Sunday, 30 October 2016

आप सबके फायदे का कानून, समझें और जानें

1. कोई भी असामाजिक व्यक्ति चाहे वह स्कूल, कालेज का छात्र हो, गुंडा तत्व हो, वह किसी भी महिला अथवा लड़की के साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करता है, तो बिल्कुल चुप न रहिये। अपने परिवार के सदस्यों, पुलिस अथवा समाज के लोगों की जानकारी में लायें।
अपने सहयोगी अथवा सहेलियों को भी बतायें, अन्यथा ऐसे तत्वों के हौसले बढ़ेंगे और कोई बड़ी घटना भी वे घटित कर सकते हैं।
2. पति के पास जो भी जायदाद (खेती की जमीन, घर, प्लाट) है, वह पत्नी या दोनों के संयुक्त नाम पर भी रजिस्टर हो सकती है।
3. पत्नी को अपनी शादी के समय और बाद में माता-पिता और ससुराल से मुंह दिखाई के तौर पर जो कुछ भी मिला हो, वह स्त्री धन कहलाता है, उस पर कानूनी हक पत्नी का ही होता है।
4. कानून के तहत कोई भी गैर शादीशुदा या शादीशुदा औरत अनचाहा गर्भपात करवा सकती है। गर्भपात कराना औरत का निजी फैसला है, जिसके लिए उसे कोई भी नहीं रोक सकता है।
5. मॉं-बाप के बीच तलाक हो जाने के बावजूद बच्चे का पिता की जायदाद में हक/हिस्सा बराबर बना रहता है।
6. शादीशुदा पति-पत्नी संयुक्त रूप से अदालत में अर्जी पेश कर आपसी सहमति से बिना विलम्ब के तलाक प्राप्त कर सकते है।
7. जन्म, मुत्यु और विवाह का पंजीयन अवश्य करायें। इससे आप भविष्य में होने वाली परेशानियों से बचे रहेंगे।
8. किसी को टोनही कहना काननून गम्भीर अपराध है। आप दंडित हो सकते हैं।
9. किसी अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के विरूद्ध कोई अपमानजनक बात न करें, जातिगत गाली न दें, ऐसा करना गम्भीर प्रकृति का अपराध होता है, जो दण्डनीय तथा अजमानतीय है।
10. पी.आई.एल. द्वारा आम लोगों के फायदे या सार्वजनिक महत्व के मामले, जो मौलिक अधिकार से संबंधित हों, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में पेश किये जा सकते हैं।
11. किसी भी मिलावटी पदार्थ, जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो, उसके आयात करने, बनाने, रखने, बेचने या बांटने से प्रतिकूल असर हो तथा झूठी वारन्टी देना आदि कानूनन अपराध है। इसमें कम से कम 6 माह और अधिकतम 3 वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
12. प्रत्येक नागरिक को संविधान, उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का पूर्ण आदर करना चाहिये। ध्वज फहराने से ठीक पहले सावधान हो जाना चाहिये। ध्वज अभिवादन के बाद राष्ट्रगान (जन,गण,मन) पूर्ण होने तक उसी अवस्था में ही रहना चाहिये।
13. कोई व्यक्ति, जो अनुसूचित जाति या जनजाति का सदस्य है, स्त्री या बालक है, मानसिक अस्वस्थता, विनाश, जातीय हिंसा, बाढ़, सूखा का शिकार है या वार्षिक एक लाख रूपये से कम है, उसे विधिक सेवा प्राधिकरण जिला न्यायालय, तहसील सिविल कोर्ट में निःशुल्क कानूनी सहायता पाने का अधिकार है।
14. महिला के नाम पर जमीन, मकान की रजिस्ट्री कराये जाने पर शासन द्वारा पंजीयन शुल्क में छूट का प्रावधान किया गया है।
15. रैगिंग एक गम्भीर अपराध है, जिसके लिये कानून में कारावास और जुर्माने के दण्ड का प्रावधान है। ध्यान रहे दंडित होने पर शासकीय सेवा के अयोग्य होने की स्थिति भी निर्मित हो सकती है।
16. शासन द्वारा नागरिकों के हितों के लिये मानव अधिकार आयोग, महिला अधिकार आयोग का भी गठन किया गया है। जहां मानवीय/स्त्री अधिकारों के हनन की शिकायत सीधे भेजी जा सकती है।
