Monday, 31 October 2016

छत्तीसगढ़ लोक सेवा गारंटी अधिनियम, 2011

छ.ग. लोक सेवा गारंटी अधिनियम वर्ष 2011 से छत्तीसगढ़ राज्य में लागू किया गया है। जिसे छ.ग.शासन के कार्यों के संबंध में किन्ही सिविल सेवाओं अथवा पदों पर नियुक्त व्यक्तियों, स्थानीय निकायों, लोक प्राधिकारियों या अभिकरणों जो शासन के स्वामित्व, नियंत्रण में हैं या सारवान् रूप से वित्तीय सहायता प्राप्त हैं, उन पर लागू किया गया है।
स्थानीय निकाय से आशय है कि कोई प्राधिकारी, नगर पालिका, पंचायत या कोई अन्य निकाय जिसे किसी भी नाम से जाना जाता हो, जिसे छ.ग. राज्य के भीतर लोक सेवा प्रदान किये जाने के लिए निहित किया गया है या जो उसके स्थानीय सेवा में ऐसी सेवाओं का नियंत्रण, प्रबंधन या विनियमन करता हो।
नियत समय में लोक सेवा प्राप्त करने का अधिकार
प्रत्येक व्यक्ति को इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर यथा अधिसूचित नियत समय के भीतर छ0ग0 राज्य में लोक सेवा प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। नियत समय में लोक सेवा प्रदाय करने का दायित्व, परिव्यय का अधिरोपन, वसूली एवं भुगतान  
1. प्रत्येक विभाग इस अधिनियम के प्रारंभ होने के तिथि से लोक सेवा प्रदान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति के पद को नामित किया जायेगा (पदाविहीत) तथा ऐसे तथ्य को सर्वसाधारण की जानकारी के लिए विभाग के किसी सहज दृश्य स्थान पर प्रदर्शित किया जायेगा।
2. उत्तरदायी व्यक्ति आवेदन प्राप्त होने पर आवेदक को एक अभिस्वीकृति देगा। आवेदक अपने आवेदन के संबंध में क्या कार्यवाही हुई, जानने का हकदार होगा।
3. लोक सेवा प्रदाय करने वाला उत्तरदायी प्रत्येक व्यक्ति निश्चित समय के भीतर सेवा प्रदान करने में असफल रहता है तो विलंब की अवधि के लिए 100/-रू. की दर से प्रत्येक दिन के लिए अधिकतम 1000/-रू. परिव्यय भुगतान करने का दायी होगा। यदि उत्तरदायी व्यक्ति आवेदक को सेवा प्रदान करने में असफल रहा तो उक्त राशि आवेदक को दिलाये जाने हेतु उत्तरदायी व्यक्ति से वसूली योग्य होगा।
सक्षम अधिकारी की नियुक्ति
प्रत्येक विभाग इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए एक या एक से अधिक व्यक्तियों को सक्षम अधिकारी के रूप में अधिसूचित करेगा जो लोक सेवा प्रदाय करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति की श्रेणी से निम्न का न हो।
लोक सेवा प्राप्त करने हेतु असत्य जानकारी प्रस्तुत करने पर दायित्व
कोई व्यक्ति लोक सेवा प्राप्त करने के लिए ऐसा आवेदन नहीं देगा जिसमें ऐसा तथ्य या जानकारी अंतर्विष्ट हो जिसे वह जानता है या विश्वास करने का कारण है कि वह असत्य है तथा वह जो ऐसा तथ्य या जानकारी प्रस्तुत करता है, उसम समय प्रवृत्त विधि के अधीन आपराधिक कार्यवाही के लिए दायी हो सकेगा।
अपील का अधिकार
कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन सक्षम अधिकारी द्वारा पारित आदेश से व्यथित हो आदेश की प्राप्ति से 30 दिवस के भीतर अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील प्रस्तुत कर सकता है।
अपीलीय अधिकारी अपील संस्थित होने के दिनांक से 45 दिवस की अधिकतम अवधि के भीतर अपील निराकृत करेगा, अपीलीय प्राधिकारी का आदेश अंतिम एवं बाध्यकारी होगा।

झगड़ों को कैसे रोकें

(दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत प्रतिबंधात्मक उपाय)
झगड़ों को कैसे रोकें ?
