the currency notes from accused without proof of demand would not attract offence under13(1)(d)-
अवलंबित एक अन्य न्याय निर्णय Selvaraj v. State of Karnataka. AIR. 2015 SC (Criminal) 1829 का अवलंब लिया गया है जिसमें यह अभिनिर्धारित किया गया है कि Criminal P.C. (2of 1974),S. 378--Appeal against acquittal- -Bribery case --Acceptance of bribe has not been established by adducing cogent evidence--
View takon by trial court while acquitting accused was a plausible one --Same cannot be interfered with by High Court, that too without coming to close quarters of reasoning and re- ap praisal of evidence-
एक न्‍याय निर्णय PRAMOD KUMAR LAL v. STATE OF M.P. (NOW C.G.) 2015 (3) C.G.L.J. 308
का अवलंब लिया गया है जिसमें यह अभिनिर्धा रित किया गया है कि अभिनिर्णी त- दुग्धशाला में जाकर निजी प्रैक्टिस करने की अनुमति देने का प्रावधान है और पशु चिकित्सा मैनुवल के अनुसार शुल्क भी प्रभार्य है-मैनुवल के लेखांश(प्ररदर्श  पी/3) के परिशीलन से स्पष्ट रूप से यह सिद्ध होता है कि, चिकित्सक स्थल पर जाने पर शुल्क लेने का हकदार है-अपीलार्थी  दिनांक 19.03.1987 को प्रदर्श  पी/21 द्वारा काफी पहले पशुओं के लिए उपयुक्तता प्रमाण-पत्र जारी कर चुका था, और बीमा के लिए निक्षेप के चालान प्रदर्श  18क- और प्रदर्श  पी/20 में मांग की तारीख से काफी पहले जारी कर दिये गये थे-उन परिस्थितियों से पृथक कलुषित धन की केवल बरामदगी जिसके अधीन उसका संदाय किया जाता है, उस समय अभियुक्त को दोषसिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है जब वाद में सारवान साक्ष्य विश्वसनीय न हो-रिश्वत के संदाय को सिद्ध करने अथवा यह दर्शित करने के लिए विश्वसीनय साक्ष्य के अभाव में कि अभियुक्त के धन को उसका रिश्वत होना जानते हुए स्वेच्छया स्वीकार किया था, स्वयं बरामदगी अपने आप में अभियुक्त के विरूद्ध अभियोजन के आरोप को सिद्ध नहीं कर सकती है।
एक अन्य न्याय निर्णय SMT.MEENA v. STATE OF MAHARASHTRA II. (2000)CCR 118 (SC) SUIPREM COURT OF INDIA का अवलंब लिया गया है जिसमें यह अभिनिर्धा रित किया गया है कि 
(i) Bribery: Mere Recovery of Currency Note of Rs. 20/- Denomination Lying on pad on Table : Insufficient proof of Acceptance of Bribe--Currency note in question was not recovered from person on from table drawer but found on pad on table and Seized from that place by trap party Lady Constable, Shadow witness, who first arrived on the spot after signal was given by PW 1, was not examined at the trial Evidence of DW 1 completely belies prosecution storyCorroboration essential in case like this for what actually transpired during, alleged occurrence and acceptance of bribe, wanting
in this case--Results of phenolphthalein test not relevant perfunctory nature of materials and prevaricating type of evidence of P Ws 1 and 3, having strong prejudice against appellant --Not safe but dangerous of rest conviction upon their testimony.
(ii) Criminal Trial : Shadow Witness Presence and Importance Always Favoured by Law in Trap Party--To enable this witness to see and overhear what happens and how it happens, law has always favoured presence & importance of shadow witness in trap party.