17. राज्य शासन ने संपूर्ण छत्तीसगढ़ में 9 से 12 कक्षा तक के शासकीय विद्यालयों में अध्ययनरत अनुसूचित जाति-जनजाति की छात्राओं को शाला आवागमन हेतु निःशुल्‍क सायकल प्रदाय योजना लागू की है। जिसने सुविधा प्राप्त नहीं की है, वे अपने शिक्षा केन्द्र से सुविधा प्राप्त कर सकते हैं।
18. प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण हेतु चिकित्सीय परीक्षण कराना कानूनन अपराध घोषित किया गया है। परीक्षण कराने वाला और परीक्षण करने वाला चिकित्सक, दोनों को ही दंडित किये जाने का प्रावधान कानून में है।
19. बालिग व्यक्ति, जो कम से कम 21 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुका है, स्त्री, जो कम से कम 
18 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुकी है, वे अविवाहित रूप में भी साथ-साथ रह सकते हैं।
उनका साथ रहना किसी भी कानून के तहत जुर्म नहीं है। उन्हें कोई (पुलिस प्रशासन या रिश्तेदार) प्रताड़ित करने का हक नहीं रखता है।
20. हिन्दू पति-पत्नी क्रूरता, जारता, परित्याग असाध्य रूप से विकृत चित्तता, गुप्तरोग या कुष्ठरोग, सन्यासी हो जाने की स्थिति, दूसरा धर्म अपना लेने, 7 वर्ष से अधिक अवधि तक गायब हो जाने के आधार पर दूसरे पक्ष के विरूद्ध तलाक की डिक्री अदालत में याचिका पेश कर प्राप्त कर सकता है।
21. 21 वर्ष से कम उम्र के बालक व 18 वर्ष से कम उम्र की बालिका का विवाह कानूनन अपराध है। इस विवाह में सहयोग करने वाले को भी सजा हो सकती है।
22. छत्‍तीसगढ़ विवाह का अनिवार्य पंजीयन नियम, 2006 के तहत विवाह का पंजीयन कानूनन जरूरी है, जो ग्राम पंचायत, नगरपालिका या नगरपालिक निगम में कराया जा सकता है।
23. कोई पति बिना किसी उचित व पर्याप्त कारण के अपनी पत्नी अथवा बच्चों का परित्याग किया हो तो पत्नी-बच्चे उससे उचित व पर्याप्त भरण-पोषण खर्च पाने के कानूनन अधिकारी होते हैं। इसके लिये उन्हें मजिस्टेªट की अदालत में विवरण सहित अर्जी लगानी चाहिये।
24. संविधान के अंतर्गत बेटियों को भी जन्म लेने और गरिमामय जीवन जीने का अधिकार है। भ्रूण की लिंग जांच एवं कन्या-भ्रूण हत्या दंडनीय अपराध है।
25. विज्ञान के अनुसार महिला के ग क्रोमोसोम से पुरूष का ग क्रोमोसोम मिलता है, तो लड़की का जन्म होता है। यदि महिला का ग क्रोमोसोम से पुरूष का ल क्रोमोसोम मिलता है, तो लड़के का जन्म होता है। अतः पुरूष ही वह प्रधान कारक है, जिसके क्रोमोसोम से लड़के या लड़की का जन्म तय होता है।
26. किसी भी धर्म, सम्प्रदाय या जाति के बालिग पुरूष (21 वर्ष) व स्त्री (18 वर्ष), जो जड़ या पागल न हो, पूर्व पति या पत्नी जीवित न हो, प्रतिसिद्ध कोटि की नातेदारी न हो, विशेष विवाह अधिनियम 1954 के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं। प्रत्येक जिलाधीश कार्यालय में विवाह अधिकारी नियुक्त है। उचित आवेदन पत्र, शपथ पत्र, जन्म तिथि प्रमाण पत्र पेश कर बहुत ही कम व्यय पर विवाह कर सकते हैं।

दैनिक उपयोगी कानून की जानकारी

  • 18 साल की उम्र के बाद लड़की बालिग हो जाती है और उसके बाद उसे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का पूरा हक मिल जाता है।
  • कानूनी तौर पर कोई भी व्यक्ति किसी बालिग को उसकी इच्छा के विरूद्ध कुछ भी करने को मजबूर नहीं कर सकता, यहां तक कि अभिभावक (माता/पिता या संरक्षक) को भी इस बारे में कोई हक प्राप्त नहीं है।