कभी-कभी छोटी-सी बात के लिए लोग आपस में झगड़ने लगते हैं और यह झगड़ा विकराल रूप धारण कर लेता है, जो अप्रिय घटना को निमंत्रित कर लेता है। इसलिए चिंगारी भीषण आग का रूप न ले, उसे वहीं दबा देना लाभकारी होता है। अतः झगड़ों को रोकने दंड प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.) की विभिन्न धाराओं की व्यवस्था की गई है। जैसे जब किसी व्यक्ति के द्वारा लोक शांति भंग करने का कार्य किया जाता है अथवा इसकी संभावना व्यक्त की जाती है तो उसके विरूद्ध धारा 107/116 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट के सामने कार्यवाही कर उसे शांति कायम करने हेतु एवं सदाचार बनाए रखने के लिए जमानत सहित वचनबद्ध किया जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति के द्वारा किसी स्थान या मार्ग में बाधा उत्पन्न किया जाता है, जिसके गंभीर परिणाम होने की संभावना व्यक्त की जाती है तो ऐसी स्थिति में सी.आर.पी.सी. की धारा 133 एवं 144 के तहत यह व्यवस्था की गई है, जिससे झगड़ा शुरू होने से पहले रोका जा सके एवं न्यूसेंस को हटाने की व्यवस्था की जाती है। इसी प्रकार जमीन जायदाद के जबरन कब्जे को लेकर उत्पन्न विवाद को शांत करने के लिए सी.आर.पी.सी. की धारा 145 का प्रावधान है। झगड़ों को रोकने के लिए सी.आर.पी.सी. की मुख्य धाराएं 107/116, 133, 144 एवं 145 है।
दंड प्रक्रिया संहिता (सी.आर.पी.सी.) की धारा 107/116 धारा 107:- यदि किसी व्यक्ति के विरूद्ध परिशांति भंग करने की संभावना व्यक्त करते हुए कार्यपालक मजिस्ट्रेट को सूचना दी जाती है तो सी.आर.पी.सी. की धारा 107 के तहत कार्यवाही की जाती हैं
कार्यपालक
यदि किसी व्यक्ति के विरूद्ध परिशांति भंग करने की संभावना व्यक्त करते हुए कार्यपालक मजिस्ट्रेट को सूचना दी जाती है तो सी.आर.पी.सी. की धारा 107 के तहत कार्यवाही की जाती है।
कार्यपालक मजिस्ट्रेट परिशांति भंग करने वाले व्यक्ति के विरूद्ध पर्याप्त आधार मिलने पर उसे नोटिस भेजकर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कहता है कि उसे शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्यों नहीं उपबंधित किया जाए। इस धारा के तहत कार्यवाही कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष तब तक चलती है, जब तक शांति व्यवस्था बहाल न हो जाए। यदि व्यक्ति झगड़ालू चरित्र का है और उसके व्यवहार से शांति भंग होने की संभावना है तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट के द्वारा उसे जमानत सहित बंधपत्र भरवाकर एक वर्ष की अवधि तक अपने व्यवहार को ठीक रखकर शांति भंग नहीं करने के लिए पाबंद किया जाता है।
धारा 107 के अंतर्गत प्रार्थना पत्र दाखिल करना -
शांति भंग करने वाले व्यक्ति के विरूद्ध सी.आर.पी.सी. की धारा 107 के तहत दाखिल किया जाता है। प्रार्थना पत्र में लोक शांति भंग करने वाले व्यक्ति के झगड़ालू चरित्र होने का प्रमाण भी देना होता है, जिसके आधार पर मजिस्ट्रेट द्वारा उक्त व्यक्ति को नोटिस जारी किया जाता है, वह कारण पेश करे कि उन्हें शांति भंग करने की संभावना के आरोप में क्यों न उपबंधित किया जाए। 
जब एस.डी.एम. को धारा 107 के अंतर्गत कार्यवाही करने की गुहार करते हुए प्रार्थना पत्र प्राप्त होता है तो मजिस्ट्रेट धारा 111 के अंतर्गत कार्यवाही शुरू करते हुए उस व्यक्ति को जिसके विरूद्ध आरोप दाखिल किया गया है, कारण पेश करने हेतु नोटिस जारी करता है। धारा-111 के अंतर्गत शांति भंग करने वाले व्यक्ति को कारण पेश करने के लिए धारा-114 के अंतर्गत सम्मन या वारंट के माध्यम से भी नोटिस तामिल किया जा सकता है। वारंट जारी करने पर उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया जाता है। तब इसकी जांच धारा 116 के अंतर्गत जांचः धारा-107 की कार्यवाही शुरू करते हुए धारा-116 के अंतर्गत शांतिभंग करने संबंधी साक्ष्य लेखबद्ध किया जाता है तथा इसकी कार्यवाही छः माह के अंदर पूरी करने का प्रयास किया जाता
है, क्योंकि छः महीने पूरे हो जाने पर यह कार्यवाही स्वतः समाप्त हो जाती है।
धारा-107 के तहत जमानत दाखिल करना
धारा-116 के अंतर्गत जांच पूरी होने के बाद उक्त शांति भंग करने वाले व्यक्ति को शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए धारा-117 के अंतर्गत आदेश दिया जाता है कि वह बंध पत्र एवं जमानत के साथ एक वर्ष तक शांति बनाए रखे।