एक अन्य न्याय निर्णय गणपती सान्या नाइक बनाम कर्नाटक राज्य 2007(3) सी सी एस सी 1487 (एस सी) का अवलंब लिया गया है जिसमें यह अभिनिर्धा रित किया गया है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम-, 1988-धारा-7 एवं 13-रिश्वतखोरी का जाल-विचारण न्यायालय का संपरीक्षण कि अत्यधिक प्रारम्भिक प्रक्रम पर ही प्रतिरक्षा का अभिवाक यह कि परिवादी की अपीलार्थी  के प्रति घोर शत्रुता-और यह कि करेंन्सी नोट पूर्ववर्ती  के द्वारा मेज पर रखे गये, जो सम्भाव्य स्पष्टीकरण--यह दर्शित करने वाला साक्ष्य कि करेन्सी नोटों का अपीलार्थी  द्वारा स्पर्श  तक नहीं, या उसके शरीर से उसकी बरामदगी नहीं--
अभियोजन मामला यह कि मेज पर धन रख दिये जाने के तत्काल बाद परिवादी को सुसंगत दस्तावेज हस्तगत- अत:, तर्क  कि रिश्वत की मांग करने का कोई  अवसर नहीं--भी सम्भाव्य--विचारण न्यायालय द्वारा दोषमुक्ति के विरूद्ध अपील में उच्च न्यायालय के लिए विचारण न्यायालय के निर्णय को उलटने का कोई  न्यायोचित्य ही नहीं- उच्च न्यायालय का निर्णय अपास्त।
17/- प्रतिरक्षा पक्ष की ओर से उपरोक्त न्याय निर्णयनों का अवलंब लेते हुए तर्क दिया गया है कि, प्रार्थी लोभन वर्मा जो कि प्रकरण का सारवान साक्षी है पक्षद्रोही रहा है एंव अन्य साक्ष्य समर्थन कारी साक्षी है जिनके साक्ष्य के आधार पर आरोपिया को दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। प्रार्थी के द्वारा स्पष्ट रूप से यह बताया गया है कि, आरोपी ने उससे पैसे की मांग नहीं की है। रविदास उसे लेकर गया था और विवेचक ने भी अपने अभिसाक्ष्य में बताया है कि रविदास उसके साथ आया था, एवं कार्यावाही के दौरान ही रविदास मौजूद था, उसके बावजूद रविदास को साक्षी नहीं बनाया गया है। रिश्वत के रूप में ऐच्छिक स्वीकृति नहीं है, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत ट्रेप कार्यवाही के दौरान एक छाया साक्षी का होना आवश्यक होता है जबकि इस प्रकरण में कोई छाया साक्षी नहीं है। पी0डब्ल्यू0 2 ने अपने अभिसाक्ष्य में बताया है कि लिप्यातरण पूर्ण में ही कर लियागया था और साथ ही साक्ष्य  अधिनियम की धारा 65 बी के तहत प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है। आरोपिया के द्वारा प्रार्थी का काम 15 दिनों के भीतर ही कर दिया गया था सिर्फ ऋण पुस्तिका नहीं होने के कारण उसे ऋण पुस्तिका प्रदान नहीं की गयी थी जिसे उपलब्ध होने पर दिया जाना कहा गया था, किन्तु दुर्भावनावश रविदास के कहने पर क्योंकि रविदास और प्रार्थी के शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाया गया था इसलिए झूठा फसाया गया है।
18/- प्रकरण के संपूर्ण साक्ष्य का मूल्यांकन करने से स्पष्ट होता है कि, आरोपिया के कक्ष से रिश्वत के रूप में दी जाने वाली रकम उसके रजिस्टर में रखे गये स्थिति में बरामद हुआ था, और वह वही रकम था जो कि फिनाफ्थलीन पावडर लगाकार आरोपिया को दिये जाने हेतु प्रार्थी को दिया गया था। प्रार्थी लोभन वर्मा पूर्णतः पक्षद्रोही रहा है और उसने आरोपिया के द्वारा पैसे की मांग नहीं किये जाने का स्पष्ट कथन किया गया है। प्रार्थी ने यह भी बताया है कि वह कार्यवाही रविदास के कहने पर किया था। आरोपिया के द्वारा रिश्वत हाथ में भी नहीं लिया गया है।