  • पति-पत्नी के विवाद के चलते पति, पत्नी को घर से बेदखल नहीं कर सकता। ऐसा होने पर वह घरेलू हिंसा कानून के तहत मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आवेदन पेश कर तुरंत राहत ले सकती है।
  • तलाक के 7 वर्ष तक के बच्चे पर मां का ही कानूनी अधिकार रहता है। उसके बाद न्यायालय द्वारा बच्चे का हित देखते हुए अनुतोष दिया जाता है।
  • लड़कियों को भी लड़कों की तरह पिता की संपत्ति में बराबर का कानूनी अधिकार प्राप्त है।
  • पुलिस हिरासत में किसी भी व्यक्ति को सताना, मारपीट करना या किसी अन्य तरह से यातना देना एक गंभीर अपराध माना गया है।
  • किसी की गिरफ्तारी के समय पुलिस को उसे यह बताना आवश्यक है कि उसका अपराध जमानती है या गैर जमानती।
  • सिर्फ एक महिला पुलिस अफसर ही महिला के शरीर की तलाशी ले सकती है।
  • थाने में रिपोर्ट मुहजबानी या लिखित हो सकती है। रिपोर्ट की एक प्रति पाने का सभी को कानूनन हक है।
  • थाने में रिपोर्ट न लिखे जाने पर उसकी शिकायत उस थाने के उच्चाधिकारियों से की जा सकती है अथवा पंजीकृत डाक से पुलिस अधीक्षक को रिपोर्ट भेजी जा सकती है अथवा अदालत में परिवाद (ब्वउचसंपदजद्ध भी पेश किया जा सकता है।
  • घरेलू हिंसा की शिकार महिला, मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी शिकायत का आवेदन पेश कर सकती है,जिसकी सुनवायी मजिस्ट्रेट 3 दिनों के अंदर सम्पादित करेगा और फैसला 60 दिनों के अंदर करेगा।
  • जिस घर में महिला निवास कर रही हो, वहां से उसे जबरन नहीं निकाला जा सकता। मजिस्ट्रेट को आवेदन देने पर वह उस महिला को संबंधित निवास में फिर से निवास करने का आदेश दे सकता है।
  • दहेज देना, लेना या दहेज की मांग करने को कानूनी रूप से दंडनीय अपराध बनाया गया है, जिसकी शिकायत थाने या मजिस्ट्रेट के न्यायालय में की जा सकती है।
  • शादी-शुदा महिला भरण-पोषण के लिए न्यायालय में साधारण आवेदन पेश कर सकती है।
  • कोई भी वरिष्ठ नागरिक, जो स्वयं आय अर्जित करने में असमर्थ है, आय अर्जित करने वाले पुत्र-पुत्री, पौत्र-पौत्री से अधिकतम दस हजार रूपये तक भरण-पोषण पाने का अधिकारी हो सकता है। इस हेतु उसे एस.डी.ओ. (राजस्व) के न्यायालय में आवेदन करना होगा।
  • बलात्कार होने की स्थिति में संबंधित महिला को तुरंत घटना की जानकारी सगे-संबंधी व दोस्तों को देनी चाहिए। थाने में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। तत्काल डाक्टरी जांच भी करानी चाहिए और उस जांच के पूर्व तक स्नान करने से बचना चाहिए। घटना के समय पहने हुए कपड़ों को उसे धोना नहीं चाहिए और पुलिस को उसे जप्त कराना चाहिए तथा रिपोर्ट की एक प्रति काननून मुफ्त लेनी चाहिए। प्रत्येक कार्य स्थल पर कार्यरत महिला कर्मचारी को उनके विरूद्ध होने वाले यौन उत्पीड़न पर तत्काल उसकी सूचना लिखित या मौखिक रूप से अपने नियोक्ता को देनी चाहिए और संबंधित नियोक्ता को तत्काल शिकायत कमेटी से उसकी जांच करानी चाहिए।
  • 21 वर्ष से कम के पुरूष और 18 वर्ष से कम युवती के मध्य विवाह गैर कानूनी है, इसलिए बालिग होने पर ही विवाह किया जाना चाहिए, अन्यथा वे दंड के भागी हो सकते हैं।
  • देश का प्रत्येक नागरिक सूचना का अधिकार कानून के अंतर्गत किसी भी लोक निकाय से अपने काम की सूचना प्राप्त कर सकता है, जिसके लिए उसे आवेदन के साथ 10/- रू. का नान-ज्युडिशियल स्टाम्प, नगर या चालान या मनीआर्डर से राशि अदा करनी होगी।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत प्रत्येक गांव के वयस्क को 100 दिन तक रोजगार प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।