धारा-107/117 की कार्यवाही का एक दृष्टांत:-
यदि कोई व्यक्ति ’क’ अपने पड़ोसी ’ख’ की शांति भंग करता है तथा समझाने पर भी नहीं मानता है तो ’क’ विरूद्ध परिशांति भंग करने के एवं शांति कायम करने की गुहार करते हुए ’ख’ एस.डी.एम. के न्यायालय में प्रार्थना पत्र दाखिल करता है। जिसे धारा 107 की कार्यवाही करने हेतु ’क’ के विरूद्ध पर्याप्त सबूत भी उपलब्ध कराया जाता है। प्रार्थना पत्र का अवलोकन कर उससे संतुष्ट होकर एस.डी.एम. धारा-111 के तहत ’ख’ को नोटिस जारी करता है। यदि नोटिस की तामिल सम्मन या गिरफ्तारी शांति कायम करने के हित में हो, गिरफ्तारी वारंट किया जा सकता है अन्यथा नहीं। इसके बाद धारा 116 के तहत कार्यवाही शुरू की जाती है। कार्यवाही पूरी होने पर यदि ’ख’ के विरूद्ध शांति भंग करने की संभावना सही साबित होती है तो धारा-117 सी.आर.पीसी. के अंतर्गत एक वर्ष या एक निश्चित अवधि के लिए ’ख’ से शांति कायम रखने हेतु बंध पत्र जमानत ली जाती है।
चोरी जैसे अपराध को रोकने संदेहास्पद व्यक्ति पर जमानत द्वारा पाबंदी रखना -
जिस व्यक्ति पर यह आशंका हो कि वह चोरी जैसे अपराध को अंजाम दे सकता है, उस पर पाबंदी लगाने के लिए धारा-109 और नंबरी बदमाशों के लिए धारा-110 के तहत उनके विरूद्ध पुलिस द्वारा रिपोर्ट पेश की जाती है, जिस पर एस.डी.एम. द्वारा धारा-107 की कार्यवाही की तरह पूरी कार्यवाही के बाद धारा-11 के तहत जमानत दाखिल करने का आदेश जारी किया जाता हैं
सार्वजनिक मार्ग में रूकावट, सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा एवं दूसरे प्रकार के लोक न्यूसेंस का निवारण:-
जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक मार्ग में रूकावट डालता है अथवा सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा पहुंचाता है या दूसरे प्रकार का लोक न्यूसेंस पैदा करता है तो इसके निवारण के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-133 की व्यवस्था की गई है। इस धारा के तहत न्यूसेंस हटाने के सशर्त आदेश इस प्रकार हैंः-
(क) किसी सार्वजनिक स्थान या मार्ग, नदी या जलखंड से जो जनता द्वारा उपयोग में लायी जा सकती है, कोई विधि विरूद्ध बाधा या न्यूसेंस हटाया जाना चाहिए।
(ख) किसी व्यापार या उपजीविका को चलाना या माल या व्यापारिक वस्तु को रखना समाज के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। उसे रखना निषिद्ध किया जाना चाहिए।
(ग) किसी भवन निर्माण या किसी विस्फोटक का व्ययन जिससे खतरा पैदा हो सके तो उसे बंद कर दिया जाना चाहिए।
(घ) कोई मकान या संरचना या वृक्ष इस दशा में हो कि उसके गिरने से पड़ोसी को क्षति की संभावना हो तो उसकी मरम्मत या उसे हटाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(ड.) किसी मार्ग या सार्वजनिक स्थान के पास स्थित तालाब, कुएं या खड्डे जिससे जनता को खतरा होने की संभावना हो, उसमें बाड़ लगाना चाहिए, ताकि खतरे का निवारण हो।
(च) किसी भयानक जंतु से लोक स्वास्थ्य को खतरा हो तो उसे नष्ट या व्ययन किया जाना चाहिए। उपरोक्त दशाओं से संबंधित व्यक्ति से सशर्त आदेश द्वारा खतरे के निवारण की अपेक्षा की जाती है। यदि संबंधित व्यक्ति को किसी आदेश को मानने में कोई आपत्ति है तो वह कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होकर आपत्ति के कारण उपबंधित प्रकार से उपस्थित करें।
नोट - सार्वजनिक स्थान के अंतर्गत राज्य की संपत्ति, पड़ाव के मैदान और स्वच्छता या आमोद-प्रमोद के लिए खाली छोड़े गए मैदान भी हैं।
लोक न्यूसेंस हटाने की प्रक्रिया -
किसी व्यक्ति के द्वारा सार्वजनिक रास्ते या स्थान में रूकावट डाला जाता है अथवा लोक स्वास्थ्य को खतरा पैदा किया जाता है अथवा अन्य प्रकार का लोक न्यूसेंस पैदा किया जाता है तो उसके विरूद्ध धारा-133 के तहत एस0डी0एम0 के न्यायालय में प्रार्थना पत्र के द्वारा किया जाता है जिस पर न्यायालय द्वारा उक्त न्यूसेंस को हटाने का आदेश दिया जाता है। यदि संबंधित व्यक्ति को आदेश मानने से आपत्ति है तो वह अपनी आपत्ति का कारण न्यायालय में उपस्थित होकर दिखाता है। ऐसा नहीं करने पर भा.दं.वि. की धारा धारा 188 के अंतर्गत न्यायालय के आदेश की अवहेलना के अपराध के लिए व्यक्ति के लिए विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है। जब उक्त व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित होकर पब्लिक रास्ता होने से इंकार करता है तो न्यायालय द्वारा