आरोपिया की ओर से इस मामले से हुबहू मिलते जुलते तथ्य से संबंधित एक न्याय निर्णयन् गणपती सान्या नाइक बनाम कर्ना टक राज्य 2007(3) सी सी एस सी 1487 (एस सी) का अवलंब लिया गया है इस मामले में भी रिश्वत की रकम मेंज पर प्राप्त हुआ था, जिसे आरोपिया के द्वारा स्पर्श नहीं किया गया है जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपी को दोषमुक्त घोषित किया है।
19/- उपरोक्त न्याय निर्णयन् के आलोक में यह पाया जाता है कि, इस मामले में भी आरोपिया के द्वारा रिश्वत की रकम प्राप्त नहीं की गयी हैं हालांंकि रिश्वत की रकम आरोपिया के मेंज से बरामद हुआ है, और प्रतिरक्षा पक्ष यह स्पष्ट नहीं किया है कि, जिस समय प्रार्थिया के द्वारा मेंज पर रूपये रखे गये उस समय उसके द्वारा किस प्रकार से विरोध किया गया उसका कोई स्पष्टी करण नहीं है किन्तु कार्यावाही से यह स्पष्ट है कि, मेंज पर रखने के पश्चात् ही प्रार्थी तत्काल बाहर निकलकर ईशारा किया और ट्रेपदल के सदस्य आकर आरोपिया को पकड लिये। अभियोजन पक्ष के द्वारा आरोपिया के द्वारा रिश्वत की मांग किये जाने के संबंध में कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं है। प्रार्थी को जो वायस रिकार्डर प्रदान किये गये थे उसमें प्रथम वायस रिकार्डर के संबंध में प्रार्थी के द्वारा स्पष्ट रूप से बताया गया है कि उसे रविदास के द्वारा रखा गया था उसके द्वारा उसमें कोई आवाज टेप नहीं की गयी थी और दूूसरे वायस रिकार्डर में कोई आवाज नहीं है। साथ ही छाया साक्षी के रूप में भी आरोपिया के कक्ष में प्रार्थी के साथ नहीं भेजा गया है जबकि इस प्रकार के मामले में छाया साक्षी का होना नितांत आवश्यक है। इस प्रकार आरोपिया के द्वारा रिश्वत की मांग किये जाने का कोई साक्ष्य प्रकरण में पेश नहीं है।
विचारणीय प्रश्‍न क्रमांक 03:-
20/- प्रकरण में आये अभिसाक्ष्य से आरोपिया के द्वारा प्रार्थी से रिश्वत की मांग किया जाना एवं उसे स्वेच्छा से प्रतिग्रहण करना प्रमाणित नहीं होता है। अतः उपरोक्त न्याय निर्णयनों के आलोक में आरोपिया को सन्देह का लाभ देते हुए अन्तर्गत धारा-7 भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम एवं धारा-13(1)(डी) सहपठित धारा-13(2) के आरोप से दोष मुक्त किया जाता है।
21/- आरोपिया जमानत पर है उनके जमानत मुचलके छः माह तक प्रवृत्त रहेगे।
22/- प्रकरण में जप्तशुदा राशि पॉच-पॉच सौ के छः नोट कुल 3000/-रूपये (तीन हजार रूपये) के संबंध में अभियुक्ता एवं प्रार्थी के द्वारा कोई दावा नहीं किया गया है। प्रकरण में आये साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि, उक्त रकम प्रार्थी द्वारा प्रदान किया गया था, अतः उक्त रकम 3000/-रूपये(तीन हजार रूपये) अपील अवधि पश्चात् प्रार्थी को वापस किया जावे। अपील होने की स्थिति में माननीय अपीलीय न्यायालय के निर्णयानुसार व्ययन किया जावे।
23/- धारा 428 द0प्र0सं0 का प्रमाण पत्र तैयार किया जावे।
24/- निर्णय की प्रति एक-एक लोक अभियोजक एवं जिला
दण्डाधिकारी बलौदाबाजार को प्रेषित किया जावे।
निर्णय घोषित हस्ताक्षरित व दिनांकित कर मेरे निर्देशानुसार टंकित
 किया गया
 सही/-
(बृजेन्द्र कुमार शास्त्री)
 विशेष न्यायाधीश(पी.सी.एक्ट)
 एवं प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश
बलौदाबाजार,छ0ग0 

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