  • जिला में स्थित जिला अदालत/जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तथा तहसील में स्थित तहसील विधिक सेवा प्राधिकरण से कोई भी व्यक्ति, जिनकी आय एक लाख रूपये वार्षिक से कम है, वे व्यक्ति अदालती कार्यवाही हेतु निःशुल्क विधिक सेवा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।
  • भारत सरकार द्वारा बनायी गई तोषण निधि योजना, 1989 के अनुसार दुर्घटना में किसी वाहन से, जिसका विवरण पता न हो, किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके वारिसानों को 25000/- रूपये, घायलशुदा व्यक्ति को 12500/- रू. मुआवजा जिला कलेक्टर अथवा उनके अधीनस्थ अधिकारी को आवेदन दिए जाने पर दिलाए जाने का प्रावधान किया गया है।
  • दुर्घटना कारित करने वाली वाहन व वाहन का नंबर जहां पता हो, तो उस संबंध में मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में आवेदन कर उचित व पर्याप्त क्षतिपूर्ति राशि प्राप्त की जा सकती है।
  • बाजार से उपभोग करने हेतु प्राप्त की जाने वाली वस्तुओं की सेवाओं में कमी, वस्तुओं में मिलावट होने की स्थिति या उपभोक्ता का शोषण होने की स्थिति में उस उपभोक्ता को एक आवेदन जिला मुख्यालय में स्थित जिला उपभोक्ता न्यायालय में उचित मुआवजा अनुतोष हेतु पेश करना चाहिए। इसके लिए उसे दस्तावेज के रूप में सामग्री क्रय किए जाने से संबंधित रसीद व अन्य दस्तावेज वारंटी/गारंटी कार्ड इत्यादि भी पेश करने चाहिए।
  • भ्रष्टाचार रोकने के लिए तथा भ्रष्ट सेवक को दंडित कराने के लिए उस लोक सेवक के खिलाफ लिखित शिकायत राज्य शासन द्वारा गठित विशेष शिकायत सेल या एंटीकरप्शन ब्यूरो या आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो को करनी चाहिए।
  • कोई भी व्यवसायी, जो वस्तुओं के पूर्व से ही प्रिंटेड रेट पर स्टीकर चिपकाकर नवीन रेट प्राइस लिखता है, वह पूर्णतया गैरकानूनी कृत्य है, जो पैकेजिंग रूल्स के विरूद्ध है। उपभोक्ता उसके विरूद्ध जिला न्यायालय में अर्जी दे सकता है, जिला उपभोक्ता न्यायालय, जो कलेक्ट्रेट परिसर में है, उनके समक्ष शिकायत दर्ज करा सकता है।
  • बालिग हिंदू महिला-पुरूष के विवाह हेतु कर्मकाण्ड (अग्नि के समक्ष मंत्रोच्चार सात फेरे) आवश्कता है, किसी मंदिर में माला बदलने या सिंदूर लगा दिए जाने से विवाह संपन्न नहीं होता है। उसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं होगी।
  • प्रत्येक कलेक्टर कार्यालय में विवाह अधिकारी नियुक्त होता है। उसके समक्ष महिला व पुरूष उचित आवेदन पत्र भरकर शपथ पत्र सहित आयु संबंधी प्रमाण पत्र लगाकर कानूनन विवाह कर सकते हैं। उसकी मान्यता वेद या अग्नि के समक्ष किए गए विवाह से किसी भी तरह से कम नहीं होती है। यह सबसे कम खर्चीला कानूनी विवाह होता है।
  • जिला न्यायालय में जनोपयोगी सेवा से संबंधित स्थायी लोक अदालत है, जिसमें कोई भी नागरिक, जो लोकोपयोगी सेवा, जिसमें परिवहन (सड़क, वायु या जल द्वारा सेवा) पोस्ट आफिस, टेलीग्राफ, टेलीफोन विद्युत आपूर्ति, रोशनी, लोगों हेतु जल सेवा वाले किसी भी संस्था द्वारा प्रदाय होती हो, स्वच्छता संबंधी सुविधाओं की सेवा, अस्पताल अथवा डिस्पेंसरी संबंधी सेवा, बीमा संबंधी सेवा, जो राज्य शासन अथवा केंद्रीय शासन से संबंधित हो, उन संस्थाओं के विरूद्ध एक साधारण या सामान्य आवेदन बिना शुल्क का पेश किया जा सकता है और संबंधित स्थायी लोक अदालत से अतिशीघ्र अनुतोष प्राप्त किया जा सकता है।