रूकावट हटाने के लिए धारा-136 के तहत आदेश जारी किया जाता है।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-144 के अंतर्गत रूकावट हटाने की व्यवस्था -
दं.प्र.सं. की धारा-144 के तहत अविलम्ब रूकावट हटाने के आदेश जारी करने की व्यवस्था है।
1- इस धारा के तहत उन मामलों में रूकावट तुरंत हटाने का आदेश जारी किया जाता है, जिनमें जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट की राय में कार्यवाही करने हेतु पर्याप्त आधार हो तथा रूकावट तुरंत हटाना वांछनीय हो।
2- इस धारा के तहत आपात की दशाओं में या उन दशाओं में जब परिस्थितियों में ऐसी है कि उस व्यक्ति पर जिसके विरूद्ध आदेश निर्दिष्ट है, सूचना की तामील सम्यक् समय में करने की गुंजाइश न हो, एकपक्षीय रूप में आदेश पारित किया जा सकता है।
3- इस धारा के तहत किसी विशिष्ट व्यक्ति को या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों को अथवा आम जनता को, जब वे किसी विशेष स्थान क्षेत्र में जाते हैं, या जाएं निषिद्ध किया जा सकता है।
4- इस धारा के तहत कोई आदेश उस आदेश के दिए जाने की तारीख से दो माह से आगे प्रवृत्त नहीं रहेगा, किंतु यदि राज्य सरकार मानव जीवन या स्वास्थ्य को होने वाले खतरे का निवारण या किसी बलवे या दंगे का निवारण करने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है तो अधिक से अधिक महीने की अतिरिक्त अवधि के लिए उक्त आदेश प्रभावी हो सकता है।
5- कोई मजिस्ट्रेट स्वप्रेरणा से या किसी व्यक्ति के आवेदन पर इस आदेश को परिवर्तित कर सकता है, जो स्वयं उसने या उसके पूर्ववर्ती या अधीनस्थ ने धारा-144 के तहत जारी किया है।
6- राज्य सरकार उपधारा-4 के परंतु-क, के अधीन अपने द्वारा किए गए आदेश को या तो स्वप्रेरणा से या किसी व्यक्ति के आवेदन पर परिवर्तित कर सकती है।
7- जहां उपधारा-5 या उपधारा-6 के अधीन आवेदन प्राप्त होता है, वहां यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार आवेदक का या स्वयं या वकील के द्वारा उसके समक्ष उपस्थित, मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार आवेदक का या तो स्वयं या वकील के द्वारा उसके समक्ष उपस्थित होने और आदेश के विरूद्ध कारण दर्शित करने पर उसके कारणों को लेखबद्ध किया जाता है।
अचल संपत्ति को लेकर उत्पन्न विवाद के निवारण हेतु धारा-145 
जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला द्वारा यह उल्लेख किया जाता है कि उसकी संपत्ति की स्थानीय अधिकारिता के अंदर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं से संबद्ध ऐसा विवाद विद्यमान है, जिससे परिशांति भंग होने की संभावना है। न्यायालय द्वारा धारा-145 की कार्यवाही कर झगड़े का निवारण किया जाता है। इस धारा के प्रयोजनों के लिए भूमि या जल पद के अंतर्गत भवन, बाजार, मछली का क्षेत्र, फसलें भूमि की अन्य उपज आम है।
धारा-145 के अंतर्गत की जाने वाली कार्यवाही:-
जब कोई व्यक्ति किसी अचल संपत्ति के कब्जे को हटाने का प्रयास करता है और इस प्रकार की शांति भंग होती है तो ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध अशांति को रोकने और कब्जे में किसी प्रकार की गड़बड़ी करने से रोकने के लिए एस.डी.एम. के पास द.प्र.सं. की धारा 145 के अंतर्गत प्रार्थना पत्र देकर कार्यवाही की जा सकती है। एस.डी.एम. द्वारा इस धारा के अंतर्गत दाखिल प्रार्थना पत्र की जांच रिपोर्ट से पुष्टि होने पर एस.डी.एम. दोनों पक्षों को नोटिस भेजते हैं कि वे न्यायालय में उपस्थित होकर अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत करें। दोनों पक्षों का साक्ष्य लेने के बाद न्यायालय यह मत व्यक्त करता है कि अचल संपत्ति पर झगड़े की तिथि तथा उसे दो माह पहले से किस पक्षकार का कब्जा था और इस तरह कब्जे को उस व्यक्ति का कायम रखते हुए ऐसा आदेश पारित किया जाता
है कि झगड़े को लेकर शांति भंग होने की संभावना व्यक्त की गई थी, उसका निवारण हो सके।