  • पहली पत्नी के जीते जी दूसरी शादी करना कानूनन अपराध है। पहली पत्नी, चाहे तो पति के खिलाफ थाने में या सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकती है। कानूनन उस पति को सात साल कैद की सजा हो सकती है।
  • पहली पत्नी की सहमति से भी गई दूसरी शादी गैर कानूनी होती है और ऐसी दूसरी पत्नी कानूनन अपने पति की संपत्ति में कोई हक या भरण-पोषण खर्चा पाने की अधिकारिणी नहीं होती है।
  • किसी विवाहित स्त्री की मृत्यु अग्नि या शारीरिक क्षति द्वारा कारित की जाती है और ऐसी मृत्यु के कुछ समय पूर्व उसके पति या रिश्तेदारों ने दहेज की मांग की हो, तो ऐसे व्यक्तियों के विरूद्ध दहेज मृत्यु का मुकदमा चलता है, जिसमें आजीवन कारावास की सजा तक का प्रावधान किया गया है।
  • हवाई यात्रा में वरिष्ठ नागरिक को आने-जाने की टिकट खरीदने पर 50 प्रतिशत तक की छूट का प्रावधान है।
  • शासकीय कर्मचारी/अधिकारी शासन के नियम अनुसार एक ही पत्नी रख सकता है।
  • शादी-शुदा पत्नी के रहते दूसरी पत्नी रखने से उस पर विभागीय कार्यवाही का प्रावधान किया गया है।
  • वरिष्ठ नागरिक को रेल यात्रा भाड़ा में 30 प्रतिशत तक की छूट का प्रावधान है, जिसके लिए आयु प्रमाण पत्र रखना अनिवार्य है।
  • 60 वर्ष का निराश्रित वृद्ध और 50 वर्ष से ऊपर की निराश्रित वृद्धा गरीबी रेखा के नीचे 6 से 14 वर्ष के नागरिक के बच्चों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन की पात्रता है, जिसमें उन्हें नगरीय निकाय या ग्राम पंचायत से राशि प्राप्त होती है।

मध्यस्थता के संबंध में जानकारी

(1) मध्यस्थता क्या है?
मध्यस्थता विवादों को निपटाने की न्यायिक प्रक्रिया से भिन्न एक वैकल्पिक प्रक्रिया है, जिसमें एक तीसरे स्वतंत्र व्यक्ति मध्यस्थ (मीडियेटर) दो पक्षों के बीच अपने सहयोग से उनके सामान्य हितों के लिए एक समझौते पर सहमत होने के लिए उन्हें तैयार करता है। इस प्रक्रिया में लचीलापन है और कानूनी प्रक्रियागत जटिलताएं नहीं है। इस प्रक्रिया में आपसी मतभेद समाप्त हो जाते है अथवा कम हो जाते हैं।
(2) मध्यस्थता क्यों?
न्यायालय में विवादों को सुलझाने की एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसमें एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने के पश्चात पक्षों का नियंत्रण समाप्त हो जाता है और न्यायालय का नियंत्रण स्थापित हो जाता है। न्यायालय द्वारा एक पक्ष के हित में निर्णय सुनिश्चित है, किन्तु दूसरे पक्ष के विपरीत होना भी उतना ही सुनिश्चित है। दोनों पक्षों के हित में निर्णय, जिससे दोनों पक्ष संतुष्ट हो सकें, ऐसा निर्णय, न्यायालय नहीं दे सकता। न्यायालय द्वारा तथ्यों, विधिक स्थिति तथा न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखकर निर्णय दिया जाता है। जब कि मध्यस्थता दो पक्षों को खुलकर बातचीत करने के लिए प्रेरित और उत्साहित करता है। वह पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में सहयोग प्रदान करता है। वह दोनों पक्षों को अपनी बात कहने का समान अवसर देकर, पक्षों में सामंजस्य स्थापित करता है। मध्यस्थता में विवादों को निपटाने का सारा प्रयास स्वयं पक्षों का होता है, जिसमें मध्यस्थ