कोई भी झगड़ा अपराध का रूप न धारण कर ले, उससे पहले उसका निवारण आवश्यक है। झगड़ों के निवारण हेतु उपरोक्त धाराओं के तहत एस.डी.एम. के पास प्रार्थना पत्र दिया जा सकता है।

अंतर्राज्यिक प्रवासी श्रमिक (नियोजन तथा सेवा परिस्थितियों का विनियमन) अधिनियम, 1979

अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाएं -
1- अंतर्राज्यिक प्रवासी श्रमिक - हर वह व्यक्ति जो एक ठेकेदार द्वारा भर्ती किया जाता है और, और किसी एक राज्य से दूसरे राज्य में कार्य करने के लिए किसी कारखाने में या किसी व्यवस्था के अंतर्गत किसी जगह में चाहे नियोजक की जानकारी से हो या बिना जानकारी के, अंतर्राज्यिक प्रवासी श्रमिक कहलाया जाएगा।
2- प्रतिष्ठान का पंजीकरण आवश्यक है - ऐसे प्रतिष्ठान जिन पर यह अधिनियम लागू होता है, उनका पंजीकरण करवाना अनिवार्य है।
3- ठेकेदारों को अनुज्ञप्ति (लाइसेंस) - केवल वह ठेकेदार जिनको लाइसेंस जारी हुआ है, प्रवासी श्रमिकों की भर्ती कर सकते हैं, इसके अलावा कोई दूसरा व्यक्ति श्रमिकों की भर्ती नहीं कर सकता।
ठेकेदारों के कर्तव्य -
1- ठेकेदार प्रवासी श्रमिकों के बारे में वह सभी जानकारियां जो निश्चित की गई हों, दोनों राज्य की सरकारों को, अर्थात् जिस राज्य से वे आए हैं और जिस राज्य में का कर रहे हैं, काम पर लगाए जाने के पंद्रह दिनों के अंदर देगा।
2- ठेकेदार सभी प्रवासी श्रमिकों को एक पासबुक, जारी करेगा, जिसमें उस श्रमिक की एक फोटो लगी होगी तथा हिंदी और अंग्रेजी या उस भाषा में जो मजदूर जानता हो, निम्न सूचना भी दी जाएगी -
  • कार्य का नाम और जगह का नाम जहां काम हो रहा हो।
  • नियोजन की अवधि।
  • दी जाने वाली मजदूरी की दर एवं मजदूरी देने का तरीका।
  • विस्थापन भत्ता, वापसी का किराया जो कि मजदूरी को दिया जाता है तथा कटौती आदि के बारे में जानकारी।

प्रवासी श्रमिकों के अधिकार -
वेतन एवं कार्य की शर्तें -
प्रवासी श्रमिक की मजदूरी दर, छुट्टियां, काम करने का समय एवं अन्य सेवा शर्ते, वहां पर काम करने वाले अन्य मजदूरों के समान होंगी। प्रवासी श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी अधिनियम में बताई गई मजदूरी से कम मजदूरी नहीं दी जाएगी। सामान्य तौर पर प्रवासी श्रमिकों को मजदूरी नगद रूप में दी जाएगी।
विस्थापन भत्ता - भर्ती के समय ठेकेदार प्रवासी श्रमिकों को विस्थापन भत्ता जो उसके एक महीने के वेतन का पचास प्रतिशत या 75/- रूपये इनमें जो भी ज्यादा होगा, देना होगा। और यह भत्ता उसे उसकी मजदूरी के अलावा मिलेगा।
यात्रा भत्ता - ठेकेदार प्रवासी श्रमिकों को उनके गृह राज्य के निवास स्थान से काम करने की जगह तक आने व जाने के लिए यात्रा भत्ता भी प्रदान करेगा, जो उसकी मजदूरी के अलावा दिया जाएगा। यात्रा के दौरान मजदूर को काम पर समझा जाएगा।
सुविधाएं - इस अधिनियम के अंतर्गत कुछ सुविधाएं ठेकेदार के द्वारा मजदूर को देनी होंगी, जैसे 1. मजदूरी का नियमित भुगतान। 2. पुरूष और महिला को समान वेतन।
3. कार्य स्थल पर अच्छी सुविधाएं।
4 कार्य के दौरान मजदूरों के रहने की व्यवस्था करना।
5. मुफ्त चिकित्सीय सुविधाएं। 6. सुरक्षात्मक कपड़ों को उपलब्ध कराना।
7. किसी प्रकार की कोई दुर्घटना होने पर उसके सगे-संबंधियों एवं दोनों राज्यें के संबंधित अधिकारियों को सूचना देगी।
यदि ठेकेदार द्वारा यह जिम्मेदारी पूरी नहीं की जाती है तो प्रधान नियोजक पूरी व्यवस्था करेगा।
वेतन की जिम्मेदारी - ठेकेदार की जिम्मेदारी है कि प्रत्येक प्रवासी श्रमिक को नियत समय में वेतन दें। इसके साथ-साथ प्रधान नियोजक भी इसकी देख-रेख के लिए किसी व्यक्ति को नामित करेगा जो कि यह प्रमाणित करेगा कि मजदूर को जितना वेतन मिलना चाहिए उतना मिला है या नहीं। ठेकेदार इस नामित व्यक्ति के सामने वेतन बांटेगा यदि ठेकेदार वेतन नहीं देता है तो प्रधान नियोजक उनको वेतन देने के लिए जिम्मेदार होगा। अगर इस अधिनियम के अंतर्गत दी जाने वाली सुविधाएं नहीं दी जाती है, तो सुविधाओं के बदले भत्ता देना होगा।
निरीक्षक - सरकार इस अधिनियम के अंतर्गत निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकती है, जो किसी भी समय किसी भी कार्य स्थान जहां प्रवासी श्रमिक काम करते हों, प्रवेश कर सकता है, कोई भी रिकार्ड मंगवा अथवा देख सकता है, किसी भी श्रमिक से पूछताछ कर सकता है।
उल्लंघन पर सजा एवं दण्ड - यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम का उल्लंघन करता है तो उसे एक वर्ष तक की जेल या 1000/- रूपये तक का जुर्माना या दोनों भी हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति दोबारा ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है, तो उसे 100/- रूपये का जुर्माना रोज देना होगा, जब तक वह उल्लंघन करता है।
यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के ऐसे नियमों का उल्लंघन करता है, जिसके लिए इस अधिनियम में कोई दंड या प्रावधान नहीं है तो वह अधिकतम दो साल की जेल या 2000/- रूपये के जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
शिकायत दर्ज करने की समय सीमा:- इस अधिनियम के अंतर्गत शिकायत अपराध घटित होने के दिन से तीन महीने के अंदर दर्ज करवा सकते हैं।

कानून को जानें व समझें

1. हिन्दू दत्तक एवं भरण-पोषण कानून में यह प्रावधान है कि कोई भी हिन्दू चाहे पुरूष हो या स्त्री, उनका दायित्व होगा कि वे अपने अन्य रिश्तेदारों के अतिरिक्त अपने संतान व वृद्ध माता-पिता की परवरिश करेंगे, जिसमें सौतेली मां भी परवरिश पाने की अधिकारिणी है। ऐसा न करने पर उनके विरूद्ध दीवानी अदालत में आवेदन दिया जा सकता है, जिसके लिए निःशुल्क विधिक सहायता प्रदान करने का भी प्रावधान है।
2. हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण कानूनों के तहत विवाहित पत्नी, पति की मृत्यु के पश्चात अपने ससुर से भरण-पोषण पाने की हकदार होती है, बशर्ते उसके पास आय का कोई साधन न हो।
3. शासन की शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना, राष्ट्रीय परिवार सहायता योजना, निःशक्त जन छात्रवृत्ति योजना चलायी जाती है, जिसकी सम्पूर्ण जानकारी नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत तथा ग्राम पंचायत से प्राप्त कर उसका सम्पूर्ण लाभ नागरिक प्राप्त कर सकता है।
4. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका क्रमांक-173, 177/99 में दिनांक 17.10.2006 को पारित आदेश के अनुसार राज्य शासन के महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा महिला उत्पीड़न मामले की सतत निगरानी करने, महिला अत्याचार के विरूद्ध कारगर कार्यवाही कर पीड़ित महिलाओं को समुचित मार्गदर्शन एवं सहायता दिलाने के लिये प्रत्येक जिले में महिला उत्पीड़न निवारण समिति का गठन करना आवश्यक किया गया है।
5. राज्य शासन द्वारा समेकित बाल विकास सेवा योजना, पोषण आहार कार्यक्रम, किशोरी शक्ति योजना, स्वयंसुधा, एकीकृत महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम, आयुष्मती योजना, बालिका समृद्धि योजना, दत्तक पुत्री शिक्षा योजना, महिला जागृति शिविर, महिला कोष्ठ की़ ऋण योजना, महिला सशक्तीकरण मिशन, स्व-शक्ति परियोजना कार्यक्रम महिला एवं बाल कल्याण हेतु दिलाया जाता है। इसके साथ ही नारी निकेतन, बाल संरक्षण गृह, शासकीय झूला घर, मातृ कुटीर, बालवाड़ी सह संस्कार केन्द्र भी संचालित होते हैं। इन सारी योजनाओं के संबंध में जिला महिला बाल विकास अधिकारी, बाल विकास परियोजना अधिकारी, पर्यवेक्षक, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
6. यदि आपके द्वारा लिखा गया चैक, बैंक द्वारा बिना भुगतान किये इस कारण वापस लौटा दिया जाता है कि आपके खाते में भुगतान हेतु पर्याप्त धनराशि नहीं है या उस रकम से अधिक है, जिसका बैंक के साथ किये गये करार के द्वारा उस खाते में से संदाय करने का ठहराव किया गया है तो आपका यही कृत्य चैक के प्रति अनादरण तथा अपेक्षापूर्ण कृत्य होगा, जो धारा 138 चैकों का अनादरण अधिनियम के अंतर्गत दण्डनीय अपराध है।
7. किसी भी नागरिक को उसके धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर किसी दुकान, भोजनालय, होटल, मनोरंजन स्थान, कुआं, तालाब, घाट, स्नान घाट, सड़क पर प्रवेश करने या आने-जाने से नहीं रोका जा सकता है। उसे रोकना उसके मौलिक अधिकारों का हनन है।
8. जहां किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के अभिभावक की ईच्छा है कि उस मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को मनोचिकित्सालय में चिकित्सा हेतु भर्ती करवाया जावे, वहां वह प्रभारी स्वास्थ्य अधिकारी से उस संबंध में निवेदन कर सकता है। उस मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति के देखभाल का समस्त खर्च शासन को वहन करना पड़ेगा। इसके अलावा प्रत्येक पुलिस थाने के प्रभारी अधिकारी, जिनके थाने की सीमाओं में स्वच्छंद विचरण करते हुये मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति दिखता है तो उसे अपने संरक्षण में लेकर दो घण्टे के अंदर निकटतम मजिस्टेªट के समक्ष प्रस्तुत करना उसका कानूनी दायित्व बताया गया है।
9. जिला उपभोक्ता फोरम, जिसका कार्यालय कलेक्टेªट परिसर में स्थित है, वहां पर कोई भी उपभोक्ता, जिसने उपभोग हेतु सामग्री क्रय की है और उसकी कीमत चुकायी है और उसके पास उस सामग्री को क्रय करने की रसीद है तो वह सामग्री के खराब होने, आशा से कम प्रकृति की होने, गुण या महत्व का कम होने, सामग्री के हानिकारक होने, गंदी या रोगयुक्त होने, सही पैकिंग न होने, अस्वच्छ अवस्था में तैयार होने, विष या कोई हानिकारक वस्तु के मिले होने, जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक हो, जिस डिब्बा में रखी गई हो वह डिब्बा स्वास्थ्य के लिये हानिकारक व जहरीला हो, मिठाई में मिलाया गया रंग या अनुमति से अधिक मात्रा में मिलाया गया रंग, पदार्थ के गुण, महत्व व शुद्धता तय मानक से कम हो, तो उसकी शिकायत सादे आवेदन में पूर्ण विवरण सहित कर सकता है।
इसके अलावा खाद्य पदार्थ को गलत नाम देकर बेचे जाने, अगर उसका नाम किसी दूसरे पदार्थ से ऐसे मेल खाता हो कि ग्राहक धोखा खा जाय, अगर झूठ बोलकर उस पदार्थ को विदेशी बताया गया हो, अगर वह किसी और पदार्थ के नाम से बेचा जाय, अगर उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव करके उसे ज्यादा मूल्य का बताया जाय, अगर उसके पैकिंग के अंदर विवरण न दिया गया हो या गलत विवरण दिया गया हो अथवा लेबल झूठी
कम्पनी बताता हो, अगर वह पोषक आहार के रूप में बनाया गया हो और उसका लेबल उसमें प्रयोग की गई सामग्रियों के बारे में न बताता हो, अगर उसमें कोई भी बनावटी रंग, खुशबू या स्वाद का प्रयोग हुआ हो, जिसके बारे में लेबल पर न लिखा गया हो, अगर उसका लेबल उपभोक्ता संरक्षण नियम, 1986 के बनाये गये नियमों के अनुसार न हो, तो उसकी लिखित शिकायत जिला उपभोक्ता फोरम में पेश कर संबंधित व्यापारी व कम्पनी
को दण्डित कराया जा सकता है।
10. किसी सामान्य जाति का व्यक्ति अगर किसी अनुसूचित जाति या जनजाति वर्ग के व्यक्ति को जातिगत आधार पर उसके साथ छुआछूत के तहत तथा अन्य घिनौने कृत्य अथवा उत्पीड़ित किया जाता है तो उसका कृत्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (उत्पीड़न एवं छुआछूत निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों के तहत दण्डनीय अपराध है।
11. रिश्वत लेना ही नहीं, बल्कि रिश्वत देना भी दण्डनीय अपराध है। यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक को रिश्वत देता है या लोक सेवक को भ्रष्ट आचरण या अवैध साधनों द्वारा पदेन कृत्य अनुग्रह करने के लिये उत्प्रेरित करता है तो ऐसी रिश्वत देकर लोक सेवक को गुमराह करने वाले व्यक्तियों को कानून के तहत 5 वर्ष के लिये कारावास से दण्डित किये जाने का प्रावधान है।
12. लोक सेवक के अंतर्गत शासकीय सेवक के अलावा ऐसे सभी व्यक्ति आते हैं जो शासन के किसी पद पर आसीन हैं जिसके आधार पर वे किसी लोक कर्तव्य का पालन करने के लिए प्राधिकृत हैं, जैसे गांव का प्रधान, एम.एल.ए., एम.पी., न्यायालय द्वारा नियुक्त सरकारी वकील भी लोक सेवक है। भ्रष्टाचार का मतलब घूस या रिश्वत लेना अथवा उसके पदीय कृत्य के पालन के साथ परितोषण या ईनाम, अपने पदेन कार्य में अपने पदीय कर्तव्यों के प्रयोग में अनुग्रह दिखाने के लिये, यदि कोई लोक सेवक प्राप्त करता है तो वह पद का दुरूपयोग करता है, जिसके लिए दण्ड का प्रावधान कानून में किया गया है।
13. भारत सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत प्रत्येक गांव के वयस्क व्यक्तियों को प्रति वर्ष 100 दिन का रोजगार प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों में निवास कर रहे वयस्क व्यक्ति, अकुशल व्यक्ति, जो शारीरिक कार्य करने हेतु इच्छुक हो, उसे ग्राम पंचायत में अपना नाम, पता व उम्र लिखाकर पंजीयन कराना होगा, जो 5 वर्ष के लिये मान्य होगा। उसे पंचायत द्वारा एक फोटोयुक्त जाब कार्ड जारी किया जायेगा। काम करने के लिये उसे ग्राम पंचायत या कार्यक्रम अधिकारी को कम से कम 14 दिनों तक लगातार काम करने हेतु आवेदन देना होगा, जिसकी प्राप्ति के 15 दिनों के अंदर ही उसे रोजगार प्राप्त होगा। ग्राम पंचायत के सूचना पटल तथा कार्यक्रम अधिकारी के कार्यालय पर सूचना टांगी जायेगी, जिसमें काम करने वाले व्यक्ति का नाम, काम का स्थान और काम के लिये कब से जाना है, से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी रहेगी।
महिलाओं को रोजगार प्रदान करने में प्राथमिकता रहेगी और कम से कम एक तिहाई संख्या में महिलायें वहां रोजगार पर रहेंगी। मजदूरी कम से कम 75/-रूपये प्रतिदिन की रहेगी। उसका भुगतान साप्ताहिक होगा। अधिकतम 15 दिनों में भुगतान निश्चित करना होगा। मजदूरी का भुगतान नगद या किसी वस्तु के रूप में होगा। फिर भी एक चौथाई भुगतान नगद के रूप में होगा। काम के समय दुर्घटना की स्थिति में मुफ्त ईलाज का
प्रावधान है। श्रमिक का बैंक या पोस्ट ऑफिस में खाता खोलकर मजदूरी की राशि उसमें जमा कराये जाने का भी प्रावधान है।
14. सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक किसी भी लोक निकाय के दैनिक क्रियाकलापों के संबंध में आवश्यक सूचना प्राप्त कर सकता है। वह निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर सकता है। लोक अधिकारी के पास मौजूद दस्तावेजों और अभिलेखों का निरीक्षण कर सकता है और उनकी प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त कर सकता है।
विकास कार्यों या योजनाओं के निर्माण में लगायी गयी सामग्री के प्रमाणित नमूने ले सकता है। डिस्केट, फ्लापी, टेप, वीडियो कैसेट के रूप में या अन्य किसी इलेक्ट्रानिक रूप से भंडारित की गई सूचनाओं को भी प्राप्त कर सकता है। संबंधित सूचनायें वह उस विभाग के लोक सूचना अधिकारी, सहायक लोक सूचना अधिकारी के समक्ष हिन्दी अथवा अंग्रेजी में आवेदन लिखकर आवश्यक विवरण देकर 10/-रूपये नगद/चालान (जो मुख्य
शीर्ष-0070-उपमुख्य शीर्ष 800-अन्य प्राप्तियों में लोक प्राधिकारी के नाम देय हो) मनीआर्डर, ज्युडिसियल स्टाम्प देकर 10 दिवस के अंदर प्राप्त कर सकता है, अन्यथा अपीलीय अधिकारी के पास 10 दिवस में आवेदन दे सकता है। उसके आदेश से संतुष्टि न हो तो द्वितीय अपील 90 दिन के अंदर राज्य सूचना आयोग, मुख्यालय रायपुर में भी कर सकता है। गरीबी रेखा के नीचे के व्यक्ति को कोई भी फीस नहीं लगती है। समय-समय पर सूचना न देने पर, आवेदन लेने से इंकार करने पर, असद्भावपूर्वक सूचना देने पर, इंकार करने पर, गलत या अपूर्ण या गुमराह करने वाली सूचना देने, सूचना को नष्ट करने पर, आर्थिक दण्ड का प्रावधान है।

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149 IPC 295 (a) IPC 302 IPC 304 IPC 354 (3) IPC 376 भा.द.सं. 399 IPC. 201 IPC 402 IPC 428 IPC 437 IPC 498 (a) IPC 66 IT Act Abhishek Vaishnav Ajay Sahu Arun Thakur Bail CGPSC Chaman Lal Sinha Civil Appeal D.K.Vaidya Dallirajhara H.K.Tiwari HIGH COURT OF CHHATTISGARH POCSO Ravi Sharma Ravindra Singh Ravishankar Singh SC Shayara Bano Temporary injunction Varsha Dongre अनिल पिल्लई आदेश-41 नियम-01 आनंद प्रकाश दीक्षित आयुध अधिनियम ऋषि कुमार बर्मन एस.के.फरहान एस.के.शर्मा कु.संघपुष्पा भतपहरी छ.ग.टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम छत्‍तीसगढ़ राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकरण जितेन्द्र कुमार जैन डी.एस.राजपूत दंतेवाड़ा दुर्ग न्‍यायालय नीलम चंद सांखला पंकज कुमार जैन पी. रविन्दर बाबू प्रशान्त बाजपेयी बृजेन्द्र कुमार शास्त्री भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम मुकेश गुप्ता मोटर दुर्घटना दावा राजेश श्रीवास्तव रायपुर लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम श्री एम.के. खान संतोष वर्मा संतोष शर्मा सत्‍येन्‍द्र कुमार साहू सरल कानूनी शिक्षा सुदर्शन महलवार स्थायी निषेधाज्ञा हरे कृष्ण तिवारी