(मिडियेटर) उनकी सहातया करता है। पूरी प्रक्रिया पर पक्षों का नियंत्रण बना रहता है। निर्णय लेने का अधिकार भी पक्षों का ही रहता है। कहीं भी विवशता एवं दबाव नहीं रहता, पूरी प्रक्रिया पर पक्षों का नियंत्रण बना रहता है। निर्णय लेने का अधिकार भी पक्षों का ही रहता है। कहीं भी विवशता एवं दबाव नहीं रहता, पूरी प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष होती है।
(3) मध्यस्थता से होने वाले लाभ:-
1. मध्यस्थता एक ऐसा मार्ग प्रस्तुत करती है, जिसमें पक्षों को समझौता कराने के लिए सहमत किया जाता है तथा पक्षों के मध्य उत्पन्न मतभेदों को दूर करने के लिए अवसर प्राप्त होता है।
2. रिश्तों में आई दरार से हुए नुकसान की पूर्ति करने का अवसर प्राप्त होता है।
3. एक ऐसा उपाय है, जिसमें पक्ष स्वयं अपना निर्णय ले सकते हैं।
4. हिंसा, घृणा, धमकियों से हटकर एक सभ्य उपाय है, जिससे विवादों का निराकरण निकाला जा सकता है।
5. विवादग्रस्त पक्षों में आपसी बातचीत और मधुर संबंध बनाने का अवसर प्राप्त होता है।
6. यह प्रक्रिया मुकदमें का विचारण नहीं करती और न ही गुणदोष पर निर्णय देती है।
7. यह प्रक्रिया किसी भी न्यायिक प्रक्रिया की अपेक्षा सस्ती है।
8. इसमें सफलता की संभावनाएं अधिक है तथा यह किसी भी स्थिति में पक्षों के लिए लाभकारी है।
9. इस प्रक्रिया में पक्षों में एक-दूसरे की बातें सुननें, भावनाओं को समझने का सही अर्थों में अवसर प्राप्त होता है।
10. इस प्रक्रिया में पक्षों में किसी प्रकार का भय नहीं होता, पक्ष अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं क्योंकि प्रक्रिया गोपनीयतापूर्ण है, अतः पक्ष अपनी बात को खुले मन से कह पाते हैं, उन्हें किसी का भय नहीं होता।
11. इस प्रक्रिया में पक्ष स्वयं अपना निर्णत लेते हैं, अतः उनकी आशाओं के विपरीत किसी भी अप्रत्याशित निर्णय प्राप्त होने की संभावना नहीं रहती, जैसा कि न्यायालय की प्रक्रिया में अक्सर होता है।
12. मध्यस्थता से समझौता कुछ घंटों या दिनों में ही प्राप्त हो जाता है। अनेक महीनों या वर्षों तक यह प्रक्रिया नहीं चलती अर्थात समय की बचत होती है।
13. जहां न्यायालय के आदेश के अनुपालन कराने में भी अनेक कठिनाईयां उत्पन्न होती है, वहां मध्यस्थता से प्राप्त समझौता स्वयं पक्षों का स्वेच्छा से प्राप्त निर्णय होता है, अतः उसके क्रियान्वयन में कोई कठिनाई नहीं होती है।
14. न्यायिक प्रक्रिया के वाद समय में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, जबकि मध्यस्थता में विवादों को किसी भी स्तर पर निपटाया जा सकता है, इसमें विलंब कभी नहीं होता।
15. इस प्रक्रिया द्वारा प्राप्त समझौते से मन को शान्ति मिलती है।
16. मध्यस्थता के माध्यम से निराकृत प्रकरणों में न्याय शुल्क की छूट प्रदान की गई है।
(4) मध्यस्थता से कौन से विवाद का समझौता संभव है:-
(अ) सिविल केस (व्यवहार वाद)
1. निषेधाज्ञा के प्रकरण। 
2. विशिष्ट अनुतोष 
3.पारिवारिक वाद
4. मोटर दुर्घटना 
5. मकान मालिक एवं किरायेदार
6. सिविल रिकवरी 
7. व्यावसायिक झगड़े 
8. उपभोक्ता वाद
9. वित्तीय एवं लेन-देन के विवाद
(ब) दांडिक प्रकरण (सभी राजीनामा योग्य अपराध के मामले तथा 1- 498 ए आई पी सी 2- 138 निगोशिएबल इन्सटूमेन्ट एक्ट (चेक बाउंस से संबंधित)
 राजस्व प्रकरण
(5) मध्यस्थता का लाभ कैसे प्राप्त करें:- मध्यस्थता हेतु आवेदन जिस न्यायालय में मामला लंबित हो, वहां प्रस्तुत करें।

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149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी